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इमोजी खा रहे शब्द, हर साल करीब 1 लाख से ज्यादा शब्द जिंदगी से हो रहे हैं गायब, सेहत के साथ रिश्तों पर हो रहा असर

 Written By: Pankaj Kumar Edited By: Bharti Singh
 Published : Jun 15, 2026 12:02 pm IST,  Updated : Jun 15, 2026 12:16 pm IST

मोबाइल फोन से चीजें आसान हुई हैं, लेकिन इसके इमोजी शब्दों को खा रहे हैं। लोग कुछ कहने और बोलने की बजाय इमोजी से काम चला रहे हैं। जिससे बातचील के करीब 1लाख शब्द कम हो चुके हैं। एक रिसर्च में ये आंकड़े सामने आए हैं।

इमोजी खा रहे हैं शब्द- India TV Hindi
इमोजी खा रहे हैं शब्द Image Source : INDIA TV

डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार बैठा है, लेकिन सबके हाथ में मोबाइल हैं। ड्राइंग रूम में सोफे पर साथ लोग बैठे हैं, लेकिन बातचीत चैट बॉक्स में हो रही है। ऑफिस कैफेटेरिया में लंच ब्रेक में सब स्क्रीन में डूबे रहते हैं। कार-मेट्रो में बैठे लोग कान में ईयरबड्स और नजर फोन पर रखते हैं। सब एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन बात कोई नहीं करता। यही कारण है कि फोन पर बातचीत में शब्द घट रहे हैं और इमोजी बढ़ रहे हैं। 

इमोजी खा रहे हैं शब्द

जी हां बातचीत तो हो रही है लेकिन बस जुबान से नहीं, मोबाइल की स्क्रीन से। इमोजी बोल रहे हैं और लोग चुप हैं। यही तो असली मसला है हम इंटरनेट से पूरी दुनिया से जुड़े हैं, लेकिन अपने घर में, अपने लोगों से, अपनी आवाज में बात करना भूलते जा रहे हैं। मौन रहना अच्छी बात है लेकिन मोबाइल में डूबकर मुंह बंद रखना सेहत के लिए खतरे की घंटी है। हाल ही में हुई एक रिसर्च के मुताबिक लोगों के रोज बोले जाने वाले शब्दों में करीब 28% कमी आई है। 2005 में एक शख्स दिन में करीब 17 हजार शब्द बोलता था, जो घटकर करीब 12 हजार रह गया। यानी हर साल करीब 1 लाख से ज्यादा शब्द हमारी जिंदगी से गायब हो रहे हैं।

फोन से बढ़ रही हैं रिश्तों में दूरियां

मामला कितना गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि तमाम स्टडीज कह रहे हैं कि लोग दिन में औसतन 150 बार फोन चेक कर लेते हैं, लेकिन परिवार के साथ बातचीत का वक्त 20 मिनट तक सिमट गया है। यानी घर में लोग मौजूद हैं पर एहसास गैरहाजिर है। पहले लिफ्ट में गुड मॉर्निंग, दुकान पर दो बात, बस स्टैंड पर मौसम की चर्चा, ये छोटी-छोटी बातें दिलों के दरवाजे खोलती थीं। अब सेल्फ चेकआउट, ऑनलाइन बुकिंग, GPS और टचस्क्रीन ऑर्डरिंग ने जरूरत की बातचीत भी छीन ली है।

हेल्थ इमरजेंसी बन रहा है फोन

ये सिर्फ रिश्तों का नुकसान नहीं है बल्कि हेल्थ इमरजेंसी बन सकती है। कम बातचीत से अकेलापन, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा बढ़ता है। जब आवाज की गर्माहट खत्म होती है, तो भावनाओं को समझने की ताकत भी कमजोर पड़ती है। शरीर पर भी इसका असर साफ दिखता है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव, सिरदर्द और माइग्रेन बढ़ सकता है। मोबाइल में झुका हुआ पॉश्चर गर्दन और रीढ़ पर असर करता है। तनाव बढ़े तो नींद खराब होती है, पाचन बिगड़ता है और इम्यून सिस्टम पर भी असर पड़ता है। 

तो आज से एक छोटा काम कीजिए, खाने की टेबल पर फोन साइड में रखिए। मैसेज की जगह आवाज में बात कीजिए। किसी अपने को कॉल कीजिए और किसी अजनबी से भी मुस्कुराकर दो लफ्ज कहिए, क्योंकि अल्फाज ही रिश्तों का पुल हैं और इसी पुल से तन-मन को जोड़ने की शुरुआत होती है।

Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)

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