Monday, February 26, 2024
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वही चाल-गरजती आवाज, हू-ब-हू तेवर! कहानी में विक्की कौशल नहीं, सिर्फ दिखा 'सैम बहादुर'

सैम बहादुर में किसकी कहानी दिखाई जा रही है ये तो आपको पता ही होगा। विक्की कौशल फिल्म में लीड एक्टर हैं ये भी आप जानते ही होंगे। इसलिए ही हम आपके लिए फिल्म रिलीज से पहले इसका रिव्यू लेकर आए हैं ताकि आप जान सकें की फिल्म की कहानी में कितना दम है और विक्की कौशल कितनी छाप छोड़ पाए हैं।

Jaya Dwivedi Jaya Dwivedi
Updated on: November 30, 2023 23:09 IST
vicky Kaushal, sam bahadur
Photo: INSTAGRAM विक्की कौशल।
  • फिल्म रिव्यू: सैम बहादुर
  • स्टार रेटिंग: 3.5 / 5
  • पर्दे पर: 1 दिसंबर
  • डायरेक्टर: मेघना गुलजार
  • शैली: बायोग्राफी वॉर ड्रामा

इंदिरा गांधी को स्वीटी और छाती में जपानियों की 9 गोली लगने के बाद भी 'आई एम ओके' कहने वाले शख्स की कहानी 'सैम बहादुर' दिखाती है। ये शख्स कोई और नहीं बल्कि भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की है। फिल्म शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। फिल्म में विक्की कौशल लीड रोल में सैम मानेकशॉ का किरदार निभाते नजर आ रहे हैं। फिल्म कैसी है, विक्की कौशल की एक्टिंग कैसी है और कहानी क्या कहती है, ये जानने के लिए आपको ये रिव्यू पढ़ना ही होगा। जाहिर तौर पर इसे पढ़ने के बाद आपको फिल्म देखने में और ज्यादा मजा आएगा। 

फिल्म की कहानी

'सैम बहादुर' की कहानी शुरू होती है पंजाब के अमृतसर से, जहां एक पारसी परिवार में साइरस का जन्म होता है। ये साइरस कोई और नहीं बल्कि सैम मानेकशॉ का पुराना नाम था। फिल्म की कहानी सैम मानेकशॉ के हर छोटे बड़े पहलू को छूने की कोशिश करती है। फौज में भर्ती होने के साथ ही एक मस्तमौला लड़के की प्रेम कहानी की शुरुआत होती है, जिसके चलते जोश से भरी फिल्म के बीच हल्के-फुल्के पल देखने को मिल रहे हैं। कहानी में 3 युद्ध और एक आंतरिक लड़ाई में सैम मानेकशॉ के योदगान की झलक दिखाई गई है। इंटरवल से पहले की कहानी तेजी से आगे बढ़ती है, जिसमें एक के बाद एक सैम मानेकशॉ के ट्रांसफर, तरक्की और सरकार के साथ नेहरू परिवार के करीबी बनने की कहानी दिखाई जाती है। 

भारत-पाकिस्तान विभाजन, जम्मू और कश्मीर को भारत में मिलाने से लेकर पाकिस्तान से पूर्वी बंगाल को आजाद कराने तक सैम के योगदान को बखूबी दिखाने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं कहानी में इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू से एक करीबी के तौर पर दिखाई गई सैम मानेकशॉ की बातचीत फैंस को अंत तक बांधे रखने में मदद करती है। कहानी कहीं बहुत दिलचस्प है तो कहीं कुछ सीन्स में बोर भी करती है। अच्छी बात ये है कि जैसे ही फिल्म की ग्रिप लूज होती है, जोश भरे सीन्स बूस्ट करने में कारगर है। कहानी में काफी गहराई देने की कोशिश की गई है, ऐसे में फिल्म काफी तेजी से सैम मानेकशॉ की जिंदगी की हर घटना को सवा दो घंटे में समेटने की जद्दोजहद करती नजर आ रही है।   

