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नाइजीरिया मुस्लिम देश है या ईसाई, दोनों धर्मों के बीच क्यों रहता है विवाद?

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Nov 18, 2024 02:48 pm IST,  Updated : Nov 18, 2024 02:48 pm IST

नाइजीरिया में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम और ईसाई आबादी एक साथ रहती है। यहां दोनों की आबादी करीब-करीब आधी है। यहां की कुल आबादी में मुस्लिम करीब 51.1 फीसद और ईसाई करीब 46.9 फीसद हैं।

नाइजीरिया में धार्मिक तनाव - India TV Hindi
नाइजीरिया में धार्मिक तनाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वक्त अफ्रीकी देश नाइजीरिया के दौरे पर हैं। वह रविवार को नाइजीरिया की राजधानी अबुजा पहुंचे और अपने तीन दिवसीय दौरे की शुरुआत की। पहली बार वहां पहुंचे। 17 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला नाइजीरिया दौरा है। नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला अहमद टिनुबू ने अबुजा एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। फेडरल कैपिटल टेरिटरी के मंत्री न्येसोम एजेनवो विके ने प्रधानमंत्री मोदी को अबुजा शहर की 'Key of the City' देकर सम्मानित किया। ऐसे में आइए जानते हैं कि नाइजीरिया मुस्लिम देश है या ईसाई बहुल और इन दोनों धर्मों के लोगों के बीच तनाव क्यों रहता है?

कितनी है नाइजीरिया की आबादी?

अफ्रीकी महाद्वीप के पश्चिम में स्थित नाइजीरिया का पूरा नाम फेडरल रिपब्लिक ऑफ नाइजीरिया है। यह अफ्रीका का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसकी आबादी भारत के राज्य उत्तर प्रदेश से भी कम है। यूपी की आबादी 24 करोड़ है तो वहीं नाइजीरिया में की जनसंख्या 23 करोड़ है। अफ्रीका की तीसरी सबसे लंबी नदी नाइजर के नाम पर इस देश का नाम नाइजीरिया पड़ा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम और ईसाई आबादी एक साथ रहती है। यहां दोनों की आबादी करीब-करीब आधी है। यहां की कुल आबादी में मुस्लिम करीब 51.1 फीसद और ईसाई करीब 46.9 फीसद हैं।

दो हिस्सों में बंटा है नाइजीरिया?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नाइजीरिया दो हिस्सों में बंटा है। इसके उत्तरी हिस्से में मुसलमानों की आबादी ज्यादा है, लेकिन वहां गरीबी भी ज्यादा है। दक्षिणी और पूर्वी नाइजीरिया में ईसाइयों की आबादी अधिक है और इलाके ज्यादा संपन्न हैं। उत्तरी नाइजीरिया में इस्लाम की जड़ें 11वीं शताब्दी से सामने आती हैं। यह धर्म पहली बार बोर्नो में दिखा था, इसीलिए नाइजीरिया के उत्तरी क्षेत्र में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। वहीं, दक्षिणी नाइजीरिया में ईसाई मिशनरी का काम प्रभावी रूप से साल 1842 के आस-पास योरूबालैंड में शुरू हुआ था। इसी वजह से दक्षिणी नाइजीरिया में ईसाई आबादी ज्यादा है। पश्चिमी नाइजीरिया में भी ईसाई धर्म ने पश्चिमी शिक्षा की स्थापना के लिए प्लेटफॉर्म तैयार किया। वहीं, उत्तरी नाइजीरिया के कई इलाकों में यह पूरी तरह से नाकाम रहा। उत्तरी क्षेत्रों में पश्चिमी शिक्षा को ईसाई धर्म के बराबर माना जाता रहा है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला अहमद टिनुबू
Image Source : PTIभारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला अहमद टिनुबू

दोनों धर्मों के बीच तनाव की स्थिति?

नाइजीरिया में मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों के बीच तनाव का एक लंबा इतिहास रहा है। वहां धार्मिक तनाव बढ़ाने वाले कई कारण भी सामने आते हैं। वहां इस्लाम और ईसाई धर्म के लोगों के बीच जगह के लिए प्रतिस्पर्धा चलती ही रहती है। यह धारणा भी लोगों के मन में घर कर गई है कि नाइजीरिया के नेता दूसरों की कीमत पर अपने धर्म और आस्था को बढ़ावा देने के लिए राज्य का प्रयोग करते हैं। यह भी माना जाता है कि वहां अल्पसंख्यकों की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा जाता और उनके प्रति असंवेदनशीलता की संस्कृति है। दरअसल, ईसाइयों के कड़े विरोध के बावजूद नाइजीरिया के कई उत्तरी राज्यों ने इस्लामी शरिया कानून को अपना लिया है। इसकी वजह से भी दोनों समुदायों के बीच विवाद और लड़ाइयां हो चुकी हैं।

नाइजीरिया में इन दोनों ही धर्मों ने स्थानीय लोगों की शिक्षा, संस्कृति, राजनीति और सामाजिक जीवन के कई पहलुओं को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया है। धर्म वैसे भी लोगों की पहचान का एक केंद्रीय हिस्सा माना जाता है। ऐसे में किसी की धार्मिक मान्यता के लिए किसी भी खतरे को उसके पूरे अस्तित्व पर खतरा माना जाता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि इन दोनों धर्मों के बीच की असली लड़ाई अपने-अपने धर्मों को बचाए रखने के लिए है।

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