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Narak Chaturdashi in Goa: गोवा में नरक चतुर्दशी क्यों है दीपावली से भी बड़ा त्योहार? यहां जानें कारण

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Oct 16, 2025 03:02 pm IST,  Updated : Oct 16, 2025 03:02 pm IST

Narkasur Vadh Diwas: देश में जहां श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दिवाली मनाई जाती है। वहीं, गोवा में इस पर्व की शुरुआत 'नरक चतुर्दशी' से होती है। यहां यह श्रीकृष्ण के नरकासुर पर विजय की याद में मनाया जाता है। गोवा में इस दिन नरकासुर के बड़े-बड़े पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है।

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गोवा की दीवाली परंपराएं Image Source : CANVA

Why Goa Celebrates Narak Chaturdashi: भारत के हर राज्य अपनी लोक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार त्योहारों को मनाता है। दीपावली भी अलग-अलग हिस्सों में अलग तरीके से मनाई जाती है। जहां उत्तर भारत में यह श्रीराम के अयोध्या लौटने की याद में मनाई जाती है। वहीं, गोवा में इसका सबसे बड़ा आकर्षण नरक चतुर्दशी होती है, जिसे यहां 'नरकासुर वध दिवस' के नाम से जाना जाता है। गोवा में इस दिन का महत्व दीपावली से भी ज्यादा माना जाता है। चलिए जानते हैं क्यों गोवा में दीपावली से भी ज्यादा अहम है नरक चतुर्दशी। 

गोवा में श्रीकृष्ण हैं दिवाली के नायक

गोवा की दिवाली परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को असली नायक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध कर देवताओं और मनुष्यों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। गोवा के लोग इस घटना को 'नरकासुर वध' के रूप में याद करते हैं। इस दिन शहरों और गांवों में राक्षस नरकासुर के विशाल पुतले बनाए जाते हैं। इन पुतलों का दहन सुबह के समय किया जाता है।

नरकासुर वध की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार, नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का राजा था, जो अत्यंत क्रूर और अधर्मी था। उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था और सोलह हजार स्त्रियों को कैद कर लिया था। जब उस अधर्मी का अत्याचार चरम पर पहुंचा, तो देवराज इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इंद्र की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर के राज्य पहुंचे। वहां उन्होंने पहले मुर दैत्य और उसके छह पुत्रों का संहार किया। उसके बाद सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया। क्योंकि नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिए सत्यभामा को इस युद्ध में प्रमुख भूमिका निभानी पड़ी।

नरकासुर का अंत और मुक्ति का पर्व

जब नरकासुर का वध हुआ, तब भगवान कृष्ण ने उसके एकमात्र पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर राज्य सौंप दिया। उसी दिन सोलह हजार स्त्रियों को कैद से मुक्त कराया गया। यह घटना कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हुई थी,  तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। इसे गोवा में दीपावली से एक दिन पहले बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

गोवा में पुतला दहन की परंपरा

नरक चतुर्दशी की सुबह गोवा के हर गांव और शहर में राक्षस नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। ये पुतले लकड़ी, कपड़े और कागज से बनाए जाते हैं, जिनमें आतिशबाजी और रंगीन सजावट होती है। जैसे ही सूरज निकलता है, लोग सामूहिक रूप से पुतलों का दहन करते हैं, जो बुराई के अंत और अच्छाई के उदय का प्रतीक माना जाता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस परंपरा में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।

गोवा में दीवाली की शुरुआत

नरक चतुर्दशी का पर्व गोवा में दीपावली की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन के बाद घरों की सजावट, दीपदान और पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यहां लोगों का मानना है कि जब तक बुराई का अंत नहीं होता, तब तक असली दिवाली नहीं मनाई जा सकती। गोवा में धूमधाम से मनाया जाने वाला नरक चतुर्दशी का उत्सव यह संदेश देता है कि दीवाली का असली अर्थ सिर्फ दीप जलाना नहीं, बल्कि अंदर मौजूद बुराइयों को खत्म करना है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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