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EXCLUSIVE: नक्सलवाद का खात्मा था कितना मुश्किल, सुरक्षा बलों ने जमीन पर झेलीं क्या-क्या मुश्किलें? सुनिए बस्तर IG की जुबानी

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Mar 31, 2026 11:47 am IST,  Updated : Mar 31, 2026 11:47 am IST

दशकों से नक्सलवाद का दंश झेलने वाले भारत में अब शांति की नई सुबह हो गई है। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम की जुबानी सुनिए उस रणनीति की कहानी, जिसने देश में नक्सलियों के मजबूत किले को नेस्तनाबूद कर दिया और 'लाल कॉरिडोर' को खात्मे तक पहुंचा दिया।

naxalism end bastar- India TV Hindi
बस्तर IG ने सुनाई नक्सलवाद के खात्मे की कहानी। Image Source : REPORTERS INPUT

Naxalism End in India: कभी भारत का 'रेड कॉरिडोर' कहे जाने वाले इलाके की आबोहवा अब बदल चुकी है। जहां कभी बारूदी सुरंगों की गूंज और माओवादियों के डर से जिंदगी सहमी रहती थी, वहां आज शांति और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। दशकों तक जिन जंगलों में घुसना असंभव सा लगता था, वहां सुरक्षा बलों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया कि आज नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। 31 मार्च, 2026 की डेडलाइन के साथ ही भारत से नक्सली आतंकवाद का पूरी तरह सफाया हो गया। आखिर सुरक्षा बलों ने इस नामुमकिन से लगने वाले टारगेट को कैसे हासिल किया? हथियारों के जोर पर जबरदस्ती भर्तियां करने वाले नक्सलियों से आम पब्लिक को कैसे आजाद कराया? डीआरजी और बस्तर फाइटर्स ने कैसे इस पूरे ऑपरेशन्स की दिशा बदली? इन सबके पीछे की अचूक रणनीति क्या थी? इसे जानने के लिए INDIA TV ने बस्तर रेंज के IG सुंदरराज पट्टिलिंगम से एक्सक्लूसिव बातचीत की। इस इंटरव्यू में पढ़िए 'लाल आतंक' के खात्मे की पूरी इनसाइड स्टोरी।

सवाल- नक्सलवाद के चरम दौर और आज के हालात की तुलना करें, तो जमीन पर सबसे बड़ा फर्क क्या नजर आता है?

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि नक्सली समस्या का समाधान करना शासन का एक मजबूत संकल्प था। उसी संकल्प के तहत हमने अपने सभी प्रयासों को दिशा दी है। अगर हम ऑपरेशनल मोर्चे पर बात करें, तो हमारी जितनी भी स्पेशल फोर्सेज हैं-डीआरजी, एसटीएफ, बस्तर फाइटर्स, कोबरा और सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्सेज जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और छत्तीसगढ़ आर्म्ड पुलिस- इन सभी ने एक साथ बेहतर तालमेल के साथ काम किया। इसके ऑपरेशनल नतीजे काफी निर्णायक रहे हैं। इसके साथ ही, हमारा सभी वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों के बीच बेहतर अंतर-राज्यीय तालमेल रहा है। गृह मंत्रालय लगातार इसे कोऑर्डिनेट करता रहता है। 

उन्होंने बताया, 'पूर्व में नक्सली इस चीज का फायदा उठाते थे कि यदि एक राज्य में ऑपरेशन चल रहा है और दूसरे में नहीं, तो वे दूसरे राज्य में जाकर कुछ समय के लिए शरण ले लेते थे और बाद में फिर से रीग्रुप हो जाते थे। इस परिस्थिति को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के बीच ऐसा समन्वय बनाया है कि अब नक्सलियों के पास भागने और छुपने के लिए कोई जगह नहीं बची है। हर जगह उन पर काफी दबाव बना हुआ है, जिसके कारण उनकी टॉप लेवल लीडरशिप को भी भारी नुकसान हुआ है। माओवादियों की सेंट्रल कमिटी के टॉप कैडर, बसवराजू, का शव मई, 2025 में अबूझमाड़ के जंगलों से बरामद किया गया था। उसके बाद से लगातार बस्तर और बाकी राज्यों में भी शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हुई है।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि इसके परिणामस्वरूप माओवादियों की लीडरशिप लगभग समाप्त हो चुकी है और जो कुछ बचे हैं, वे पुनर्वास के लिए सामने आ रहे हैं। आज की तारीख में केवल मुट्ठी भर कैडर ही बचे हैं और वे भी लगातार, प्रतिदिन दो-चार की संख्या में, हमारे संपर्क में आ रहे हैं। इसी गति से आगे बढ़ते हुए, बहुत जल्द हम बस्तर से नक्सली संगठन को पूर्ण रूप से समाप्त करने में सफल हो जाएंगे।

