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जज्बा फिल्म रिव्यू

 Published : Oct 08, 2015 07:07 pm IST,  Updated : Oct 09, 2015 12:04 pm IST

कलाकार- ऐशवर्या राय बच्चन, इरफान खान, शबाना आजमी, चंदन रॉय सनयल निर्देशक- संजय गुप्ता शैली- थ्रिलर संगीत- सचिन, जिगर संजय गुप्ता कमर्शियल सिनेमा के उन निर्देशकों में से एक हैं जो गंभीर एक्शन फिल्मों में

जज्बा फिल्म रिव्यू- India TV Hindi
जज्बा फिल्म रिव्यू

कलाकार- ऐशवर्या राय बच्चन, इरफान खान, शबाना आजमी, चंदन रॉय सनयल

निर्देशक- संजय गुप्ता

शैली- थ्रिलर

संगीत- सचिन, जिगर

संजय गुप्ता कमर्शियल सिनेमा के उन निर्देशकों में से एक हैं जो गंभीर एक्शन फिल्मों में तकनीक और स्टाइल पर फिल्म की कहानी से ज्यादा ध्यान देते है हालांकि आखिर में उसका जरूरी प्रभाव दर्शकों तक पहुंच ही जाता है। इस बार संजय गुप्ता की फिल्म जज्बा में खास बात ये है कि इसकी कहानी मजबूत है वहीं तकनीक और निर्देशक का सिगनेचर स्टाइल उसमें सहायक भूमिका निभाते हैं।

कहानी है अनुराधा वर्मा (ऐश्वर्या राय बच्चन) की जो पेशे से वकील है और उसका ट्रेक रिकार्ड उठाकर देखें तो वो 100 प्रतीशत सफल रहा है। उसकी जिंदगी में उथल-पुथल तब होती है जब उसकी बेटी को किडनैप कर लिया जाता है और किडनैपर फिरौती की जगह जेल में कैद एक बलात्कारी मियाज शेख (चंदन रॉय सनयल) का केस लड़ने की मांग करता है। मजबूर होकर अनुराधा इस केस को अपने हाथों में ले लेती है और इसमें उसकी मदद करता है एक निष्काशित पुलिस अफसर योहान (इरफान खान) जिसका दिल इस वकील के लिए धड़कता भी है।

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अनुराधा और योहान बलात्कार का शिकार हो चुकी लड़की की मां (शबाना आजमी) से मिलते हैं जिनसे उन्हें पता चलता है कि कितनी बर्बरता से उस लड़की का बलात्कार हुआ है। अनुराधा को एहसास होता है कि वो किस जानवर के लिए केस लड़ रही है लेकिन वहीं उसकी ममता उसे असमंजस में डाल देती है। तो क्या वो इस केस को लड़ेगी और क्या होगा उसकी बेटी का जो अब तक किडनैप है? जानने के लिए देखिए जज्बा जो कि कई ट्विस्ट्स और खुलासों से भरी हुई है।

संजय की फिल्म पर पकड़ इस बार मजबूत है और हर पहलू को वो फिल्म में ठीक से बुनते हैं। फिल्म की गति इंटरवल से पहले काफी तेज है जिसकी वजह से कुछ चीजे समझने कि लिए आपको अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने भी होंगे। वहीं फिल्म का दूसरा भाग भी दिलचस्प है जिसमें एक नेता (जैकी श्रॉफ) और उसके नशे में धुत बेटे (सिद्धांथ कपूर) की कड़ी जुड़ने से उसमें सस्पेस बढ़ता है।

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संजय इन सभी को एक मां ने नजरिए से दिखाते है जो एक तरफ तो सख्त है और दूसरी तरफ बिल्कुल निर्मल। इसी के साथ सभी किरदारों के अपने-अपने रंग है वहीं निर्देशक के मुंबई का रंग भी आम नहीं है। संजय गुप्ता और कमलेश पांडे का वन-लाइनर डायलॉग इसमें चार चांद लगाते है और जब इरफान इन्हें अपने अंदाज में बोलते हैं तो वो तालिया ही बटोरते हैं।

अभिनय के मामले में इरफान का कोई जवाब नहीं है। एक सख्त और शायर पुलिसवाले के किरदार में इरफान आपको खूब पसंद आएंगे।

लेकिन किसी ने अगर सही मायने में वापसी की है तो वो हैं एश्वर्या राय जो अपने दोनों रूपों में अच्छी तरह ढ़लती हैं। कभी आक्रोश तो कभी दर्द, दोनों ही भाव उनकी आंखो में साफ झलकते हैं।

चंदन को देख आप उनसे नफरत कर बैंठेगे और ये उनके लिए किसी जीत से कम नहीं है।

फिल्म में दो ही गीतों को रखा गया है जो की सही कदम है। कुल मिलाकर फिल्म संजय गुप्ता की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। फिल्म फास्ट-पेसड है और अंत तक आपको बांधे रखती है।

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