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दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.3 फीसदी

 Written By: IANS
 Published : Dec 01, 2016 08:05 am IST,  Updated : Dec 01, 2016 08:05 am IST

नई दिल्ली: सितंबर में खत्म हुई दूसरी तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.3 फीसदी रही है, और इसके 29.63 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है। पिछले

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नई दिल्ली: सितंबर में खत्म हुई दूसरी तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.3 फीसदी रही है, और इसके 29.63 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के दौरान यह 25.52 लाख करोड़ रुपये थी, जबकि वृद्धि दर 7.6 फीसदी थी। पहली तिमाही में जीडीपी की दर 7.1 फीसदी रही थी। सकल मूल्य वर्धन(जीवीए) के संदर्भ में -इसे अर्थव्यवस्था की हालत मापने का बेहतर पैमाना माना जाता है, क्योंकि इसमें करों और सब्सिडी को जोड़ा नहीं जाता- सितंबर में खत्म हुई तिमाही में जीवीए 27.33 लाख करोड़ रुपये रहा, जोकि 7.1 फीसदी की वृद्धि दर है और पिछले साल की समान अवधि में 7.3 फीसदी था।

जीडीपी आंकड़ों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कॉरपोरेट जगत ने सरकार निवेश और उत्पादन क्षेत्र को पुर्नजीवित करने के लिए कदम उठाने की अपील की है।

बुधवार को जारी आंकड़ों में बताया गया कि इस साल यह गिरावट खनन और विनिर्माण क्षेत्र में मंदी के कारण आई है। इस दौरान उत्पादन गतिविधियों की वृद्धि दर 7.1 फीसदी रही, जोकि पिछले साल की समान अवधि में 9.2 फीसदी थी।

सरकारी सेवाओं, जिसमें रक्षा क्षेत्र शामिल है, में समीक्षाधीन अवधि में 12.5 फीसदी की वृद्धि दर रही, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 6.9 फीसदी थी।

कृषि और मत्स्य पालन में 3.3 फीसदी, निर्माण में 3.8 फीसदी वृद्धि दर रही है।

मुख्य सांख्यिकीविद टी.सी.ए. अनंत ने बताया, "अच्छी बारिश के कारण पिछले साल की तुलना में कृषि की हालत अच्छी है। जबकि खनन क्षेत्र में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है।"

आंकड़ों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उद्योग मंडल एसोचैम के महासचिव डी. एस. रावत ने कहा, "ऐसे समय में जब निजी निवेश कम हो रहा है। सरकार को सड़कों, रेल मार्ग, समुद्री परिवहन आदि में निवेश बढ़ाना चाहिए। साथ ही सरकार को बड़ी परियोजनाओं में नकदी के प्रवाह को बढ़ाना चाहिए, ताकि निर्माण को बढ़ावा मिले।"

उन्होंने आगे कहा, "भारतीय अर्थव्यवस्था के नकारात्मक जोखिमों में हाल में लागू की नोटबंदी, ब्रेक्सिट से पैदा हुए खतरे, चीनी अर्थव्यवस्था में बदलाव, उन्नत अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपनाए गए संरक्षणवादी उपाय और भारतीय बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों की अनसुलझी समस्या प्रमुख है।"

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