गुरुग्राम में शिफ्ट होने वाले दिल्ली निवासी का एक पोस्ट वायरल हो रही है। इसमें उसने बताया है कि उन्हें दिल्ली की चहल-पहल कितनी याद आती है। पोस्ट को रेडिट पर 'यह अजीब बात है कि सिर्फ 30-40 किलोमीटर का बदलाव आपके जीने के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है' शीर्षक से शेयर किया गया है। निवासी ने बताया कि गुरुग्राम की सुविधाओं के बावजूद नए स्थान पर आए हुए सिर्फ दो महीने ही हुए हैं और जीवन बिल्कुल अलग लग रहा है।
रेडिट पर शेयर की पोस्ट
इस पोस्ट को रेडिट पर r/gurgaon पेज पर Substantial_Edge_489 नामक हैंडल से शेयर किया गया है। शख्स ने जीवनशैली में एक बड़ा अंतर बताते हुए कहा कि दिल्ली में सब कुछ पास में था, जिससे दैनिक सामुदायिक मेलजोल को बढ़ावा मिलता था। हालांकि, गुड़गांव में यह अनुभव नहीं मिलता था क्योंकि निवासी अपने घरों में अलग-थलग रहते थे। वे लिखते हैं कि, 'दिल्ली में, अगर हमें किसी चीज की जरूरत होती, तो हम बस बाहर निकल जाते थे। किराने का सामान, दवाइयां, आधी रात को नाश्ता, रात के खाने के बाद यूं ही टहलना, हर चीज के लिए घर से निकलने का कोई न कोई कारण होता था। रास्ते में, किसी न किसी परिचित से मुलाक़ात हो ही जाती थी। पड़ोसी एक-दूसरे को जानते थे, आंटियां हर किसी के बारे में जानती थीं, अंकल शाम को गपशप करते थे, बच्चे तब तक खेलते थे जब तक कोई बालकनी से आवाज न दे दे। कॉलोनी सचमुच एक बड़े परिवार जैसी लगती थी।'

गुरुग्राम में कैसी थी लाइफ
निवासी ने कहा कि वे गुरुग्राम में कई दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलते थे, सिवाय तब जब उन्हें ऑफिस जाना होता था। वास्तव में, उन्हें अभी भी यह नहीं पता था कि उनके पड़ोस में कौन रहता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हर कोई अपनी ही दुनिया में खोया रहता था। उन्होंने लिखा कि, 'सुविधाओं ने जीवन को निश्चित रूप से आसान बना दिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं, मुझे लगता है कि हमने बिना योजना के लोगों से मिलना भी बंद कर दिया है। शायद शहरी जीवन का यही विकास है। या शायद मुझे उस बस्ती की चहल-पहल की याद आती है जहाँ हर कोई किसी न किसी तरह एक-दूसरे को जानता था।' अंत में उन्होंने पूछा कि, 'क्या दिल्ली से गुड़गांव (या किसी अन्य शहर) में स्थानांतरित होने वाले किसी अन्य व्यक्ति ने भी ऐसा ही महसूस किया?'
यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया
जैसे-जैसे पोस्ट वायरल होती गई, सोशल मीडिया के अधिकांश यूजर उस व्यक्ति के आकलन से सहमत होते हुए कहने लगे कि गुरुग्राम में जीवन अक्सर खोखला सा लगता है। एक ने लिखा कि, 'बिल्कुल सही, मैं इस विशाल सोसाइटी में पूरे एक साल से रह रहा हूं और मैं सिर्फ एक ही व्यक्ति को जानता हूं। वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं उसके साथ फुटबॉल खेलता हूं।'
दूसरे ने लिखा कि, 'दिल्ली में 10 साल बिताने से पहले गुरुग्राम में 5 साल बिताए। गुरुग्राम तो एक डरावनी जगह है।'
तीसरे ने लिखा कि, 'मैं दक्षिण और उत्तरी दिल्ली में रह चुका हूं और मुझे वहां के स्थानीय बाज़ार, पार्क और हर चीज का पैदल दूरी पर होना बहुत पसंद था, किराने का सामान खरीदने से लेकर बैग की मरम्मत करवाने तक। कुछ दुकानदार तो ऐसे हैं जिन्हें मैं बचपन से जानता हूँ, लेकिन गुरुग्राम में तमाम सुविधाओं के बावजूद, वैसा एहसास नहीं होता।'
चौथे यूजर ने लिखा कि, 'यह बहुत वास्तविक लगता है! पता नहीं क्यों, दिल्ली में रहने से मुझे गुरुग्राम की तुलना में अधिक अपनापन महसूस हुआ, भले ही मैं पीजी से फ्लैट में शिफ्ट हुआ था। मेरा मानना है कि यह यहां की संस्कृति और लोगों की वजह से है।'
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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