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Thalassemia में सूखने लगता है खून, बच्चें होते हैं शिकार, डॉक्टर से जानें इस डिसऑर्डर के लक्षण और बचाव के उपाय

 Written By: Poonam Yadav @R154Poonam
 Published : May 07, 2025 10:32 pm IST,  Updated : May 08, 2025 03:59 pm IST

थैलेसीमिया बच्चों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। हर साल भारत में 10 हज़ार से लेकर 12 हज़ार बच्चे इस बीमारी का शिकार होते हैं। ऐसे में इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 8 मई को ‘वर्ल्ड थैलेसीमिया डे’ मनाया जाता है।

थैलेसीमिया दिवस 2025:- India TV Hindi
थैलेसीमिया दिवस 2025: Image Source : SOCIAL

थैलेसीमिया आज भी भारत में बच्चों और उनके परिवारों के लिए शारीरिक और जज़्बाती तौर पर बहुत अधिक परेशानी का कारण बना हुआ है, जहाँ पूरी दुनिया में इसके मामलों की संख्या सबसे ज़्यादा हैं। थैलेसीमिया बच्चों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। हर साल भारत में 10 हज़ार से लेकर 12 हज़ार बच्चे इस बीमारी का शिकार होते हैं। ऐसे में इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 8 मई को ‘वर्ल्ड थैलेसीमिया डे’ मनाया जाता है। 

थैलेसीमिया में शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम होने लगता है। इस वजह से शरीर में धीरे-धीरे खून की कमी होने लगती है और बच्चा चलने फिरने में असहाय होने लगता है। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, में हेमेटो-ऑन्कोलॉजी, बीएमटी की डायरेक्टर, डॉ. ईशा कौल बता रही हैं कि थैलेसीमिया क्या है? इसके लक्षण क्या है और बचाव के लिए क्या करना चाहिए? 

थैलेसीमिया क्या है?

थैलेसीमिया खून से संबंधित एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसकी वजह से शरीर में सामान्य से कम मात्रा में हीमोग्लोबिन बनता है। इससे एनीमिया, थकान और सेहत से जुड़ी अन्य गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों का संभावित तौर पर इलाज किया जा सकता है, जिसमें उनके शरीर में खराब हो चुकी खून बनाने वाली कोशिकाओं को किसी डोनर की स्वस्थ कोशिकाओं से बदल दिया जाता है।

थैलेसीमिया के लक्षण: 

  • बहुत ज़्यादा थकान
  • कमज़ोरी होना
  • स्किन का पीला पड़ना
  •  एनीमिया 
  • सांस लेने में तकलीफ़

कैसे करें थैलेसीमिया से बचाव?

ब्लड ट्रांसफ्यूजन इसका एक अस्थायी समाधान है, लेकिन स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। कई मरीजों के सहोदर भाई-बहन भी उनके मैचिंग डोनर नहीं होते हैं, लिहाजा ऐसे मामलों में मेल खाने वाले असंबंधित डोनर (MUD) की मदद से ट्रांसप्लांट ही उनकी ज़िंदगी का एकमात्र सहारा होता है। हालाँकि, लाखों में से एक मैचिंग डोनर ढूंढना सबसे बड़ी चुनौती है। 

डीकेएमएस (DKMS) फाउंडेशन द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, भारत में हर साल 10,000 से ज़्यादा बच्चे थैलेसीमिया के साथ पैदा होते हैं। ऐसे में थैलेसीमिया के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए यह फाउंडेशन कई तरह के कार्यक्रम करती है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन इनमें से ज़्यादातर बच्चों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है, लेकिन ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही उन्हें पूरी तरह ठीक करने का एकमात्र विकल्प है। DKMS इंडिया के अध्यक्ष, पैट्रिक पॉल ने कहा, "DKMS फाउंडेशन इंडिया का 'एक्सेस टू ट्रांसप्लांटेशन' (ATT) कार्यक्रम उस अंतर को दूर करने का काम कर रहा है, जो मरीजों और उन्हें ठीक करने के बीच खर्च वहन करने की क्षमता के रूप में सामने आती है।''

थैलेसीमिया में इन टेस्ट को कराएं:

  • कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC): लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा और गुणवत्ता को मापता है।

  • हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस (Hemoglobin Electrophoresis): रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन के प्रकारों की पहचान करता है, जिसमें असामान्य वेरिएंट भी शामिल हैं।

  • जेनेटिक टेस्टिंग (Genetic Testing): थैलेसीमिया के लिए जिम्मेदार जेनेटिक उत्परिवर्तन की पहचान करता है।

  • आयरन स्टडीज़ (Iron Studies): रक्त में आयरन के स्तर को बताता है जो थैलेसीमिया और आयरन की कमी को पहचानने में मदद करता है। 

  • बोन मैरो बायोप्सी (Bone Marrow Biopsy):  यह टेस्ट थैलेसीमिया की गंभीरता को पहचानने और ट्रीटमेंट कैसी शुरू करनी है यह बताता है। 

Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)

 

 

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