नई दिल्ली: गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि, नोएडा एक्सटेंशन में किसानों को ज़मीन नहीं लौटाई जाएगी। नोएडा एक्सटेंशन में कई बड़े बिल्डर्स के 100 प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।
यह मामला नोएडा, ग्रेटर नोएडा के कुल 65 गांवों से जुड़ा है। इसमें नोएडा एक्सटेंशन में प्रस्तावित बिल्डरों की परियोजनाएं भी आती हैं। हालांकि नोएडा-ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और मुआवजा बढ़ाए जाने का विरोध किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए प्राधिकरण की याचिकाएं पहले ही खारिज कर दी हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 अक्टूबर, 2011 को दिए गए फैसले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि वह किसानों को 64.7 फीसदी बढ़ा हुआ मुआवजा और 10 फीसदी विकसित भूखंड दे। किसानों की दलील है कि अधिग्रहण रद्द होना चाहिए, क्योंकि वह गैर कानूनी था। सरकार ने आपात उपबंध लगाकर उनकी जमीन अधिग्रहीत कर ली और उन्हें आपत्ति रखने का मौका तक नहीं मिला। इसके बाद अधिग्रहीत जमीनें ज्यादा कीमत पर बिल्डरों को दे दी गईं।
बिल्डरों से मात्र 5-5 फीसदी प्रीमियम लेकर दस और बीस साल के लिए लीज दे दी। बिल्डरों को जमीन देते समय मास्टर प्लान भी तैयार नहीं था। प्राधिकरण ने बिल्डरों को जमीन देकर कमाई की है। दूसरी तरफ बादलपुर और साधोपुर गांव के भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाले वकील ब्रह्म सिंह नागर का कहना है कि उनका मामला बाकी मामले से अलग है। उनकी जमीन वर्ष 2008 में आपात उपबंध लगाकर अधिग्रहीत की गई और उन्होंने तभी हाईकोर्ट में उसे चुनौती दे दी थी। उन लोगों ने मुआवजा भी नहीं लिया है।
नागर की दलील थी कि जिस तरह हाईकोर्ट ने तीन गावों का अधिग्रहण रद्द किया था, उसी तरह उनके अधिग्रहण भी रद्द होने चाहिए। उनकी जमीन औद्योगिक विकास के लिए ली गई थी, जबकि वहां मैमोरियल पार्क और हेलीपैड बना दिया गया।
अथॉरिटी की दलील किसानों की याचिकाओं का विरोध करते हुए नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के वकील एल. नागेश्वर राव ने कहा था कि बिल्डरों को जमीन देकर मुनाफा कमाने के लगाए जा रहे आरोप गलत हैं। प्राधिकरण को जो पैसा मिला उससे विकास किया जा रहा है। उसी से मेट्रो ट्रेन के लिए भी पैसा दिया गया है। विकास का काफी काम वहां हो चुका है इसलिए याचिकाएं रद्द होनी चाहिए। अथॉरिटी का यह भी कहना था कि याचिकाएं देरी से दाखिल की गई हैं, इसलिए देरी के आधार पर याचिकाएं रद्द होनी चाहिए।