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ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने पर कलकत्ता हाई कोर्ट सख्त, पूछा- स्पीकर के फैसले पर रोक क्यों नहीं?

 Reported By: Onkar Sarkar Edited By: Malaika Imam
 Published : Jun 11, 2026 06:17 pm IST,  Updated : Jun 11, 2026 06:33 pm IST

कलकत्ता हाई कोर्ट ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का लीडर बनाने के फैसले पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि स्पीकर के इस फैसले पर रोक क्यों नहीं है?

ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने पर कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई सुनवाई - India TV Hindi
ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने पर कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई सुनवाई Image Source : ANI/PTI

कलकत्ता हाई कोर्ट ने TMC नेता शोभन देब चटर्जी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का लीडर बनाने के फैसले पर सवाल उठाया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्ण राव ने राज्य सरकार से पूछा है कि स्पीकर के इस फैसले पर रोक क्यों नहीं है? हाई कोर्ट ने इस बारे में राज्य सरकार से एफिडेविट मांगा है। हालांकि, हाई कोर्ट ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) नियुक्त करने के स्पीकर के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से इंकार कर दिया है। अगली सुनवाई 16 जून को होगी।

शोभन देब चटर्जी के वकील कल्याण बनर्जी ने कहा, "पार्टी ने तय कर लिया है कि विपक्ष का लीडर कौन होगा। विपक्ष का लीडर तय हो गया है, यह बात पब्लिक नहीं की गई है। पहले, जब तृणमूल कांग्रेस विपक्षी पार्टी थी, तो पार्थ चटर्जी को विपक्षी लीडर ने नॉमिनेट किया था। विपक्ष में आने वाली सभी पार्टियों ने नियमों के मुताबिक, विपक्षी लीडर का नाम पब्लिक किया है। और जिनके नाम पार्टी ने लेटर के ज़रिए बताए थे, वही सीट पर बैठे हैं। जैसे, पिछले इलेक्शन के बाद अब्दुल मन्नान, सूर्यकांत मिश्रा, सुजन चक्रवर्ती, पंकज बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी राज्य में विपक्ष के लीडर बने थे। इस बार पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी को चिट्ठी भेजकर जानकारी नहीं दी। जब स्पीकर चुने गए, तो तृणमूल की तरफ से शोभन देब चटर्जी ने उनका स्वागत किया। जब प्रस्ताव लिया गया, तो 70 सदस्य मौजूद थे। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को तृणमूल कांग्रेस से निकाल दिया गया था। इसकी जानकारी भी पार्टी ने चिट्ठी भेजकर स्पीकर को दी थी।"

"वह एक पॉलिटिकल पार्टी होनी चाहिए"

जस्टिस पूछा- अगर किसी पॉलिटिकल पार्टी से ज्यादा इंडिपेंडेंट्स की संख्या हो तो क्या होगा? इस पर कल्याण बनर्जी ने कहा, "अगर जीतने वाले विधायक की संख्या 30 से कम है, तो विपक्ष का नेता वोटर्स के आधार पर फैसला नहीं कर सकता। अगर 30 से ज्यादा है, तो वह पार्टी कर सकती है। लेकिन जाहिर है कि वह एक पॉलिटिकल पार्टी होनी चाहिए। कोई भी अकेले मिलकर फैसला नहीं कर सकता। यहां जो हो रहा है, वह एक ग्रुप है, कोई मान्यता प्राप्त पॉलिटिकल पार्टी नहीं। असेंबली के नियमों में ग्रुप्स के लिए कोई अहमियत नहीं है। जिन 59 लोगों ने साइन किया है, उनमें से जिन्होंने अलग से स्पीकर को अप्लाई किया है, वे कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं हैं, वे एक ग्रुप हैं। वे किसी भी पॉलिटिकल पार्टी से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन वे फिर भी एक ग्रुप हैं। उन्हें पहले ही विपक्ष के नेता की कार मिल चुकी है। उन्हें घर भी मिल गया है। यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है। स्पीकर विधानसभा के गार्जियन होते हैं। उन्होंने बिना पार्टी लेटर और बिना विपक्ष पार्टी के प्रपोज़ल के किसी को घर और कार कैसे दे दी? जीतने वाली पॉलिटिकल पार्टी तय करती है कि मुख्यमंत्री कौन होगा?  ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने का फैसला तुरंत कैंसल किया जाना चाहिए।"

जस्टिस कृष्ण राव ने कहा- राज्य जानना चाहता है कि अंतरिम स्टे ऑर्डर क्यों नहीं जारी किया जाना चाहिए। जिस व्यक्ति को विपक्ष के नेता की कुर्सी पर बिठाया जा रहा है, उसे विपक्षी पॉलिटिकल पार्टी ने निकाल दिया है। कोर्ट जानना चाहता है कि इस मामले पर राज्य का क्या बयान है?

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