Vaishakh Amavasya Vrat Katha: वैशाख अमावस्या का दिन पितरों की पूजा के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण, दान आदि करने से पितृ दोष से भी आपको मुक्ति मिलती है। हालांकि, पितरों की पूजा का आशीर्वाद आपको तभी मिलता है जब आप इस दिन पूजन के दौरान व्रत कथा का पाठ या श्रवण करते हैं। आइए ऐसे में जान लेते हैं वैशाख अमावस्या की व्रत कथा क्या है।
वैशाख अमावस्या की व्रत कथा
वैशाख अमावस्या की व्रत कथा का वर्णन स्कंद पुराण में किया गया है। इस कथा के अनुसार प्राचीन समय में धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। अपने नाम के ही अनुसार धर्मवर्ण अत्यंत धार्मिक स्वभाव के थे। प्रभु का ध्यान और भजन के साथ ही धर्मवर्ण सत्संग भी किया करते थे। एक बार धर्मवर्ण ने किसी सिद्ध पुरुष से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के स्मरण से अधिक पुण्य फल और किसी कार्य से नहीं मिलता। बीते युगों में जो फल घोर तपस्या से प्राप्त होता था वो कलयुग में केवल विष्णु भगवान के ध्यान से ही प्राप्त हो जाता है। धर्मवर्ण ने यह बात सुनकर सांसारिक मोह-माया को त्यागकर संन्यास ले लिया। संन्यास लेने के बाद धर्मवर्ण भ्रमण करते रहे और हरि का ध्यान करते रहे।
एक समय ध्यान में लीन धर्मवर्ण सूक्ष्म शरीर से पितृ लोक में पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने अपने पितरों को अत्यंत कष्ट में देखा। धर्मवर्ण ने पितरों से इसका कारण पूछा। पितरों ने बताया कि धर्मवर्ण के संन्यास लेने के कारण उनकी यह गति हुई है और वो पीड़ा में हैं। ऐसा इसलिए कि धर्मवर्ण के संन्यास लेने के बाद अब उनके पितरों का कोई पिंडदान करने वाला नहीं था। पितरों ने धर्मवर्ण से कहा कि अगर वो वापस जाकर अपना गृहस्थ जीवन शुरू करें और संतान उत्पन्न करें तो हमारे कष्ट दूर हो जाएंगे। इसके साथ ही पितरों ने धर्मवर्ण को बताया कि वैशाख अमावस्या के दिन विधिपूर्वक पिंडदान करने से उनकी आत्मा तृप्त होगी। पितरों की बात को सुनकर धर्मवर्ण ने गृहस्थ जीवन शुरू करने का वचन पितरों को दिया। पितृ लोक से लौटकर धर्मवर्ण ने अपना गृहस्थ जीवन शुरू किया और वैशाख अमावस्या पर पितरों के निमित्त पिंडदान किया। ऐसा करते ही धर्मवर्ण के पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हुई।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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