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'दहेज प्रथा के कारण विवाह एक व्यावसायिक लेन-देन बनकर रह गया', सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

 Published : Nov 28, 2025 11:50 pm IST,  Updated : Nov 28, 2025 11:55 pm IST

सुप्रीम कोर्ट ने विवाह में दहेज दिए जाने को लेकर चिंता जताई है। कोर्ट में एक दहेज का मामला आया हुआ था, जिसमें शादी के 4 महीने बाद ही पत्नी की दहेज के लिए हत्या कर दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को लेकर जताई चिंता- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को लेकर जताई चिंता Image Source : PTI AND FREEPIK

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि विवाह एक पवित्र और महान संस्था है, जो आपसी विश्वास, साहचर्य और सम्मान पर आधारित है, लेकिन दहेज की बुराई के कारण यह पवित्र बंधन दुर्भाग्य से एक व्यावसायिक लेन-देन बनकर रह गया है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि दहेज हत्या केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि समग्र समाज के खिलाफ अपराध है। 

भौतिक लालच को शांत करने का एक साधन 

पीठ ने कहा, ‘यह न्यायालय इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि विवाह, अपने वास्तविक स्वरूप में, आपसी विश्वास, साहचर्य और सम्मान पर आधारित एक पवित्र और महान संस्था है। हालांकि, हाल के दिनों में यह पवित्र बंधन दुर्भाग्य से एक मात्र व्यावसायिक लेन-देन बनकर रह गया है। दहेज की बुराई को (भले ही) अक्सर उपहार या स्वैच्छिक भेंट के रूप में छिपाने की कोशिश की जाती है, लेकिन वास्तव में यह सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने और भौतिक लालच को शांत करने का एक साधन बन गई है।’ 

जानिए क्या है दहेज को लेकर मामला

पीठ ने यह टिप्पणी उस व्यक्ति की जमानत रद्द करते हुए की, जिस पर शादी के सिर्फ चार महीने बाद ही दहेज के लिए अपनी पत्नी को जहर देने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने के उच्च न्यायालय के आदेश को ‘प्रतिकूल और अव्यावहारिक’ पाया, क्योंकि इसमें अपराध की गंभीरता, मृत्यु से पहले दिए गए पुष्ट बयानों और दहेज हत्या की वैधानिक धारणा को नजरअंदाज किया गया था। 

सामाजिक कुप्रथा की सबसे घृणित अभिव्यक्तियों में से एक

इसमें कहा गया है कि 'दहेज की सामाजिक बुराई' न केवल विवाह की शुचिता को नष्ट करती है, बल्कि महिलाओं के व्यवस्थित उत्पीड़न और पराधीनता को भी बढ़ावा देती है। पीठ ने कहा, ‘दहेज हत्या की घटना इस सामाजिक कुप्रथा की सबसे घृणित अभिव्यक्तियों में से एक है, जहां एक युवती का जीवन उसके ससुराल में ही समाप्त कर दिया जाता है और वह भी उसकी किसी गलती के कारण नहीं, बल्कि केवल दूसरों के अतृप्त लालच को संतुष्ट करने के लिए।’ 

समानता और सम्मानजनक जीवन की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस तरह के जघन्य अपराध मानवीय गरिमा की जड़ पर प्रहार करते हैं। अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और सम्मानजनक जीवन की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करते हैं। (भाषा के इनपुट के साथ)

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