भारतीय रेलवे के इतिहास में कई रेलमंत्री आए, लेकिन जो मजेदार किस्सा लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के साथ जुड़ा है वह आज भी चटखारे लेकर बताया और सुनाया जाता है। यह किस्सा है ट्रेनों और स्टेशनों पर प्लास्टिक के कप की जगह मिट्टी के सोंधे कुल्हड़ में चाय परोसने की शुरुआत की। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि लालू के चिर-परिचित अंदाज में लिया गया एक 'देसी' फैसला भी था।
जब रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला
साल 2004 का समय था, जब लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला था। इस दौरान एक दिन, रेल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक चल रही थी और एजेंडा था- भारतीय रेलवे को न केवल घाटे से उबारना, बल्कि उसकी छवि को भी 'आम आदमी' से जोड़ना। लालू यादव ने बड़े-बड़े प्रबंधन गुरुओं और अर्थशास्त्रियों के सुझाव सुने, जो जटिल आंकड़ों और तकनीकी बदलावों की बात कर रहे थे। लेकिन लालू यादव की नजर इन सबसे परे थी। उन्हें भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी समस्या, सबसे आम जगह पर दिखाई दी- स्टेशन पर कूड़े के ढेर और प्लास्टिक के कपों का अंबार।
"स्टेशन कम, कूड़ादान ज्यादा लगता है"
बैठक के दौरान, अचानक लालू यादव ने अपनी खास शैली में एक सवाल दागा, "ई बताओ भाई, हर स्टेशन पर ई प्लास्टिक और कागज के प्याला काहे फेंका रहता है? स्टेशन कम, कूड़ादान ज्यादा लगता है।" इस पर एक अधिकारी ने तुरंत जवाब दिया, "माननीय मंत्री जी, ये 'डिस्पोजेबल कप' हैं। इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाते हैं। ये साफ-सफाई और सुविधा के लिए हैं।"
इसके बाद, लालू जी ने इस पर जो प्रतिक्रिया दी, उसने सबको चौंका दिया। उन्होंने कहा, "कैसी सुविधा? ई प्लास्टिक हजारों साल में गलता नहीं है। ई तो जहर है! और ई कागज वाला कप, ई भी साफ नहीं लगता। जब हम बच्चा थे, तब तो स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय मिलती थी। उसका सोंधा स्वाद... आह!" बस, यहीं से 'कुल्हड़ क्रांति' की शुरुआत हुई।

अधिकारियों से लालू यादव ने पूछा- ई बताओ...
लालू यादव ने तुरंत अधिकारियों से पूछा, "ई बताओ, स्टेशन पर चाय कुल्हड़ में क्यों नहीं बिक सकती?" अधिकारियों ने तुरंत चुनौतियों की लिस्ट सामने रख दी, "सर, कुल्हड़ महंगा पड़ता है। इसकी सप्लाई पूरे देश में एक समान नहीं है। इसे स्टोर करना और टूटने से बचाना भी मुश्किल है। इसके लिए कुम्हारों का बड़ा नेटवर्क चाहिए।"
लालू प्रसाद ने इन दलीलों को अपने अंदाज में खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, "अरे पगला गए हो क्या! ई महंगा कहां से है? एक बार इस्तेमाल करो और फेंक दो, मिट्टी में मिल जाएगा। ना गंदगी, ना प्लास्टिक का झंझट। और ई जो तुम 'सप्लाई' की बात कर रहे हो ना, यही तो मेरा 'प्लान' है।" और फिर लालू यादव ने अपना मास्टरस्ट्रोक बताया। उनका तर्क था कि इस फैसले से एक साथ तीन बड़े फायदे होंगे-
- प्लास्टिक का इस्तेमाल खत्म होगा, जिससे स्टेशन साफ रहेंगे।
- देशभर के लाखों गरीब कुम्हारों को एक बड़ा और स्थिर बाजार मिलेगा। इससे उनका पारंपरिक व्यवसाय फिर से पटरी पर आएगा।
- यात्री को मिट्टी की सोंधी खुशबू वाली, बेहतरीन चाय मिलेगी, जो ट्रेन यात्रा का मजा दोगुना कर देगी।
रेलवे स्टेशनों से गायब होने लगे प्लास्टिक के प्याले
लालू यादव ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे देश के हर जिले के आस-पास के कुम्हारों से सीधे संपर्क करें और उन्हें कुल्हड़ सप्लाई का काम दें। देखते ही देखते, रेलवे स्टेशनों से प्लास्टिक के प्याले गायब होने लगे और उनकी जगह ले ली भूरे रंग के सोंधे कुल्हड़ों ने। जल्द ही 'कुल्हड़ वाली चाय' भारतीय रेल की पहचान बन गई।
हालांकि, लालू यादव के रेलमंत्री पद से हटने के बाद, लॉजिस्टिक्स और मुनाफे की दौड़ में कुल्हड़ एक बार फिर पीछे छूट गए और प्लास्टिक व पेपर कप लौट आए। लालू यादव ने बाद में कई मंचों पर मजाक में कहा भी था कि उन्होंने रेलवे को घाटे से निकालने के लिए कोई रॉकेट साइंस नहीं लगाया, बस 'चाय की तासीर बदल दी।'