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कंपनियों से हैं परेशान तो यूं जाएं उपभोक्ता फोरम के दरवाजे तक

 Written By: India TV Business Desk
 Published : Jul 08, 2015 04:00 pm IST,  Updated : Jul 11, 2015 09:28 am IST

नई दिल्ली: बड़े-बड़े बैनर, कंपनियों के लोकलुभावन वादों के बीच उनकी जालसाजी के उकता गए हैं और समझ नहीं आ रहा है ऐसे में आप किससे मदद मांगे तो हम आपको बता दें कि उपभोक्ता

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उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम

उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत अधिकार भारत के संविधान की धारा 14 से 19 बीच अधिकारों से आरंभ होते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, जिससे हमारे देश में शासन प्रक्रिया में एक खुलापन आया है और साथ ही इसमें अब उपभोक्‍ता संरक्षण के लिए दूरगामी निहितार्थ शामिल हैं। अधिनियम के अनुसार 'उपभोक्‍ता' को निम्‍नानुसार परिभाषित किया है :

1. कोई व्‍यक्ति जो विचार हेतु सामान हेतु ख़रीदता हैं और कोई व्‍यक्ति जो बिक्री करने वाले की अनुमति से इन वस्‍तुओं का उपयोग करता है।
2. कोई व्‍यक्ति जो विचार हेतु कोई सेवा किराए पर लेता है और इन सेवाओं के कोई लाभार्थी, बशर्तें कि सेवा का लाभ उस व्‍यक्ति के अनुमोदन से लिया गया है जिसने विचार हेतु सेवाएं किराए पर ली थीं।

इसके अलावा किसी ऐसी वस्‍तु या सेवा को विचार में लेना जिसके लिए या तो भुगतान किया गया है अथवा इसका वचन दिया गया हैं या आंशिक भुगतान किया गया है अथवा वचन दिया गया है अथवा इसे एक आस्‍थगित भुगतान की प्रणाली के तहत प्रदान किया गया है।

इस अधिनियम में उपभोक्‍ताओं के निम्‍नलिखित अधिकारों के प्रवर्तन और संरक्षण की कल्‍पना की गई है-

1. सुरक्षा का अधिकार : ऐसी वस्तुएं जो जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हैं, उपभोक्ताओं को उनके वितरण और विपणन के खिलाफ कंस्यूमर फोरम में जाने का अधिकार है।
2. सूचना का अधिकार : इसके अंतर्गत उपभोक्ताओं को वस्तुओं या सेवाओं की गुणवत्ता, मानक, माप, मूल्य और शुद्धता आदि के बारे में सूचना पाने का अधिकार है।
3. चयन का अधिकार : उपभोक्ता को वस्तुओं की अलग-अलग वैरायटी को प्रतियोगी मूल्य पर चयन करने का अधिकार है। एक ही प्रकार की सामग्री दिखाकर उसे खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
4. सुनवाई का अधिकार : इसके तहत किसी भी उपभोक्ता की शिकायत पर जिला, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर सुनवाई होगी।
5. समाधान का अधिकार : इसके अंतर्गत उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार, व्यवहार तथा शोषण की शिकायत पर समाधान की मांग करने का अधिकार प्रदान है।
6. शिक्षा का अधिकार : उपभोक्ता को बाजार में उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं के प्रयोग के अलावा उसमें लाभ और हानि के बारे में जानकारी हासिल करने का अधिकार है।

भारत सरकार कहती है, जब आप पूरी क़ीमत देते हैं तो कोई भी वस्तु वज़न में कम न लें। बात सही है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए क़ानून है। यह स्लोगन सरकारी दफ्तरों में देखने को मिल जाएगा। सरकार ने उपभोक्ताओं को संरक्षण देने के लिए कई क़ानून बनाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी क़ीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं।

उपभोक्ताओं की कुछ परेशानियां

1. सेहत के लिए नुक़सानदेह पदार्थ मिलाकर व्यापारियों द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या कुछ ऐसे पदार्थ निकाल लेना, जिनके कम होने से पदार्थ की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है, जैसे दूध से क्रीम निकाल कर बेचना।
2. टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं में गुमराह करने वाले विज्ञापनों के ज़रिये वस्तुओं तथा सेवाओं का ग्राहकों की मांग को प्रभावित करना।
3. वस्तुओं की पैकिंग पर दी गई जानकारी से अलग सामग्री पैकेट के भीतर रखना।
4. बिक्री के बाद सेवाओं को अनुचित रूप से देना।
5. क़ीमत में छुपे हुए तथ्य शामिल होना।
6. उत्पाद पर ग़लत या छुपी हुई दरें लिखना।
7. वस्तुओं के वज़न और मापन में झूठे या निम्न स्तर के साधन इस्तेमाल करना।
8. थोक मात्रा में आपूर्ति करने पर वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना।
9. अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का ग़लत तौर पर निर्धारण करना।
10. एमआरपी से ज़्यादा क़ीमत पर बेचना।
11. दवाओं आदि जैसे अनिवार्य उत्पादों की अनाधिकृत बिक्री उनकी समापन तिथि के बाद करना।
12. उत्पाद के बारे में झूठी या अधूरी जानकारी देना।
13. गारंटी या वारंटी आदि को पूरा न करना।

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