1. Hindi News
  2. Explainers
  3. Explainer: अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध घोष वंदे मातरम् को लेकर क्या है विवाद, संसद में क्यों हो रही बहस? जानें सबकुछ

Explainer: अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध घोष वंदे मातरम् को लेकर क्या है विवाद, संसद में क्यों हो रही बहस? जानें सबकुछ

 Published : Dec 08, 2025 02:28 pm IST,  Updated : Dec 08, 2025 02:28 pm IST

पहली बार सात नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित यह राष्ट्रगीत उस दिन से लेकर आजतक करोड़ों देशवासियों के हृदय में देशभक्ति की अलख जगा रहा है।

अंग्रेजों के खिलाफ...- India TV Hindi
अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध घोष वंदे मातरम् को लेकर क्या है विवाद Image Source : INDIA TV GFX

Explainer: संसद में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर चर्चा हो रही है। पक्ष और विपक्ष दोनों इस विषय पर अपनी राय रख रहे हैं। वंदे मातरम् पर यह बहस केवल एक रस्म नहीं है बल्कि यह ऐसे समय पर हो रही है जब इस गीत को लेकर राजनीति गर्म है। नवंबर महीने में इस गीत के 150 साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने कहा था कि कांग्रेस ने 1937 के अधिवेशन में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के कुछ जरूरी हिस्से हटा दिए। कांग्रेस का यह कदम विभाजन के बीज बोने जैसा था। पीएम मोदी का आरोप था कि राष्ट्रगीत को टुकड़ों में बांटकर इसकी मूल भावना कमजोर कर दी गई है। इस लेख में हम वंदे मातरम् की शुरुआत कैसे हुई और इसको लेकर क्या विवाद है, इसपर चर्चा करेंगे।

Related Stories

कब हुई थी रचना?

सबसे पहले वंदे मातरम् की रचना की बात करें तो बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस राष्ट्रगीत की रचना की थी। इसे पहली बार सात नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया था। उस दिन से लेकर आजतक यह गीत करोड़ों देशवासियों के हृदय में देशभक्ति की अलख जगा रहा है। मातृभूमि की आराधना के प्रतीक इस गीत को सुनते ही ब्रिटिश अफसरों के कान खड़े हो जाते । अंग्रेजों द्वारा वंदे मातरम् गीत को गाने या छापने पर भी बैन लगा दिया गया था। 

भारत का मां दुर्गा के रूप में चित्रण

आगे चलकर यह छह छंदों वाला भजन मूल रूप से बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा बना जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में सन्यासी विद्रोह की कहानी के माध्यम से बंकिम ने भारत को मां दुर्गा के रूप में चित्रित किया था। इसमें सुफलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्...। यह गीत गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को समृद्धि और शक्ति का सपना दिखाता था।

1896 में संगीतबद्ध होने से बढ़ी लोकप्रियता

1896 में  कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इस गीत को एक नई पहचान मिली। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतमय रूप दिया और इसे कलकत्ता के अधिवेशन में गाया। संगीतमय प्रस्तुति ने इस गीत को अमर कर दिया। यह गीत जनमानस में तेजी से लोकप्रिय होने लगा। हर तरफ वंदे मातरम् की गूंज सुनाई देने लगी। तब ब्रिटिश राज ने इसे अपनी सरकार के खिलाफ खतरनाक मान लिया। उसके बाद 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान स्वदेशी आंदोलन में यह नारा बन गया।

1923 कांग्रेस अधिवेशन में गायन के दौरान क्या हुआ?

कालांतर में इस गीत को लेकर मुसलमानों की तरफ से आपत्ति जताई जाने लगी। 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् गायन के समय तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर मंच से उठकर चले गए थे। इस गीत को लेकर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति है कि वंदे मातरम् के जरिए उन पर हिंदू देवी देवताओं की पूजा का दबाव डाला जा रहा है। वंदे मातरम् में मंदिर और दुर्गा शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। 

1937 में केवल दो छंदों के गायन को ही मिली मान्यता

कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में तय किया कि राष्ट्रीय आयोजनों में इस गीत के केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे। यही कारण रहा कि 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के केवल दो छंद ही गाए गए। उस समय से इसी नियम का पालन किया जाने लगा। आजादी के बाद इसे नियम बनाते हुए 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत घोषित कर दिया।

वंदे मातरम् को आज भी आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला हुआ है। लेकिन सरकारी समारोहों में इसके पहले के दो छंदों का ही गायन होता है। हालांकि बाल गंगाधर तिलक ने इसे राष्ट्रीय प्रार्थना और अरविंदो घोष ने मंत्र कहते हुए इसे राष्ट्रगान का दर्जा देने की मांग की थी। यह गीत राष्ट्र गान की जगह तो नहीं ले सका लेकिन राष्ट्रगीत के तौर पर आज भी करोड़ों देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है। अब इसके 150 साल पूरे होने पर संसद में चर्चा कराई जा रही है।

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। Explainers से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।