हिंदुस्तानी सिनेमा की बात हो और नरगिस दत्त का नाम न आए, ये मुमकिन ही नहीं। वो सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि एक युग थीं, एक ऐसी महिला जिन्होंने अभिनय को जीया और जिंदगी को पर्दे पर एक मिसाल की तरह उतारा। आपको जानकर हैरानी होगी कि नरगिस महज 20 साल की थीं, जब उन्होंने महबूब खान की आइकोनिक फिल्म ‘मदर इंडिया’ में एक 70 साल की बूढ़ी मां का किरदार निभाया था। यह वही फिल्म थी जिसमें उन्होंने अपने से उम्र में बड़े दिखाए गए सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार की मां का रोल निभाया। दिलचस्प बात यह है कि सुनील दत्त ही बाद में उनके जीवनसाथी बने।
नरगिस को इस फिल्म से ऐसा मुकाम मिला जो बहुत कम कलाकारों को नसीब होता है। इस किरदार ने उन्हें एक संवेदनशील, सशक्त और आत्मबल से भरी महिला के रूप में स्थापित कर दिया। उन्होंने एक बार कहा था, 'मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये किरदार मेरी पहचान बन जाएगा।' हालांकि उन्होंने ‘लाजवंती’, ‘रात और दिन’ जैसी महिला-केंद्रित बेहतरीन फिल्में कीं, लेकिन उन्हें जहां भी जाना पड़ा, लोग उन्हें ‘मदर इंडिया’ कहकर सम्मान देते थे।
नरगिस का फिल्मों में आना किसी ग्लैमर या स्टारडम की चाहत से नहीं, बल्कि अपनी मां का कर्ज चुकाने की मजबूरी से हुआ था। उनकी मां जद्दनबाई ने 1935 में एक प्रोडक्शन हाउस शुरू किया था और पहली फिल्म बनाई ‘तलाश-ए-हक’, जिसमें छोटी सी नरगिस ने भी काम किया था। लेकिन लगातार घाटे और कर्ज की वजह से परिवार की हालत खराब हो गई। ऐसे में नरगिस ने अपनी पढ़ाई छोड़कर एक्टिंग का फैसला लिया, महज एक बेटी की तरह, अपनी मां की मदद के लिए।

नरगिस का असली नाम था फातिमा राशिद और वो जन्मी थीं भारत की पहली महिला संगीतकार और फिल्म निर्माता मानी जाने वाली जद्दनबाई के घर। जद्दनबाई बनारस की मशहूर तवायफ थीं, लेकिन उनका कोठा देह व्यापार का अड्डा नहीं था, वहां सिर्फ ठुमरी, गजलें और संगीत पेश किया जाता था। नरगिस की नानी दलीपाबाई भी अपने दौर की मशहूर गायिका और कलाकार थीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि नरगिस को कला विरासत में मिली थी। नरगिस ने सिर्फ 6 साल की उम्र में अपनी मां की फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ से चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में करियर शुरू किया। 12 साल की उम्र तक उन्होंने कई फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभाईं और धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई।
महज 14 साल की उम्र में उन्हें महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ में लीड रोल मिला। फिल्म हिट रही और इसके बाद नरगिस ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1949 से 1951 तक उन्होंने ‘अंदाज’, ‘बरसात’ और ‘आवारा’ जैसी फिल्में दीं, जिनमें उनके साथ राज कपूर थे। ये सभी फिल्में उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शुमार हुईं और नरगिस-राज कपूर की जोड़ी दर्शकों की फेवरिट बन गई। दोनों के बीच प्यार की अफवाहें भी तेज हो गईं, जबकि राज कपूर पहले से ही शादीशुदा थे। दोनों के प्यार परवान चढ़ा, लेकिन इसे मंजिल नहीं मिल सकी और दोनों अलग हो गए।
'मदर इंडिया' की शूटिंग के दौरान एक हादसे में सेट पर आग लग गई थी। सुनील दत्त ने बिना अपनी जान की परवाह किए, नरगिस को आग से बचाया। यही वह मोड़ था, जहां रील लाइफ की मां और बेटे के रिश्ते ने रियल लाइफ में प्रेम कहानी का रूप ले लिया। 1958 में दोनों ने शादी की और एक नया जीवन शुरू किया। इस शादी से उन्हें तीन संतानें हुईं संजय दत्त, नम्रता और प्रिया दत्त। नम्रता और प्रिया दत्त जहां फिल्मों से दूर रहीं, वहीं संजय दत्त फिल्मों में आए और छा गए। पहली ही फिल्म 'रॉकी' ने उन्हें स्टार बना दिया, लेकिन उनकी मां की एक इच्छा अधूरी रह गई। नरगिस को कैंसर हो गया था और अमेरिका में इलाज के बाद भी उनकी हालत पूरी तरह नहीं सुधर पाई। उन्हें बेटे को फिल्मों में देखने की बहुत चाहत थी, लेकिन संजय की फिल्म 8 मई 1981 को रिलीज हुई और उससे ठीक पांच दिन पहले ही नरगिस इस दुनिया को अलविदा कह गईं।
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