क्या होता है जब एक हंसता-खेलता परिवार व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है? और क्या होता है जब प्रतिशोध की आग एक रक्षक को भक्षक बनने पर मजबूर कर देती है? आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह फिल्म महज एक एक्शन ड्रामा नहीं, बल्कि उन अनकही परतों की कहानी है जो अक्सर फाइलों के नीचे दबी रह जाती हैं। फिल्म की शुरुआत एक भावुक झटके के साथ होती है, जहां रणवीर सिंह का किरदार एक ऐसे दलदल में कदम रखता है जहां से वापसी का रास्ता सिर्फ मौत या मुकम्मल कामयाबी से होकर गुजरता है। इलाहाबाद की गलियों से शुरू हुआ यह सफर जब कराची के खतरनाक ल्यारी इलाके तक पहुंचता है तो दर्शकों की सांसें थम जाती हैं। फिल्म में अंडरवर्ल्ड के 'बड़े साहब' का खौफ और गैंगवार की भीषण आग को जिस तरह बुना गया है, वह आपको सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम जो देख रहे हैं, क्या वह सच है या हकीकत की आड़ में भ्रम।
संजय दत्त का भारी-भरकम अंदाज, रणवीर सिंह का जज्बा और एक ऐसा रहस्य जो 20 सालों से सरहद पार पल रहा है, यह फिल्म हर कदम पर अपने पत्तों को इस तरह खोलती है कि आप अंत तक कुर्सी से चिपके रहेंगे। यहाँ दुश्मन सिर्फ सामने खड़ा आतंकी नहीं, बल्कि वह साया है जो सत्ता के गलियारों और अंडरवर्ल्ड के अंधेरों में एक साथ चल रहा है। क्या 'हमजा' अपनी असल पहचान बचा पाएगा? या वह इस खूनी खेल का हिस्सा बनकर रह जाएगा? तैयार हो जाइए एक ऐसे सिनेमाई अनुभव के लिए, जहां हर चेहरा एक नकाब है और हर मोड़ पर एक नया धमाका इंतज़ार कर रहा है। कहानी किस दिशा जाएगी, क्या निर्देशन शुरुआत से अंत तक सधा रहेगा, जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू।
फिल्म की शुरुआत
फिल्म की शुरूआत एक ऐसे मोड़ से होती है जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरने का दम रखती है। कहानी जसकीरत सिंह रांगी (रणवीर सिंह) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका परिवार एक अनुशासित सैन्य पृष्ठभूमि से आता है। एक खुशहाल परिवार का जमीन विवाद के कारण बिखर जाना और उसके बाद की त्रासदी, दो बहनों के साथ हुआ क्रूर अपराध और पिता की हत्या, फिल्म को एक ठोस और संजीदा शुरुआत देती है। यहां निर्देशक आदित्य धर सफल रहते हैं क्योंकि वे जसकीरत के भीतर सुलगती प्रतिशोध की आग को दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब होते हैं। 12 लोगों की हत्या कर जेल पहुंचना और वहाँ अजय सान्याल की नजरों में आना, फिल्म को एक थ्रिलर का जामा पहना देता है। शुरुआत में लगता है कि हम एक गहरी और सलीके से बुनी गई जासूसी कहानी देखने वाले हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह अपनी ही बुनावट में उलझने लगती है।
कहानी का विस्तार
फिल्म की पटकथा चकिया (इलाहाबाद) से शुरू होकर कराची के कुख्यात इलाके ल्यारी तक का सफर तय करती है। यहां अतीक अहमद जैसे वास्तविक किरदारों को 'आतिफ अहमद' के रूप में पेश कर ड्रग्स और हथियारों के अवैध धंधे को दिखाने की कोशिश की गई है। चैप्टर टू में जब कहानी पाकिस्तान के ल्यारी पहुंचती है तो गैंगवार (बलूच बनाम अरशद पप्पू) और 'ल्यारी ऑपरेशन' के दृश्य सामने आते हैं। यहाँ तक तो फिल्म अपनी गति बनाए रखती है, लेकिन जल्द ही यह 'हाइपर-रियलिज्म' और 'शुद्ध कल्पना' के बीच झूलने लगती है।