सवाल- उस दौर में नक्सली संगठन आम जनता पर किस तरह की ज्यादतियां करते थे? तब लोग किस तरह के खौफ में जीने को मजबूर हुआ करते थे?

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि यह पूरा नक्सल संगठन आतंक के बल पर ही चलने वाला संगठन रहा है। 1967 में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब वे जरूर जल, जंगल और जमीन के विषय को लेकर लोगों के बीच गए थे। लेकिन बाद में उनकी दिशा और दशा बदल गई। वे धीरे-धीरे हिंसात्मक गतिविधियों पर ज्यादा विश्वास करने लगे। जो भी उनकी बातों में नहीं आता था, उसे डराने-धमकाने के लिए मारना-पीटना और हत्या करना जैसी गतिविधियों में वे काफी संलिप्त हो गए थे। सुरक्षा बलों पर हमला करना, हथियार लूटना और काफी क्रूरता दिखाना ही उनका मोडस ऑपरेंडी बन गया था। 

उन्होंने बताया, 'इससे जनता के मन में भी इनके प्रति एक प्रकार का भय और आतंक बैठ गया था। इसी का फायदा उठाकर उन्होंने जबरन भर्तियां कीं। कम उम्र के बालक-बालिकाओं, बच्चों और युवा-युवतियों को अपने संगठन में भर्ती किया और धीरे-धीरे अपने आधार क्षेत्र को बढ़ा लिया। लेकिन जब जनता को यह लगने लगा कि ये हमारे हितैषी नहीं हैं, तो इनके खिलाफ माहौल बनने लगा। इसके विरोध में दो-तीन बार जन आंदोलन भी शुरू हुए। 1991-92 में भी हुआ और बाद में 2004-05 में भी, लेकिन दोनों ही बार माओवादियों ने जन आंदोलनों को काफी हिंसक तरीके से कुचल दिया।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि बाद में शासन ने अंदरूनी इलाकों तक काफी पुलिस कैंप खोले और सड़कों का पुनर्निर्माण किया। जब शासन, प्रशासन और पुलिस की पहुंच जनता तक होने लगी, तब जनता में यह विश्वास आया कि अब हमें नक्सलियों से डरने की कोई जरूरत नहीं है। वे नक्सलवाद के खिलाफ खड़े होकर शांति व्यवस्था स्थापित कर सकते हैं और एक सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसी दौरान पुलिस की तरफ से भी माओवादियों के खिलाफ लगातार प्रभावी कार्रवाई की गई। इन सभी परिस्थितियों के कारण, जो भय और आतंक का माहौल था, वह अब बदल रहा है और विश्वास व उम्मीद का एक नया वातावरण बन रहा है।

सवाल- एक अधिकारी के तौर पर, शुरुआती दौर में पुलिस और सुरक्षाबलों के लिए ड्यूटी करना कितना खतरनाक और तनावपूर्ण होता था? नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के ऑपरेशन में सुरक्षाबलों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रहीं? इसमें भौगोलिक, खुफिया तंत्र और स्थानीय लोगों के समर्थन का क्या रोल था।

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि भौगोलिक क्षेत्रफल के हिसाब से देखा जाए तो बस्तर लगभग 42 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एक बहुत विशाल क्षेत्र है। अगर हम तुलना करें, तो यह आकार में केरल राज्य से भी बड़ा है। यहां तक कि बेल्जियम जैसे यूरोपीय देशों के क्षेत्रफल से भी बड़ा है। यहां का टेरेन काफी दुर्गम है- नदी-नाले, पहाड़ और घने जंगल हैं। लगभग 60 प्रतिशत इलाका वन क्षेत्र है। अबूझमाड़ का जंगल तो अपने आप में ही काफी कुख्यात है, इसके नाम का अर्थ ही है अनएक्सप्लोर्ड इलाका। इसके अलावा, यहां की आबादी अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग भाषाएं और बोलियां बोलती है। यहां तमाम आदिवासी समुदायों में गोंडी, हल्बी और भतरी जैसी अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। 

