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Blog: चुनावी मौसम में नेताओं की बदजुबानी, नई नहीं है यह कहानी

 Written By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Mar 03, 2017 06:15 pm IST,  Updated : Mar 03, 2017 06:15 pm IST

चुनाव में भाषा की मर्यादा दिनोंदिन तार-तार हो रही है। आम उम्‍मीदवार से लेकर आलाकमान तक किसी को बदजुबानी से परहेज नहीं रहा। बदजुबानी ना तो अनजाने में हो रही है, ना ही नादानी में।

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चुनाव में भाषा की मर्यादा दिनोंदिन तार-तार हो रही है। आम उम्‍मीदवार से लेकर आलाकमान तक किसी को बदजुबानी से परहेज नहीं रहा। बदजुबानी ना तो अनजाने में हो रही है, ना ही नादानी में। इसे सिर्फ जुबान फिसलना कह देना भी भूल होगी। यह तो तलब-ए-शोहरत और जाति-धर्म के ध्रुवीकरण की सुनियोजित रणनीति के तहत हो रहा है। हर कोई आचार संहिता को कूट-कूट कर अचार बनाने में जुटा है। नेताजी भी जानते हैं कि जुबान फिसलेगी तभी मतदाता का दिल भी उन पर फिसलेगा। 

संसदीय जुबान में तो मिडिल क्‍लास पॉलिटिक्‍स की जुगाली में भी जगह पाना मुश्किल है। बदजुबानी की नहीं कि सनसनी की तलाश में मीडिया बयानों को तरजीह देना शुरू कर देगी। और बिना मशक्‍कत मन की मंशा पूरी हो जाएगी। मतदाता ऑडियोलॉजी कहां देखता है, वह भी भाव-भंगिमा के सम्‍मोहन में बंधता है। मशहूर शायर अदम गोंडवी साहब भी कह गए हैं। 

'तलब-ए-शोहरत है कैसे भी मिले मिलती रहे,

आए दिन अखबार में नाम और तस्वीर छपती रहे..!!

'सियासत में सब कुछ जायज है' का कथन पर जुमला नहीं रहा। अब यह सार्वभौमिक सिद्धांत हो गया है। ऐसा नहीं कि बदजुबानी आज अचानक शुरू हो गई है। अमर्यादित टिप्‍पणी की शुरुआत तो लोकतंत्र के पहले चरण से ही पनपने लगी थी। इंदिरा गांधी को 'गूंगी गुड़िया' और जयप्रकाश नारायण को 'विदेशी आकाओं का मोहरा' जैसे उदाहरण भरे पड़े हैं। सियासत के नुमाइंदे अब स्‍वीकारने लगे हैं कि घोषणापत्र के वादे ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह होते हैं जो देखने-सुनने में भले ही अच्‍छे लगें, पर वे वोटरों का जी नहीं ललचाते। गलाकाट सियासी स्‍पर्धा में हकीम लुकमान का सबसे कारगर नुस्खा बदजुबानी ही है। बदजुबानी से जहां एक तरफ फायर ब्रांड छवि बनाती है, वहीं मीडिया, सोशल मीडिया के साथ-साथ चट्टी-चौराहों की बैठकों में भी नाम की चर्चा टॉप ट्रेंड छूने लगती है। 

कार्यकर्ताओं में बढ़ते जोश और विपुल जनसमर्थन से आत्‍मविश्‍वास के साथ-साथ दल में कद भी बढ़ता है। अब वह दौर नहीं रहा कि निजता के सम्‍मान के नाम पर व्‍यक्तिगत आलोचना और तांक-झांक न हो। अब तो बाथरूम से लेकर बेडरूम तक की एकांतता में दखल भी पार्टी आलाकमान की नजर में वैध और सुपाच्य है। चुनावी समर में उदार होना तो दमदार और कट्टर छवि में कोढ़ निकलने जैसा है। कई उदारवादी आज अपनी क्षेत्र की सीमा में सिकुड़ गए हैं, वहीं आजम खान, योगी आदित्यनाथ, सुरेश राणा, संगीत सोम, साक्षी महाराज जैसे नेता बदजुबानी की वजह से सूबे की सियासत की सुर्खियों में हैं। आदर्श आचार संहिता और सर्वोच्‍च अदालत के हाल ही में दिए फैसले से बेपरवाह इन नेताओं के लिए तो चुनाव आयोग का डंडा भी सोने पर सुहागा जैसा है। 

सेंसर बोर्ड की कैंची लगते ही जैसे फिल्म को अपेक्षित प्रचार-प्रसार मिल जाता है, वैसे ही उम्‍मीदवार पर चुनाव आयोग का डंडा चलते ही प्रचार-प्रसार की सीमा जुबान-दर जुबान हर गली-मुहल्ले तक बगैर मेहनत के चली जाती है। प्रतिद्वंदी को भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज कहना बीते दिनों की बात हो गई है। अब 'ऑन द रिकॉर्ड' गधा, कसाब, रावण, आतंकवादी कहने में भी हिचक नहीं रही। मतदाताओं को क्‍या पसंद है यह तो 11 मार्च को पता चलेगा, लेकिन इतना तो स्‍पष्‍ट है कि चाहे 'सबका साथ, सबका विकास' वाले भगवाधारी हों या 'यूपी के लड़के' या 'बहनजी' हों, सभी को बदजुबानी पसंद है।

(इस ब्लॉग के लेखक शिवाजी राय पत्रकार हैं और देश के नंबर वन हिंदी न्यूज चैनल इंडिया टीवी में कार्यरत हैं)

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