कहानी में हमजा (रणवीर सिंह) का उत्थान और उसका नवाज शफीक (नवाज शरीफ) के साथ हाथ मिलाकर कराची का बेताज बादशाह बन जाना, सुनने में रोमांचक लग सकता है, लेकिन पर्दे पर यह काफी हद तक अतार्किक प्रतीत होता है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि भारत और पाकिस्तान की हर छोटी-बड़ी घटना के तार एक ही जगह से जुड़े हैं, जो एक समय के बाद दर्शकों के लिए 'डाइजेस्ट' करना मुश्किल हो जाता है। फिल्म में वॉयलेंस की भरमार है, खूनी खेल, बम, धमाकों की कोई कमी नहीं, कई लोगों को ये अट्रैक्ट करेगी, लेकिन हिंसा बर्दाश्त न कर पाने वाले लोगों के लिए भारी पड़ सकती है।
अभिनय
अभिनय के मोर्चे पर फिल्म मिली-जुली प्रतिक्रिया छोड़ती है। रणवीर सिंह को फिल्म में भरपूर स्क्रीन स्पेस दिया गया है। शुरुआत में एक दुखी बेटे और बाद में एक आक्रामक एजेंट के रूप में वह अपना प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन फिल्म के मध्य भाग में जहाँ परिपक्वता और ठहराव की जरूरत थी, वहाँ वह थोड़े कमजोर नजर आते हैं। एक मंझे हुए कलाकार की जो गंभीरता ऐसे डार्क किरदारों के लिए चाहिए, वह कहीं-कहीं गायब दिखती है। हालांकि उनके एक्शन सीक्वेंस और डायलॉग डिलीवरी में वही पुरानी ऊर्जा बरकरार है।
फिल्म के असली सितारे संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और राकेश बेदी साबित होते हैं। इन कलाकारों ने यह सिद्ध कर दिया कि कम स्क्रीन टाइम में भी कैसे छाप छोड़ी जाती है। संजय दत्त का व्यक्तित्व फिल्म में एक वजन पैदा करता है, वहीं अर्जुन रामपाल का किरदार कहानी को मजबूती देता है। आर. माधवन जैसे उम्दा अभिनेता को बहुत कम जगह मिली है, जो उनके प्रशंसकों के लिए निराशाजनक हो सकता है। सारा अर्जुन ने अपनी छोटी सी भूमिका में सधे हुए इमोशन्स दिखाए हैं। वहीं सौम्या टंडन का कैमियो केवल एक थप्पड़ तक सीमित रह गया, उनके पास करने को कुछ खास नहीं था। यामी गौतम का नर्स के रूप में कैमियो और मिशन को अंजाम देना फिल्म के शॉक वैल्यू को तो बढ़ाता है, लेकिन पटकथा में उनकी उपस्थिति अचानक और बिना किसी ठोस आधार के लगती है। उजैर बलूच का रोल निभाने वाली दानिश के पास भी फिल्म करने को कुछ खास नहीं है, उन्हें बहुत कमजोर किरदार मिला है। अक्षय खन्ना के साथ तो इस बार मजाक हुआ है, वो सिर्फ तस्वीरों और जनाजे में लेटे नजर आए हैं।
पटकथा और निर्देशन
निर्देशक आदित्य धर, जिन्होंने अपनी पिछली फिल्मों से एक बेंचमार्क सेट किया था, यहां थोड़े भटकते हुए नजर आते हैं। फिल्म का सबसे बड़ा कमज़ोर पक्ष इसका सेकंड हाफ है। इंटरवल तक जो बिल्ड-अप तैयार किया गया था, वह दूसरे भाग में आकर पूरी तरह बिखर जाता है। कहानी को जरूरत से ज्यादा खींचा गया है, जिससे दर्शक ऊबने लगते हैं।
