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शास्त्र कहते हैं दिन में करें हवन, तो रात में क्यों होती हैं शादियां? जानिए कैसे शुरू हुई रात में शादी की परंपरा, दिलचस्प है वजह

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Nov 13, 2025 01:15 am IST,  Updated : Nov 13, 2025 01:15 am IST

Hindu Wedding Rituals: हिंदू धर्म में दूल्हा-दुल्हन अग्नि के साथ फेरे लेकर एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन लेते हैं। भारत में ज्यादातर शादियां रात में होती हैं। क्या यह शास्त्रीय नियमों के विपरीत है या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है? जानें शास्त्र, ज्योतिष और इतिहास के नजर से इसका सच।

Night Marriage Tradition- India TV Hindi
कैसे शुरू हुई रात की शादी की परंपरा Image Source : PEXELS

Hindu Wedding Rituals: हिंदू विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का पवित्र मिलन माना गया है। इस संस्कार का सबसे अहम हिस्सा 'हवन'होता है, जिसके चारों ओर दूल्हा-दुल्हन सात फेरे लेते हैं। हिंदू धर्म में हवन को दिन में करने का विधान है, क्योंकि रात को इसे वर्जित माना गया है। शास्त्रों में हवन को दिन के समय, सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले करने का नियम बताया गया है। लेकिन विरोधाभास यह है कि अधिकतर शादियां रात में ही होती हैं। आखिर क्यों?

शास्त्रों में 'रात के हवन' की मनाही क्यों?

धार्मिक ग्रंथों में रात को अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा का समय बताया गया है। तंत्र-मंत्र और आसुरी साधनाएं भी इस काल में होती हैं। इस दौरान बुरी शक्तियां बहुत शक्तिशाली हो जाती हैं। इसलिए यज्ञ, हवन अनुष्ठान जैसे शुभ काम दिन के प्रकाश में करना श्रेष्ठ माना गया है, ताकि सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा का लाभ मिल सके। शास्त्र कहते हैं कि रात का समय तांत्रिक और अघोरियों के लिए अपने ईष्ट को प्रसन्न करने का होता है। जबकि, गृहस्थों के लिए ईश्वर से जुड़े किए जाने वाले शुभ काम दिन के समय करने का विधान बताया गया है। 

ब्रह्म मुहूर्त का महत्व

धर्म के जानकारों के अनुसार, नई पीढ़ी के लिए इस बाद को समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त को सात्विक और शुभ ऊर्जा से भरा बताया गया है। यही कारण है कि प्राचीन काल में विवाह या अन्य संस्कार प्रातः काल या सूर्यास्त के समय संपन्न किए जाते थे।

ज्योतिषीय कारण: ध्रुव तारा और चंद्र साक्षी

रात्रि विवाह की एक मान्यता यह भी है कि ध्रुव तारा और चंद्रमा को साक्षी बनाकर विवाह करना शुभ माना गया। दरअसल, सात फेरों के दौरान नवविवाहित जोड़े को सप्तऋषि मंडल और ध्रुव तारा दिखाया जाता है। ध्रुव तारा स्थायित्व का प्रतीक है, इसलिए दंपति को इसका दर्शन कराया जाता है। यह केवल रात में ही दिखाई देता है, इसलिए इसे शादी का प्रत्यक्ष साक्षी बनाने के लिए रात का मुहूर्त निकाला जाने लगा। वहीं, चंद्र और शुक्र की रात में उपस्थिति प्रेम और सौम्यता का संकेत देती है।

मुगलों के समय शुरू हुई रात्रि विवाह परंपरा

रात के समय शादी की परंपरा बनने के पीछे एक अहम ऐतिहासिक कारण माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मुगल काल में दिन में शादियां करना असुरक्षित हो गया था। आक्रमणकारियों के डर से हिंदू परिवारों ने अंधेरे में चुपचाप विवाह संस्कार करना शुरू किया। यह एक सामाजिक सुरक्षा उपाय था, जो धीरे-धीरे परंपरा बन गया।

उत्तर और दक्षिण भारत की परंपरा में फर्क

दक्षिण भारत राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में आज भी दिन के उजाले में विवाह करना शुभ माना जाता है। वहीं, उत्तर भारत में रात की शादी सामाजिक परंपरा बन चुकी है। समय के साथ यह रिवाज लोगों के जीवन में रच-बस गया है।

समय बदला, पर परंपरा कायम

रात में हवन करने का विधान न होने बावजूद विवाह जैसे शुभ काम का रात में होना, एक दुर्लभ उदाहरण है। हिंदू धर्म में होने वाला रात्रि विवाह दर्शाता है कि सामाजिक परिस्थितियों ने धर्म के विधान को कैसे बदला। आज ज्योतिष और धर्म दोनों मानते हैं कि सबसे जरूरी बात समय नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त है, जिससे दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहे।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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