Sheetala Asthami Vrat Katha In Hindi: हर साल चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। शीतला अष्टमी को बसोड़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन शीतला माता की पूजा करने से चेचक, खसरा, त्वचा संबंधी रोग और अन्य संक्रमण वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है। इस साल शीतला अष्टमी का व्रत 1 1 मार्च 2026 को रखा जाएगा। शीतला अष्टमी के दिन देवी मां की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही देवी शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन न ही चूल्हा जलाया जाता है और न ही ताजा खाना पकाया जाता है। कहते हैं कि शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का प्रसाद खाने से व्यक्ति हष्ट-पुष्ट बना रहता है और उसे किसी तरह के रोग या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। वहीं बता दें कि बसोड़ा की पूजा शीतला अष्टमी व्रत कथा के बिन पूरी नहीं मानी जाती है। तो आइए यहां पढ़िए शीतला अष्टमी की व्रत कथा।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में ब्राह्माण बुजुर्ग दंपति अपने दो बेटों और बहुओं के साथ हंसी-खुशी के साथ जीवन यापन कर रहे थे। विवाह के काफी समय बाद दोनों बहुओं ने बेटों को जन्म दिया। बच्चों कि किलकारी से पूरा घर रौशन हो गया है। पूरा परिवार खुशी, प्रेम और एकता के साथ रहता था। एक शीतल अष्टमी का त्यौहार आया और फिर सास ने अपने बहुओं को पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करने के लिए कहा। सास ने बहुओं से ये भी कहा कि शीतला अष्टमी के दिन ताजा खाना नहीं बनाया जाता है। इस दिन बासी खाना ही खाया जाता है, इसलिए घर में सब लोग बासी भोजन का ही सेवन करें। उस समय दोनों बहुओं ने हामी तो भर दी लेकिन बाद में आपस में कहने लगी कि बच्चों को बासी खाना कैसे खिलाएं कहीं इससे उनकी तबीयत न बिगड़ जाएं। इसलिए दोनों बहुओं ने अपनी सास से छिपकर बच्चों को ताजा बना हुए खाना खिला दिया।
बच्चों को खाना खिलाने के बाद वे दोनों शीतला अष्टमी की पूजा के लिए मंदिर चली गई। पूजा के बाद जब दोनों घर लौटीं तो उन्होंने देखा कि दोनों बच्चे मृत अवस्था में पड़े हुए हैं। यह भयानक दृश्य देखने के बाद दोनों बहुएं जोर-जोर से रोने लगी। तब दोनों बहुओं ने अपनी सास को सारा सच बता दिया। ये सब सुनकर सास क्रोधित हो गई और कहा कि मेरे समझाने के बाद भी तुम दोनों ने शीतला माता के व्रत का पालन नहीं किया और बच्चों को ताजा खाना खिला दिया। इसी वजह से शीतला माता तुम दोनों से नाराज हो गई हैं। अब तुम दोनों इस घर से निकल जाओ और जब तक तुम अपने बच्चों को जीवित न कर लो घर वापस मत आना। यह सुनकर दोनों बहुएं अपने बच्चों को लेकर घर से बाहर निकल गई।
दोनों बहुएं गांव-गांव भटक रही थीं, तभी उन्हें एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे दो बहनें मिलीं। दोनों बहनें बहुत गंदगी और जूं से परेशान थीं। उनका दुख दोनों बहुओं से देखा नहीं गया और उन्होंने अपने दुख को भूलकर उन दोनों बहनों की मदद करने का फैसला लिया। दोनों बहुएं उन बहनों के सिर से जूएं निकालने लगीं। थोड़ी देर बाद उन्होंने बहनों के सिर से सारी जूं साफ कर दीं। इसपर बहनों ने बहुओं को धन्यवाद देते हुए कहा, 'तुम्हारी मदद से हम बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आशीर्वाद देते हैं कि तुम दोनों जल्द ही पुत्रवती होंगी।' यह सुनकर दोनों बहुएं अपना दुख याद कर रोने लगीं। तभी अचानक शीतला माता स्वयं प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी दिव्य आवाज में कहा, 'तुम दोनों ने इन बहनों की मदद की है और इन्होंने तुम्हें सच्चे मन से आशीर्वाग दिया है। ऐसे में मैं अपना क्रोध भुलाकर तुम्हारे बच्चों को पुनः जीवित कर रही हूं।'
शीतला माता के साक्षात दर्शन और उनके आशीर्वाद से दोनों बहुएं अत्यंत खुश हो गईं और देवी मां का कोटि-कोटि धन्यवाद किया। माता शीतल की कृपा से दोनों बहुएं अपने जीवित बच्चों के साथ घर वापस लौटीं। घर पहुंचने पर, उन्होंने शीतला माता की पूजा और व्रत विधिपूर्वक शुरू किया और यह संकल्प लिया कि वे आगे से कभी भी व्रत के विधान में कोई चूक नहीं करेंगी। इस प्रकार, शीतला माता की कृपा से दोनों बहुओं के जीवन में खुशहाली और समृद्धि वापस आ गई।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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