सबसे बड़ी समस्या फिल्म के लॉजिक के साथ है। वास्तविक दुनिया की अफवाहों और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के दावों को फिल्म में इस तरह सच मानकर पेश किया गया है जैसे वे ऐतिहासिक तथ्य हों। अतीक अहमद की हत्या में केंद्र की सीधी प्लानिंग और अजीत डोभाल जैसे उच्च अधिकारियों का सीधे यूपी पुलिस से डील करना सिनेमैटिक लिबर्टी की सीमाओं को लांघ जाता है। फिल्म समाज का आईना होने के बजाय, दर्शकों को भ्रमित करने वाला एक ऐसा नैरेटिव बुनती है जो बिना सिर-पैर के हर घटना को एक-दूसरे से जोड़ देता है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी रूप से फिल्म में कोई बड़ी कमी नहीं निकाली जा सकती। सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है। ल्यारी की तंग गलियों और गैंगवार के दृश्यों को जिस तरह फिल्माया गया है, वह आपको उस माहौल का हिस्सा बना देता है। फिल्म की 'पिक्चर क्वालिटी' और विजुअल्स काफी समृद्ध हैं, जो इसे एक बड़े बजट की इंटरनेशनल थ्रिलर का लुक देते हैं। VFX का काम भी सराहनीय है, विशेषकर उन दृश्यों में जहां पुराने समय के कराची या गैंगवॉर जैसे हालातों को पुनर्जीवित किया गया है। लेकिन दुर्भाग्य से बढ़िया तकनीक एक कमज़ोर कहानी को पूरी तरह से नहीं बचा सकती।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर प्रभावशाली है और दृश्य की गंभीरता के हिसाब से बदलता रहता है। संगीतकार ने तनावपूर्ण दृश्यों में जिस तरह के 'साउंडस्केप' का उपयोग किया है, वह दर्शकों को स्क्रीन से जोड़े रखने में मदद करता है। शुरुआती इमोशनल दृश्यों का संगीत दिल को छूता है, जबकि एक्शन सीन्स में यह लाउड और ऊर्जावान हो जाता है। हालांकि कोई भी गाना ऐसा नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद आपकी जुबान पर चढ़ा रहे। ज्यादातर गाने पुराने गानों के रीमिक्स हैं, जिसमें अरबी गाना दीदी और हिंदी फेमस सॉन्ग तम्मा तम्मा शामिल हैं।
तर्कहीन जुड़ाव और क्लाइमेक्स
फिल्म के क्लाइमेक्स में बड़े खुलासे करने की कोशिश की गई है, लेकिन वे बहुत प्रभावशाली नहीं बन पाते। 'बड़े साहब' यानी दाऊद इब्राहिम के किरदार को जिस तरह असहाय और लाइफ सपोर्ट पर दिखाया गया, उसने उस हाइप को ठंडा कर दिया जो फिल्म की शुरुआत से बनाई जा रही थी। जमिल जमाली (जो 45 साल से वहां रह रहा एजेंट है) का खुलासा और दाऊद को धीरे-धीरे जहर देने की कहानी काफी फिल्मी लगती है।
नोटबंदी (डिमोनेटाइजेशन) को 'ऑपरेशन ग्रीन लीफ' के नाम से जायज ठहराना और इसे नकली नोटों के कंसाइनमेंट को रोकने का एकमात्र जरिया दिखाना, कहानी को एकतरफा और उपदेशात्मक बना देता है।
वर्डिक्ट: एक औसत सिनेमाई अनुभव
कुल मिलाकर यह फिल्म एक ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना है जो अपने ही वजन तले दब गई है। फिल्म में अच्छे कलाकार हैं, बेहतरीन तकनीक है और एक प्रभावशाली बैकग्राउंड स्कोर भी है, लेकिन जिस चीज़ की सबसे ज्यादा कमी है, वह है एक तार्किक और कसी हुई पटकथा। फिल्म वास्तविकता और कल्पना के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी करती है जो दर्शकों को भ्रमित करती है।
अगर आप रणवीर सिंह के बड़े प्रशंसक हैं और बिना किसी लॉजिक के एक लार्जर दैन लाइफ एक्शन थ्रिलर देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है। लेकिन अगर आप एक संजीदा और वास्तविकता से जुड़ी जासूसी फिल्म की तलाश में हैं तो यह आपको निराश करेगी। यह फिल्म पिछले 10 सालों की घटनाओं को एक काल्पनिक धागे में पिरोने का प्रयास करती है, जो फ्लो में तो है, लेकिन गहराई में शून्य।
रेटिंग: 3/5