पिछले 100 दिनों से अधिक समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था, शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को अनिश्चितता के भंवर में झोंकने वाले अमेरिका-ईरान तनाव का आखिरकार अंत हो गया है। दोनों महाशक्तियों के बीच हुए इस अप्रत्याशित शांति समझौते ने न केवल मध्य-पूर्व में युद्ध के गंभीर बादलों को हमेशा के लिए छांट दिया है, बल्कि मंदी की कगार पर खड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी एक नई संजीवनी दे दी है। यह ऐतिहासिक समझौता भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश के लिए किसी गुड न्यूज से कम नहीं है। इस शांति समझौते के बाद से ही वैश्विक बाजारों में चौतरफा जश्न का माहौल है। आइए इस विस्तार से समझते हैं कि इस शांति समझौते के वैश्विक मायने क्या हैं? भारत के लिए इसके क्या सियासी व आर्थिक मायने हैं और दुनिया को पूरी तरह नॉर्मल होने में अब कितना वक्त लगेगा?
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अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बड़े वैश्विक मायने
वैश्विक भू-राजनीति के लिहाज से इस समझौते को इस दशक की सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। इसके प्रमुख वैश्विक मायने हैं:
- सप्लाई चेन का संकट खत्म: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण लाल सागर और फारस की खाड़ी जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समुद्री मार्ग बेहद असुरक्षित हो गए थे। इस समझौते के बाद अब मालवाहक जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी, जिससे वैश्विक लॉजिस्टिक्स लागत में भारी कमी आएगी।
- कच्चे तेल के बाजार में स्थिरता: ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसका तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में खुलकर नहीं आ पा रहा था। अब ईरान पर से चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध हटने के बाद वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की सप्लाई बढ़ेगी, जिससे कच्चे तेल की कीमतें $80-$85 प्रति बैरल के स्तर से नीचे आकर स्थिर होंगी।
- वैश्विक मंदी के खतरे पर ब्रेक: अमेरिका और ईरान के बीच सीधे युद्ध की आशंका से पूरी दुनिया में महंगाई और मंदी का खतरा मंडरा रहा था। इस शांति समझौते ने निवेशकों के डर को खत्म कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर औद्योगिक निवेश को दोबारा रफ्तार मिलेगी।
भारत के लिए यह क्यों है बड़ी खुशखबरी?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में मध्य-पूर्व में शांति स्थापित होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हर मोर्चे पर संजीवनी साबित होगा।
1. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत!
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिरने का सीधा फायदा भारत सरकार और आम जनता को मिल सकता है। तेल की कीमतों में गिरावट से देश का चालू खाता घाटा कम हो सकता है। इसके साथ ही, देश के भीतर माल ढुलाई सस्ती होने से आम जरूरत की चीजों और खाने-पीने के सामानों की कीमतों में कमी आ सकती, जिससे घरेलू महंगाई पर लगाम लगेगी।
2. भारतीय शेयर बाजार में बंपर तेजी
भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण पिछले काफी समय से विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार से लगातार अपना पैसा निकाल रहे थे, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा था। इस शांति समझौते से मार्केट सेंटीमेंट को जबरदस्त बूस्ट देखने को मिल सकता है। निवेशकों का भरोसा लौटने से भारतीय शेयर बाजार में भारी विदेशी फंड आने की उम्मीद है, जिससे बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई की ओर बढ़ सकता है।
3. मजबूत होता भारतीय रुपया
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत को तेल आयात करने के लिए ज्यादा अमेरिकी डॉलर चुकाने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। अब तेल की कीमतें घटने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहेगा, डॉलर पर दबाव कम होगा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया काफी मजबूत स्थिति में आ जाएगा।
सबकुछ नॉर्मल होने में कितना समय लग सकता है?
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद वित्तीय बाजारों में राहत का असर तुरंत दिखने लगेगा। शेयर बाजार, रुपया, सोना-चांदी और कच्चे तेल की कीमतों में अनिश्चितता अगले एक सप्ताह में काफी हद तक कम हो सकती है। हालांकि, खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले शिपिंग रूट, बीमा दरें और तेल आपूर्ति व्यवस्था को पूरी तरह सामान्य होने में 60 से 90 दिन लग सकते हैं। वहीं ईरान पर लगे बैंकिंग, वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंधों को हटाने की कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रिया में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है, जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
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