Viral Video : मुंबई में रहने वाली एक डच महिला ने भारत में अपने बच्चे के पालन-पोषण का एक्सपीरिएंस शेयर किया गया है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे माता-पिता के रूप में रोजमर्रा की ज़िंदगी नीदरलैंड्स में उनके जीवन से बहुत अलग होती है। इवाना जो लगभग नौ वर्षों से भारत में रह रही हैं उन्होंने अपनी बेटी के दूसरे जन्मदिन के अवसर पर माता-पिता के रूप में अपने अनुभवों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत में इतने साल बिताने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ है कि बेहतर या बुरा की तुलना करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उन्हें स्वीकार करना। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में बच्चे के पालन-पोषण के कई पहलू उनके लिए काफी आश्चर्यजनक रहे।
इंस्टाग्राम पर शेयर किया वीडियो
इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर @ivanaperkovicofficial नामक हैंडल से शेयर किया गया है। वीडियो में बच्चों की परवरिश यानी पैरेंटिंग में सामुदायिक भावना को सबसे महत्वपूर्ण अंतर बताया। वे कहती हैं कि, नीदरलैंड में पालन-पोषण अक्सर एक एकाकी, दीर्घकालिक प्रयास जैसा लगता है, जबकि मुंबई में एक मजबूत सहयोग प्रणाली मिलती है। उन्होंने कहा कि मुंबई में गांव वाली मानसिकता एक वास्तविकता है, जहां परिवार के सदस्य और पड़ोसी हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं, चीजों पर नजर रखते हैं या बच्चों के साथ समय बिताते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनकी स्वतंत्र डच मानसिकता को इस वातावरण में ढलने में कुछ समय लगा।
'भारत के पब्लिक प्लेस बच्चों के अनुकूल'
इवाना ने कहा कि भारत में सार्वजनिक स्थान बच्चों के लिए काफी अनुकूल हैं। उन्होंने बताया कि नीदरलैंड के विपरीत, जहां कुछ स्थानों पर छोटे बच्चों का स्वागत सीमित होता है, भारत में लगभग हर जगह बच्चों का सहजता से स्वागत किया जाता है। पैरेंटिंग स्टाइल की तुलना करते हुए उन्होंने समझाया कि डच कल्चर में बच्चों को बहुत कम उम्र से ही आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि भारतीय पालन-पोषण में आपसी सहयोग और सामुदायिक भावना पर अधिक जोर दिया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि डच बच्चे छोटी उम्र से ही अकेले स्कूल जाने जैसे कार्य करते हैं, जबकि भारत में बच्चों को एक व्यापक सामाजिक ताने-बाने के अनुसार सहज किया जाता है।
भारत में सामुदायिक भावना बेहतर
इवाना का मानना है कि, भारत की सामुदायिक भावना बेहतर है। मगर बच्चों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना और उन्हें सत्ता पर सवाल उठाना सिखाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी बेटी स्वाभाविक रूप से त्रिभाषी वातावरण में पल-बढ़ रही है। रोज़ाना डच, अंग्रेजी और हिंदी सुनना उसके लिए पूरी तरह से सामान्य बात हो गई है। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की प्राथमिक भाषा हिंदी है, जिसमें डच, पंजाबी और बंगाली के शब्द भी शामिल हैं, और वे इसे एक सकारात्मक विकास मानती हैं। सुरक्षा के दृष्टिकोण के बारे में उन्होंने टिप्पणी की कि एम्स्टर्डम में, सुरक्षा का तात्पर्य बच्चों को स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने की स्वतंत्रता से है, जबकि मुंबई में, यह कड़ी निगरानी और प्रतिबंधित गतिविधियों से जुड़ी है।
'भारत में बच्चों पर बचपन से शिक्षा का दबाव'
उन्होंने यह भी बताया कि भारत में शिक्षा को लेकर दबाव बहुत कम उम्र से ही शुरू हो जाता है, जो नीदरलैंड में पाए जाने वाले खेल-आधारित प्रारंभिक बचपन के अनुभव के बिल्कुल विपरीत है। इसके अलावा, उन्होंने भारत में घरेलू सहायकों की उपलब्धता की सराहना करते हुए कहा कि इससे उन्हें अपनी बेटी के साथ अधिक समय बिताने का अवसर मिलता है और उनका तनाव कम होता है। उन्होंने कहा कि अगर वह नीदरलैंड में होतीं, तो उनकी बच्ची बहुत कम उम्र में ही डेकेयर जाना शुरू कर देती। हालांकि उन्हें कभी-कभी चिंता होती है कि उनकी बेटी को अन्य बच्चों के साथ पर्याप्त मेलजोल नहीं मिल पा रहा है।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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