उन्होंने बताया, 'शुरुआत में इन सभी चीजों को समझना सुरक्षा बलों के लिए काफी कठिन था। तब खुफिया जानकारी भी नहीं मिलती थी और हमारी संख्या भी कम थी। पहले इतने थाने और कैंप भी नहीं हुआ करते थे, दो पुलिस स्टेशनों के बीच 40-50 किलोमीटर की दूरी होती थी। बाद में जब नए बलों जैसे- डीआरजी और बस्तर फाइटर्स का गठन हुआ, पैरामिलिट्री फोर्सेज को तैनात किया गया और नए कैंप तथा थाने खोले गए, तो स्थिति बदलने लगी। धीरे-धीरे सुरक्षा बलों को और भी साधन-संसाधन मुहैया कराए गए। आवाजाही के लिए वाहन और आधुनिक हथियार दिए गए।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि भारतीय वायुसेना और बीएसएफ के हेलिकॉप्टर्स भी उपलब्ध कराए गए ताकि जंगल में ऑपरेशन के दौरान अगर कोई जवान घायल हो जाए, तो उसे सुरक्षित निकालकर उसकी जान बचाई जा सके। इन सभी कारणों से सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा और ताकत भी। यही वजह है कि 2023, 2024 और 2025 में हमें ऑपरेशन्स में काफी बढ़त मिली। इससे ऐसा माहौल बन गया कि नक्सलियों ने भी यह मान लिया कि वे हथियारों के बल पर यह युद्ध नहीं जीत सकते। इसलिए अब वे हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने और जनता के बीच रहकर काम करने के नाम पर बड़ी संख्या में वापस आ रहे हैं।

सवाल- सुरक्षाबलों ने इन चुनौतियों से पार पाने के लिए अपनी रणनीति में क्या अहम बदलाव किए? 'ग्रेहाउंड्स' या 'कोबरा' जैसी स्पेशल फोर्सेज के गठन ने इस पूरी लड़ाई की दिशा कैसे बदली?

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि ग्रेहाउंड्स, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की स्पेशल फोर्स है। हमारे यहां बस्तर में DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) और 'बस्तर फाइटर्स' काम करते हैं। बस्तर की इन दोनों स्पेशल फोर्सेज की खासियत यह है कि इनकी भर्ती स्थानीय स्तर पर की गई है। पहले जब पुलिस में भर्ती होती थी, तो अलग-अलग जिलों से लोग आते थे, जिन्हें यहां के दुर्गम रास्तों, स्थानीय भाषा और रीति-रिवाजों की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं होती थी। 

उन्होंने बताया, 'इस बात को ध्यान में रखते हुए शासन ने बस्तर फाइटर्स और डीआरजी में 100 प्रतिशत स्थानीय युवाओं की भर्ती की। इसका उद्देश्य यह था कि यहां के युवा ही भर्ती हों और वे खुद अपने क्षेत्र की शांति, सुरक्षा और विकास में योगदान दें। इन लोगों को यहां के रास्तों की अच्छी जानकारी है, वे स्थानीय भाषा जानते हैं और नक्सलियों के तौर-तरीकों से भी वाकिफ हैं। इससे हमें काफी फायदा मिला।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि इसी सफलता को देखते हुए सीआरपीएफ ने भी स्थानीय युवाओं को मौका देते हुए 'बस्तरिया बटालियन' की भर्ती की। इस प्रकार डीआरजी और बस्तर फाइटर्स हमारी राज्य की फोर्स हैं और बस्तरिया बटालियन एक सेंट्रल फोर्स है, जिसे बस्तर से ही रिक्रूट किया गया है। कोबरा भी सीआरपीएफ की ही एक स्पेशल यूनिट है, लेकिन उसकी भर्ती सामान्य होती है; उसमें पूरे भारत, जैसे- असम, यूपी और कर्नाटक से भी जवान आते हैं।