कैसी है एक्टिंग 

शुरुआत करते हैं फिल्म के लीड किरदार विक्की कौशल से...विक्की कहानी में इस तरह जम गए हैं कि उन्हें देखने के बाद कोई कह ही नहीं पाएगा कि वो विक्की कौशल ही हैं। चाल-ढ़ाल, तेवर, आवाज, स्टाइल हर तरह से विक्की कौशल ने सैम मानेकशॉ को अपना लिया है। ये कहा जा सकता है कि उन्होंने सैम मानेकशॉ को घोट के पी लिया है। विक्की कौशल सैम की तरह ही फर्राटे से पंजाबी, अंग्रेजी, हिंदी और बांगला बोल रहे हैं। ये कर पाना किसी भी एक्टर के काबिले तारीफ है। विक्की कौशल की एक्टिंग को देखना किसी विजुअल ट्रीट से कम नहीं है। सैम मानेकशॉ की पत्नी के रूप में नजर आ रहीं सान्या मल्होत्रा एक गृहणी के रूप में अव्वल हैं, लेकिन एक पारसी महिला के किरदार में वो थोड़ा मात खाती हैं। सान्या को पहली बार सादगी और सरलता से भरे रोल में देखा जा रहा और ऐसे किरदार के लिए वो बिल्कुल सटीक च्वाइस साबित हुई हैं। 

इंदिरा गांधी के किरदार में फातिमा सना शेख भी कम नहीं हैं। फातिमा सना शेख का देखने का तरीका काफी हद तक इंदिरा गांधी से मेल खाता है। इंदिरा के चेहरे पर जैसे कभी शिकन नहीं दिखती थी ठीक वैसे ही सना ने अपने किरदार में उतारा है। वो इंदिरा के किरदार के साथ पूरी तरह से जस्टिस करने में कामयाब रही हैं। उनके और विक्की के बीच अलग लेवल का तालमेल देखने को मिलता है, जिसे देखने के बाद आप कहेंगे कि शायद ऐसा ही तालमेल इंदिरा और सैम मानेकशॉ के बीच भी रहा होगा। फिल्म में जीशान अयूब पाकिस्तानी जनरल याहया खान के किरदार में हैं। उन्हें पहचान पाना भी मुश्किल है। प्रॉस्थेटिक मेकअप के साथ जीशान अयूब अपनी दमदार अवाज का जलवा फिल्म में दिखा रहे हैं। यंग याहया खान के रूप में उनकी सैम से दोस्ती एक सच्ची यारी दिखाती है। छोटे-छोटे किरदारों में नजर आए बाकी एक्टर्स भी दमदार एक्टिंग से अपनी छाप छोड़ रहे हैं। 

डायरेक्शन और स्क्रिप्ट

'सैम बहादुर' का डायरेक्शन मेघना गुलजार के हाथों हुआ है। इसी वजह से फिल्म की कहानी में बारीकियों पर काफी ध्यान दिया गया है। किरदारों का उठना-बैठना, डायलॉग डिलीवरी सब ऑन टाइम और ऑन प्वाइंट है। सैम मानेकशॉ की कहानी के हर पहलू को काफी डेप्थ के साथ उठाया गया है। उनके हर लाइफ इवेंट को एक कैप्सूल के तौर पर पेश किया गया है। हर इवेंट की शुरुआत मजेदार और शानदार है, लेकिन दो लाइफ इवेंट्स को पूरी तरह से कनेक्ट नहीं किया जा सका है। इस वजह से फिल्म कई मौकों पर बिखरी लगती है। अगर कोई व्यक्ति इतिहास से सरोकार नहीं रखता तो ऐसे कई मोड़ आते हैं, जहां दर्शक का कनेक्ट कर पाना मुश्किल है। वैसे इस पहलू को नजरअंदाज किया जा सकता है क्योंकि फिल्म देखकर ये जाहिर हो रहा है कि इसकी स्क्रिप्ट तैयार करने के पीछे काफी गहरी रिसर्च की गई है। इसी वजह से सैम के किस्से और उनके तकियाकलाम 'आय एम ओके' और 'स्वीटी' को जरा भी नजरअंदाज नहीं किया गया है।

सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग

मेघना गुलजार के डायरेक्शन में बनी फिल्म की खास बात उसकी सिनेमैटोग्राफी होती है। 'सैम बहादुर' में भी सिनेमाई कमाल देखने को मिला। सिनेमैटोग्राफी के दौरान कई ओवर द शोल्डर शॉट्स का इस्तेमाल किया गया है। सैम की हाइट को देखते हुए इंदिरा और उनकी पत्नी के साथ दिखाए गए कन्वर्सेशन में आई लेवल का सही प्रदर्शन फिल्म में देखने को मिलेगा। बर्ड आई व्यू का फिल्म में कम ही इस्तेमाल है, जो आज कल के चलन के विपरीत है, लेकिन जहां भी है वहां एकदम फिट बैठ रहा है और एक अच्छा ओवरव्यू दे रहा है। कुल मिलाकर जिसका भी फोटो सेंस अच्छा है, उन्हें फिल्म के सीन्स पसंद आएंगे। 

रही बात लोकेशन की तो फिल्म को कई हिल स्टेशन्स पर शूट किया गया है। वैसे वॉर के असल सीन्स ही दिखाए गए हैं, जिन्हें भारत सरकार की लाइब्रेरी से लिया गया है। ऐसे में डायरेक्टर की होशियारी साफ देखने को मिल रही है। ऐसा कर के कई कमियों से बचा गया है, साथ ही साथ रिसोर्सेज का सही इस्तेमाल किया गया है। अगर बात करें एडिटिंग की तो वो भी शानदार है। पूरी फिल्म को डार्क टोन में ही रखा गया है ताकि कलर्ड से ब्लैक एंड व्हाइट सीन्स के बीच के उतार-चढ़ाव को सही से दिखाया जा सके और ये दर्शकों को न खटके।

म्यूजिक और गानों के लिरिक्स

'सैम बहादुर' के गाने रगों में जोश भरने के लिए काफी हैं। 'बढ़े चलो', 'बंदा', 'दम है तो आजा' जैसे जोशीले गानों के अलावा फिल्म में एक स्लो पेस वाला लव सॉन्ग भी है। फिल्म के गाने ठीक उन क्षणों में दिखाए गए हैं, जहां कहानी थोड़ी कमजोर पड़ रही है। ऐसे में गाने फिल्म को सही समय पर कंधा देते दिखे हैं। रही बात गानों के लिरिक्स की तो वो कमाल के हैं और हों भी क्यों न उन्हें गुलजार ने लिखा और उनका काम हमेशा की तरह इस बार भी उच्च दर्जे का रहा है। शंकर-एहसान-लॉय का म्यूजिक और अरिजीत सिंह, श्रेया घोषाल और विशाल ददलानी की आवाज समा बांध देती है। 

कैसी है फिल्म

फिल्म एक बायोग्राफी है। ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि ये बोरिंग होगी, लेकिन मेघना ने कहानी को इस तरह से सेट किया है कि फिल्म आपको हर पल बांधे रखती है। वहीं विक्की कौशल पूरी तरह से एक्टिंग के मामले में सफल रहे हैं। उन्होंने सैम मानेकशॉ की लाइफ के अग्रेशन के साथ ही उनकी लाइफ के दुनिया से छिपे हुए ह्यूमर और रोमांस को बाहर लाया है। सैम बहादुर की करिश्माई पर्सनालिटी, जिसे देखकर पार्टियों में लड़कियां खिल उठती थीं, उसे दिखाने में विक्की कौशल ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। रही बात कमियों की तो फिल्म में सिर्फ एक ही कमी है। फिल्म की कहानी बीच-बीच में टूटी नजर आती है यानी एक किस्से से दूसरे पर स्विच करने में फिल्म बोझिल होती है या कह लें कि अटकती है और इससे दर्शक का कनेक्शन टूटता है। कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है, इतिहास से सरोकार रखती है और मनोरंजन के पल की भी फिल्म में कोई कमी नहीं है। इसलिए फिल्म को एक बार तो जरूर देखें, ये एक फुल पैकेज है।

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