
बापू के साथ कई आंदोलन में मौजूद रहे कनुभाई
इसके बाद कनुभाई बापू के साये की तरह हो गए। आंदोलन के सिलसिले में बापू जहां कहीं भी जाते, ज़्यादातर जगहों पर कनुभाई उनके साथ होते लेकिन 1948 में दिल्ली में बापू की हत्या के बाद कनुभाई की ज़िंदगी बदल गई। उस वक्त कनुभाई 17 के थे, 13 बरस बाद 1961 में पंडित नेहरु और अमेरिकी राजदूत जॉन कैनिथ गालब्रेथ की सलाह पर वो अमेरिका के मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में गणित पढ़ने चले गए।
अमेरिका में कनुभाई सेटल हो गए। यहां उन्होंने नासा में साइंटिस्ट की नौकरी की और कई हवाई जहाज़ की डिज़ाइन के प्रोजेक्ट पर काम किया। उन्होंने अमेरिका में करीब 55 साल बिताए लेकिन उनके लिए परदेस-परदेस रहा और स्वदेश की यादें हमेशा दिलोदिमाग़ में ज़िंदा रहीं। कनुभाई और शिवलक्ष्मी को कोई संतान नहीं थी, आख़िरकार 2013-2014 में उन्होंने वतन वापसी का फ़ैसला किया और भारत आ गए।
कुनभाई गांधी की पूरी कहानी
कनुभाई की ज़िंदगी में ट्रेजडी की शुरुआत भारत वापस आते शुरु हो गई। सबसे पहली मुश्किल तो थी कि वो कहां ठिकाना बनाएं। गुजरात के अलग-अलग गांधी आश्रमों में उन्होंने 2 साल गुज़ारे, लेकिन वहां की आबोहवा रास नहीं आई लिहाज़ा उन्होंने दिल्ली का रुख किया और उनका ठिकाना दिल्ली का एक ओल्ड एज होम बना। लेकिन सबसे बड़ी ताज्जुब की बात ये है कि जो शख्स पांच दशक तक अमेरिका में रहा हो जिसने नासा जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में काम किया हो, जिनकी पत्नी ने बोस्टन में टीचिंग की हो और रिसर्च भी वो आज दर-दर की ठोकर खाने पर मजबूर क्यों है। महात्मा गांधी के परिवार के लोग भी कहते हैं कि कनुभाई गांधी की माली हालत ठीक है।
इशारों में परिवार कहता है कि कनुभाई की मानसिक हालत ठीक नहीं है। वो समय पर दवाएं नहीं लेते और शायद यही वजह है कि उन्होंने दिल्ली के उस वृद्धाश्रम को चुना है, जहां अस्पताल जैसी सुविधा है लेकिन सवाल उठता है कि महात्मा गांधी के प्रपौत्र कनुभाई कब तक दिल्ली के इस ओल्ड एज़ होम में टिकेंगे। क्या सरकार से या फिर परिवार से उनका कोई मददगार सामने आएगा।