सवाल- हमें Salwa Judum और District Reserve Guard के बारे में बताइए, इन्होंने एंटी-नक्सल ऑपरेशन में अहम रोल निभाया, इन्होंने कैसे सुरक्षा बलों की मदद की।

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि पहले माओवादी एक साजिश के तहत सुरक्षा बलों, सरकार और प्रशासन के प्रति एक नकारात्मक धारणा सेट करते थे। वे ग्रामीणों के बीच यह दुष्प्रचार करते थे कि सुरक्षा बल उन्हें तंग और प्रताड़ित करेंगे, ताकि पुलिस और जनता के बीच दूरी बनी रहे। इस नकारात्मक माहौल को तोड़ने के लिए सुरक्षा बलों ने लगातार अलग-अलग तरह के कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम्स के माध्यम से जनता तक पहुंचने की कोशिश की और इसका काफी अच्छा असर भी देखने को मिला।

उन्होंने बताया, 'अलग-अलग जिलों में हमारी कम्युनिटी पुलिसिंग का काम लगातार चलता रहता है। हाल ही में बस्तर ओलंपिक्स और बस्तर पंडुम जैसे दो बड़े आयोजन हुए, जिनके माध्यम से शासन, प्रशासन और सुरक्षा बलों की पहुंच आम जनता तक बढ़ी है। इससे हमारे रिश्ते मजबूत और मधुर हुए हैं।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि सलवा जुडूम के समय काफी बड़ी संख्या में लोग अपने गांव छोड़कर थानों या पुलिस कैंपों के नजदीक आकर बसने लगे थे। उनमें से कुछ लोगों को 'स्पेशल पुलिस ऑफिसर' के रूप में नियुक्त किया गया था, क्योंकि उनके पास स्थानीय जानकारी होती थी, वे गाइड के रूप में काम करते थे। बाद में, सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों के बाद इस सिस्टम को खत्म कर दिया गया और उन्हें 'असिस्टेंट कांस्टेबल' के पद पर भर्ती किया गया। ट्रेनिंग के बाद उन्होंने भी नक्सल विरोधी अभियानों में हिस्सा लिया।

उन्होंने कहा कि हमारी स्थानीय भर्तियों में महिला बल को भी शामिल किया जाता है। इसकी सबसे खास बात यह रही है कि हमारी महिला कमांडोज भी सभी ऑपरेशन्स में हिस्सा लेती हैं। जब वे गांव में जनता के बीच जाती हैं, तो लोगों का विश्वास जीतने में उनका बहुत महत्वपूर्ण रोल होता है, क्योंकि महिलाएं और बच्चे हमारी महिला कमांडोज से बड़ी आसानी से संपर्क कर पाते हैं। पहले नक्सलियों की तरफ से सुरक्षा बलों पर जो मनगढ़ंत और झूठे आरोप लगाए जाते थे, वे पिछले 5-6 सालों में बिल्कुल शून्य हो गए हैं। अब वे झूठे आरोप भी नहीं लगा पा रहे हैं। यह सब हमारे लिए एक बहुत बड़ा गेम चेंजर साबित हुआ है।

सवाल- नक्सलियों की बंदूक से डरे स्थानीय आदिवासियों और गांव वालों का भरोसा जीतने के लिए सुरक्षाबलों ने क्या कदम उठाए?

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि शासन का मुख्य फोकस अब इस बात पर है कि जहां नक्सल गतिविधियां समाप्त हो गई हैं, उन इलाकों में विकास कार्यों को रफ्तार दी जाए। क्षेत्र की जनता जैसा चाहेगी, वैसा ही विकास होगा। उन पर किसी प्रकार की कोई चीज थोपी नहीं जाएगी। 

उन्होंने बताया, 'अगर जनता माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस के कलेक्शन या प्रोसेसिंग के क्षेत्र में काम करना चाहती है, तो उन्हें मौका दिया जाएगा। यदि किसी की इको-टूरिज्म या होम-स्टे जैसे कार्यों में रुचि है, तो उन्हें उचित ट्रेनिंग और सुविधाएं दी जाएंगी। बस्तर में रोजगार और विकास को लेकर अपार संभावनाएं हैं और शासन लगातार इसी दिशा में काम कर रहा है। जैसा कि मैंने पहले भी बताया, बुनियादी सुविधाओं को गांवों तक पहुंचाने के लिए सरकार की नियद नेल्लानार नामक एक कार्ययोजना है। इसी योजना के तहत जनता को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।'

सवाल- आपके कार्यकाल का कोई ऐसा ऑपरेशन, जिसने आपको पर्सनल तौर पर सबसे ज्यादा प्रभावित किया हो या जिसे आप नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का 'टर्निंग पॉइंट' मानते हों?

