पूनम कौशल
उड़ी आतंकी हमले में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत से देश गुस्से में हैं, होना भी चाहिए आखिर हमनें अपने वीर जवान खोए हैं। इस आतंकी वारदात के जिम्मेदार लोगों को सबक भी सिखाया जाना चाहिए, कुछ ऐसा जिसके बाद भारत की तरफ आतंक और उसको पनाह देने वाले लोग फिर से इस तरह की हिम्मत ना कर सकें। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धैर्य का परिचय देते हुए दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब करने और अलग-थलग करने का जो रास्ता चुना है। सिंधु जल समझौते पर भी पीएम का यह कहना बिल्कुल सही है कि खून और पानी साथ साथ नहीं बह सकते। पाकिस्तान को यह करारा जवाब है और रही सही कसर सुषमा स्वराज ने UN में यह कहकर पूरी कर दी कि जिनके घर शीशे के बनें होते हैं उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। लेकिन इन सब बातों के साथ-साथ देश में एक अजीब किस्म का युद्धोन्मान माहौल पर हावी है।
सोशल मीडिया में वीर रस की कविताएं तैर रही हैं। लोग दो पक्षों में बंटे हैं। एक वो हैं जो बस युद्ध चाहते हैं और एक वो है जो उड़ी हमले के बाद भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। इतने सवालों के केंद्र में भी युद्धोन्माद ही है लेकिन युद्धोन्माद में डूबे लोगों का क्या हो? जो चाहते हैं कि बस हो जाने दो शंखनाद, हो जाने दो युद्ध.. क्या फ़र्क़ पड़ता है जो युद्ध से नरसंहार होगा, हाहाकार होगा, हमारी अर्थवयावस्था डगमगा जाएगी और सब बर्बाद हो जायेगा!
सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर, तमाम टीवी चैनलों पर इस तरह रणभेरी बजाई जा रही है मानो युद्ध ही एक मात्र विकल्प बचा हो। मीडिया ने ऐसे समय में जिस तरह से अपने स्टूडियो को वॉर ज़ोन में तब्दील किया ये वाक़ई हास्यपद रहा है। अच्छी बात ये है कि प्रधानमंत्री ने इस युद्धोन्माद को नज़रअंदाज़ किया। मानव जाति का इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है। सिर्फ़ इतिहास ही क्या, हमारा तो वर्तमान भी युद्धों से घिरा है।
सीरिया में पांच साल से जारी गृहयुद्ध में क़रीब तीन लाख लोग मारे गए हैं और कई शहर पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। पूर्वी यूक्रेन में लड़ाई चल रही है। इराक़-अफ़ग़ानिस्तान अभी युद्ध से उबर नहीं पाए हैं। लीबिया जल रहा है। यमन सिसक रहा है। इतिहास और वर्तमान के युद्धों से सबक लिए बिना मीडिया ने जिस तरह युद्ध का उन्माद फैलाया उससे मीडिया की भूमिका पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। क्या मीडिया का ये फ़र्ज़ नहीं बनता था कि इस वक़्त युद्ध पर ज़ोर देने की जगह उसके बाद की परिस्थितियां क्या हो सकती हैं इस पर ध्यान दिया जाए?
मीडिया ने लगातार ये तो बताया कि भारत के पास कितने बम, बारूद, परमाणु और लड़ाकू विमान है लेकिन ये नहीं बताया कि क्या हुआ था प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, क्या हुआ था हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद, कोरिया युद्ध के बाद, वियतनाम युद्ध के बाद, ईराक़-ईरान युद्ध के बाद! ऐसी तमाम लड़ाइयां हुई जिन्होंने इतिहास के पन्नो को मोड़ दिया, वो समय ऐसा था जब लाखों लोग काल के मुँह में समा गये, पूरे के पूरे देश बर्बाद हो गए।
जहां बम गिरे थे वहां नई इमारते ताबीर भले कर दी गई हों, लेकिन जिन लोगों ने जान गंवाई उनकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। अगर इतिहास की इतनी गहराई में ना भी जायें तो याद कीजिये तीन वर्ष के अल्यान कुर्दी का समुद्र किनारे पड़ा शव, हाल ही में सीरिया के एल्लेपो शहर में हवाई हमले में घायल हुए ओमरान दकनीश की भावुक कर देने वाली तस्वीर, जनाब ये बोलती हुई तस्वीरें थी जिनकी चीख़ ने पूरे विश्व को हिला दिया।
अल्यान और दकनीश अकेले इन घटनाक्रमों का परिणाम नहीं हैं ऐसे मासूम बच्चे लाखों की तादाद में हैं। लाखों की संख्या में बेक़सूर महिलायें और पुरुष हैं जो युद्ध की अंतहीन स्थिति से तंग आकर आज शरणार्थी बने भटक रहे हैं जो कभी डॉक्टर थे, इंजीनियर थे, पत्रकार थे, प्रोफ़ेसर थे वो आज सिर्फ़ दर-दर भटक रहे शरणार्थी हैं। युद्ध-युद्ध चिल्लाते हुए एक बार बॉर्डर पर खड़े हुए सिपाही का कष्ट महसूस करिए। ख़ुद से सवाल कीजिए कि उसके बीवी और बच्चों की क्या ग़लती है जो आप उसे शहीद का दर्जा देने पर उतारू हैं? उसके बीवी बच्चों की छोड़िये ये बताइये आपके बीवी बच्चों की क्या ग़लती है जो आप उन्हें युद्ध की ओर धकेलने पर उतारू हैं?
ये मत भूलिये युद्ध किसी को नहीं छोड़ता। इसकी लपटें आपके घर को भी राख कर देंगी। एक देश दशकों पीछे चला जाता है जिससे उभरना नामुमकिन सा होता है। युद्ध सिर्फ़ सत्ता का विनाशकरी इस्तेमाल है जो मानवता पर थोपा जाता है। इस वर्चस्व की लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण होता है आपका नेता आपकी सरकार उसकी चतुराई, उसकी नीति, उसकी दूरदर्शिता उसकी समझ क्यूंकि ये ज़रूरी नहीं की युद्ध तलवार की नोक पर ही लड़ा जाए। बहुत से कूटनीतिक रास्ते हैं अपने दुश्मन को परास्त करने के लिए। ये अच्छी बात है कि भारत युद्ध के बजाए उन दूसरे रास्तों पर चलने की नीति अपना रहा है।
सन ज़ू ने अपनी किताब ;द वॉर' में लिखा है, "सरकार के युद्ध शुरू करने के लिए अपने लोगों से झूठ बोलने में कुछ भी नया नहीं है। क्योंकि ज़्यादातर लोग युद्ध में मरने के बजाए शांति से रहना पसंद करते हैं ऐसे में युद्ध करने की इच्छा रखने वाली सरकार अपने लोगों से झूठ बोलती है ताक़ि ये भ्रम फैलाया जा सके कि लोगों के पास युद्ध को चुनने के अलावा और कोई विकल्प ही न बचा हो।"
(ब्लॉग लेखिका पूनम कौशल युवा पत्रकार है)