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Skand Shashthi 2025: मंगल दोष से राहत दिलाएगा स्कन्द षष्ठी व्रत, जान लें इस व्रत के नियम और विधि

 Written By: Acharya Indu Prakash Edited By: Laveena Sharma
 Published : Nov 25, 2025 02:02 pm IST,  Updated : Nov 25, 2025 02:02 pm IST

Skand Shashthi 2025: कहते हैं जिस किसी की जन्म कुंडली में मंगल अच्छी स्थिति में नहीं चल रहा हो उन्हें स्कंद षष्ठी का व्रत रखकर भगवान कार्तिकेय की पूजा जरूर करनी चाहिए।

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मंगल दोष से राहत दिलाएगा स्कन्द षष्ठी व्रत Image Source : INDIA TV

Skand Shashthi 2025: 26 नवंबर को स्कन्द षष्ठी व्रत है। प्रत्येक मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी पर्व मनाया जाता है, लेकिन कुछ लोग यह व्रत कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को भी करते हैं दोनों ही व्रत मान्य हैं। कार्तिकेय जी का एक नाम स्कंद भी है, इसलिए इसे स्कंद षष्ठी कहते हैं। इसके अलावा इसे गुहा षष्ठी भी कहते हैं। साथ ही कार्तिकेय जी को चंपा का फूल पसंद होने के कारण इसे चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं इस दिन कार्तिकेय जी ने तारकासुर नमक दैत्य के अत्याचार को समाप्त किया था। 

स्कन्द षष्ठी व्रत का महत्व

स्कन्द षष्ठी के अवसर पर मंदिरों में शिव-पार्वती की विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही इस दिन स्कन्द देव कार्तिकेय की स्थापना करके उनकी भी पूजा की जाती है और अखंड दीपक जलाएं जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि स्कन्द षष्ठी व्रत विधिपूर्वक करने से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है और यदि पहले से संतान है और संतान को कोई समस्या या किसी प्रकार की कोई स्वास्थ्य समस्या है तो यह व्रत संतान को इन सबसे बचाने में सहायता करता है। साथ ही कहते हैं कि स्कन्द माता कुमार कार्तिकेय के पूजन से जितनी प्रसन्न होती हैं, उतनी वे स्वयं के पूजन से भी नहीं होती हैं।

स्कन्द षष्ठी व्रत से मंगल ग्रह होगा मजबूत

भगवान कार्तिकेय को षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह का स्वामी कहा गया है। अर्थात जिस किसी की जन्म कुंडली में मंगल अच्छी स्थिति में नहीं चल रहा हो या जिस राशि में मंगल नीच का हो, उन्हें स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा और उनके निमित्त व्रत रखना चाहिए। 

स्कन्द षष्ठी की पूजा विधि

स्कंद षष्ठी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर साफ कपड़े पहनें और भगवान कार्तिकेय की मूर्ति बनाएं। मूर्ति बनाने के लिये कहीं साफ स्थान से मिट्टी लाकर, उसे छानकर, साफ करके किसी पात्र में रखकर पानी से सान लें। कुछ लोग मिट्टी सानते समय उसमें घी भी मिला लेते हैं। अब इस मिट्टी का पिंड बनाकर उसके ऊपर 16 बार ‘बम्’ शब्द का उच्चारण करें। शास्त्रों में ‘बम्’ को सुधाबीज, यानि अमृत बीज कहा जाता है। ‘बम्’ के उच्चारण से यह मिट्टी अमृतमय हो जाती है। अब उस मिट्टी से कुमार कार्तिकेय की मूर्ति बनानी चाहिए। मूर्ति बनाते समय मंत्र पढ़ना चाहिए- “ऊँ ऐं हुं क्षुं क्लीं कुमाराय नमः” इस प्रकार कुमार कार्तिकेय की मूर्ति बनाने के बाद भगवान का आह्वान करना चाहिए और कहना चाहिए- “ऊँ नमः पिनाकिने इहागच्छ इहातिष्ठ”।

फिर मन से भगवान का उपचार करते हुए उनके पैर आदि का पूजन करना चाहिए। इसके बाद भगवान को स्नान कराना चाहिए और स्नान कराते समय कहना चाहिए- “ऊँ नमः पशुपतये”। स्नान के बाद “ऊँ नमः शिवाय” मंत्र से गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य भगवान को अर्पित करें। इस तरह पूजा के बाद भगवान की मूर्ति को आदरपूर्वक जल में विसर्जित कर देना चाहिए। इस तरह कुमार कार्तिकेय की पूजा करने और उनके निमित्त व्रत रखने से व्यक्ति राजा के समान सुख भोगता है और उसे नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। 

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