जवाब- आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि मुझे एएसपी से लेकर एसपी और अन्य पदों पर यहां रहने का मौका मिला है। शुरुआत में जब मैं एएसपी और एसपी था, तब सीधे ऑपरेशन्स में जाने का अवसर मिलता था। बाद में, डीआईजी और आईजी के पद पर आने के बाद, आपका मुख्य काम कोऑर्डिनेशन का हो जाता है। 

उन्होंने बताया, 'जब मैं एएसपी था, तब 2005-06 के दौरान मेरा पहला एंटी-नक्सल ऑपरेशन हुआ था। उस समय बस्तर एक ही जिला हुआ करता था, हम बात कर रहे हैं वर्तमान के कोंडागांव, नारायणपुर और कांकेर के ट्राई-जंक्शन इलाके की। उस समय नक्सली अक्सर आईईडी लगाकर बिजली के टावर उड़ा देते थे, जिससे पूरे इलाके की बिजली कट जाती थी। जब बिजली ठीक करने के लिए इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की टीमें जाती थीं, तो नक्सली उन पर भी हमला कर देते थे। कई ऐसी घटनाएं हुईं जहां बिजली विभाग की गाड़ी को उड़ा दिया गया।'

बस्तर रेंज के आईजी ने आगे कहा कि इसी को देखते हुए हम उन्हें सुरक्षा देने के लिए साथ जाने लगे थे। ऐसी ही एक घटना वर्तमान नारायणपुर, कोंडागांव और कांकेर के ट्राई-जंक्शन इलाके में स्थित 'चुरेगांव' नामक गांव में हुई थी। हम इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की टीम को लेकर जा रहे थे, तभी नक्सलियों ने हमला कर दिया। हमारी जवाबी कार्रवाई में एक नक्सली का शव बरामद हुआ था, वह मेरी पहली मुठभेड़ थी। इसके बाद नारायणपुर में एसपी रहते हुए भी मैंने अबूझमाड़ क्षेत्र में दो-तीन ऑपरेशन्स में हिस्सा लिया था।

उन्होंने कहा, 'एंटी-नक्सल अभियानों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मई, 2025 का ऑपरेशन रहा। इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने अबूझमाड़ के जंगल में हुई मुठभेड़ के बाद सीपीआई (माओवादी) संगठन का जनरल सेक्रेटरी, बसवराजू का शव बरामद किया था। उस मुठभेड़ में कुल 27 माओवादी कैडर्स के शव बरामद हुए थे। चूंकि बसवराजू पूरे संगठन का हेड था, उसके मारे जाने के बाद नक्सल संगठन का नेतृत्व बिल्कुल खत्म हो गया। वे दिशाहीन और भ्रमित हो गए। इससे पूरा संगठन बिखरने लगा। इसके बाद बड़ी संख्या में नक्सली कैडर्स- शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक, सरेंडर करने के लिए आगे आने लगे। यह एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।'

आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम बोले कि दूसरा बड़ा ऑपरेशन 2025 की गर्मियों में 'कोरागुट्टा हिल्स' में हुआ। यह ऑपरेशन लगातार 21 दिनों तक चला। 21 दिनों तक लगातार चलने वाला यह अब तक के सबसे लंबे ऑपरेशन्स में से एक है। इसमें 31 कैडर्स के शव बरामद किए गए थे। साथ ही, उनकी हथियार बनाने की फैक्ट्री को भी ध्वस्त कर दिया गया। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के अंतर-राज्यीय बॉर्डर पर उनका जो आखिरी 'सेफ शेल्टर' बचा था, उसे भी हमने नष्ट कर दिया। इन कार्रवाइयों के कारण माओवादियों का पूरा आधार क्षेत्र हिल गया, उनका मनोबल टूट गया और उनकी संख्या व मारक क्षमता काफी कम हो गई। ये सभी घटनाएं इस अभियान के टर्निंग पॉइंट रही हैं।

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