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ईरान जंग की वजह पैदा हुआ ऊर्जा संकट, तमाम देश खोज रहे विकल्प; जानिए चल क्या रहा है

 Published : Apr 17, 2026 04:14 pm IST,  Updated : Apr 17, 2026 04:14 pm IST

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हुई जंग के चलते दुनिया के सामने ऊर्जा क्षेत्र में संकट आया है। भविष्य में इस तरह की समस्या से बचने के लिए अब कई देश परमाणु ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

Nuclear Power Plant- India TV Hindi
Nuclear Power Plant Image Source : AP

Iran War Energy Crises: ईरान जंग के कारण वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में आए संकट से अफ्रीका और एशिया के कुछ देश नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। तमाम देश अब परमाणु ऊर्जा उत्पादन के बारे में भी विचार कर रहे हैं। अब इन दोनों महाद्वीपों के उन देशों में भी परमाणु ऊर्जा की योजनाएं तेजी पकड़ रही हैं जिनके पास अभी तक यह ऊर्जा नहीं है। जंग की वजह से सबसे अधिक एशिया महाद्वीप प्रभावित हुआ है। मध्य पूर्व के अधिकांश तेल और प्राकृतिक गैस की खपत इसी महाद्वीप में थी। जंग की वजह से अफ्रीका भी इसकी चपेट में आया है। इसके अलावा अमेरिका और यूरोप भी संकट की मार झेल रहे हैं।

परमाणु ऊर्जा से निकलेगा हल?

अब जब ऊर्जा संकट बढ़ा है तो जिन अफ्रीकी और एशियाई देशों के पास परमाणु संयंत्र हैं वो अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहे हैं। ऐसा इस वजह से किया जा रहा है ताकि अल्पकालिक ऊर्जा आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। जिन देशों के पास अभी परमाणु ऊर्जा नहीं है वो भविष्य में ऐसे संकट से बचने के लिए दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा योजनाओं पर तेजी से काम कर रहे हैं।

भविष्य पर है नजर

वैसे देखा जाए तो परमाणु ऊर्जा मौजूदा संकट का कोई त्वरित समाधान नहीं है। परमाणु ऊर्जा विकसित करने में दशकों लग सकते हैं, खासकर उन देशों के लिए जो इस क्षेत्र में नए हैं। लेकिन, 'काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' के जोशुआ कर्लांट्जिक का कहना है कि परमाणु ऊर्जा के प्रति आज की गई दीर्घकालिक प्लानिंग, भविष्य में इन देशों की समग्र ऊर्जा व्यवस्था का एक स्थायी हिस्सा बन जाएंगी।

क्या कर रहे हैं एशियाई और अफ्रीकी देश?

ईरान जंग के चलते दक्षिण कोरिया परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि ताइवान अपने उन परमाणु रिएक्टरों को फिर से चालू करने पर विचार कर रहा है जिन्हें पहले बंद कर दिया गया था। अफ्रीका में भी, भविष्य में परमाणु रिएक्टर बनाने की योजनाओं को अब और भी अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। केन्या, रवांडा और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने इस दिशा में अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है।

'तेज हुई परमाणु पुनर्जागरण की प्रक्रिया'

बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स की रचेल ब्रॉन्सन का कहना है कि इस जंग ने वैश्विक स्तर पर एक परमाणु पुनर्जागरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। अब विभिन्न देश जीवाश्म ईंधन बाजारों से जुड़े जोखिमों से मुक्ति पाने के लिए नए विकल्पों की तलाश में हैं। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, वर्तमान में 31 देश परमाणु ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं, जिससे वैश्विक बिजली की कुल मांग का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा पूरा होता है। एजेंसी का यह भी कहना है कि 40 अन्य देश या तो इस तकनीक को अपनाने पर विचार कर रहे हैं या फिर परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की तैयारियों में जुटे हैं।

अमेरिका और रूस में बढ़ी होड़

ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव ऐसे समय में आ रहे हैं जब अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वाशिंगटन और मॉस्को के बीच मुकाबला तेज हो रहा है। रूस की रोसाटॉम मिस्र का पहला रिएक्टर बना रही है और उसके इथियोपिया, बुर्किना फासो, घाना, तंजानिया और नाइजर के साथ सहयोग समझौते हैं, जिनमें बड़े प्रोजेक्ट्स, अनुसंधान केंद्र, यूरेनियम प्रोसेसिंग सुविधाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।

इससे इतर केवल केन्या और घाना ही अमेरिका के नेतृत्व वाली मॉड्यूलर रिएक्टर पहल में शामिल हुए हैं, लेकिन वाशिंगटन भी इस दौड़ में आगे निकलने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने हाल ही में नैरोबी में एक न्यूक्लियर सम्मेलन आयोजित किया था। अमेरिकी विदेश विभाग के रयान टौगर ने कहा है कि वाशिंगटन अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर सुरक्षित नागरिक न्यूक्लियर रिएक्टरों को तेजी से विकसित करने पर काम कर रहा है।

न्यूक्लियर एनर्जी और जोखिम

न्यूक्लियर एनर्जी न्यूक्लियर बम बनाने की दिशा में भी एक कदम हो सकती है। एडवोकेसी ग्रुप 'फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ जापान' की अयुमी फुकाकुसा ने कहा कि न्यूक्लियर एनर्जी बहुत रिस्की है और यह देशों को एनरिच्ड यूरेनियम जैसे इम्पोर्टेड फ्यूल पर निर्भर बनाए रखेगी। ग्लोबल रिन्यूएबल्स अलायंस के रेक्स अमानसियो ने कहा कि यह देखते हुए कि न्यूक्लियर सेक्टर को डेवलप होने में कई साल लगते हैं, सरकारों को लंबे समय की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार पर फोकस करना चाहिए। एटॉमिक साइंटिस्ट ग्रुप की ब्रॉन्सन ने कहा कि संघर्षों के दौरान न्यूक्लियर प्लांट खतरे में रहते हैं। उन्होंने हाल के उन मामलों का जिक्र किया जिनमें ईरान जंग और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रिएक्टरों को निशाना बनाया गया था। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में क्या हुआ था, दुनिया इससे अनजान नहीं है।

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