वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को न्यूयॉर्क के मैनहटन फेडरल कोर्ट में पेश किया गया । दोनों के हाथों में हथकड़ियां लगी हुई थी। अदालत में मादुरो ने कहा कि मैं अभी भी अपने देश का राष्ट्रपति हूं, मैं बेगुनाह हूं, मुझे मेरे घर से जबरन उठा कर यहां लाया गया है। फ्लोरेस ने कहा, मैं वेनेज़ुएला की फर्स्ट लेडी हूं और मैं बेगुनाह हूं। फ्लोरेस के माथे और कनपटी पर पट्टियां बंधी हुई थी। जज ने दोनों से कहा कि उन्हें बाद में अपनी पूरी बात कहने का मौका मिलेगा। 17 मार्च को इस केस में अगली सुनवाई होगी। मादुरो और फ्लोरेस के वकील उनकी ज़मानत की अर्जी देने वाले हैं, साथ ही वेनेजुएला दूतावास से संपर्क की मांग भी की गई है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक में रूस, ईरान, फ्रांस, डेनमार्क और कोलम्बिया के राजदूतों ने मादुरो और उनकी पत्नी को अमेरिकी सेना द्वारा अगवा किये जाने की कार्रवाई की निंदा की, जबकि अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा कि मादुरो के खिलाफ नशीले पदार्थ की तस्करी में लिप्त होने के गंभीर आरोप हैं। राष्ट्रपति मादुरो पर ड्रग्स के कारोबार, आतंकवाद और अमेरिका के ख़िलाफ़ साज़िश रचने जैसे आरोप लगाए गए हैं। कुल मिलाकर ये मादुरो की कोर्ट में पेशी कम, अमेरिकी ताकत की नुमाइश ज्यादा लग रही थी। मादुरो को उनके बेडरूम से अगवा करने के बाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया कि अब उनकी निगाह कोलंबिया, क्यूबा, ग्रीनलैंड और मैक्सिको पर है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने कहा कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्द्ध पर अपना वर्चस्व चाहता है और ये करके रहेगा।
ट्रंप सैन्य कार्रवाई के जरिए निकोलस मादुरो का अपहरण करने के बाद बहुत जोश में हैं। वो अब दुनिया के तमाम देशों को अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत के दम पर डराना चाहते हैं। इसीलिए न्यूयॉर्क में जब वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कोर्ट में पेश किय़ा गया तो आम अपराधियों की तरह पूरी दुनिया के सामने उनकी परेड कराई गई। सुरक्षाकर्मी उनको घसीटते हुए कोर्ट परिसर के अंदर ले गए। अमेरिका ये दिखाने की कोशिश कर रहा है कि मादुरो वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति नहीं, बहुत बड़े अपराधी हैं जिनके साथ ये सुलूक होना चाहिए। वहीं, वेनेज़ुएला में अफरातफरी का माहौल है। मादुरो के समर्थक उनको रिहा कराने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि उनके विरोधी मादुरो को अमेरिका ले जाने की ख़ुशी में जश्न मना रहे हैं। वेनेज़ुएला के आम लोगों को लग रहा है कि अब उनके देश में हालात बिगड़ेंगे। ज़रूरी सामानों की क़िल्लत हो जाएगी। इसलिए हज़ारों लोग रात भर लाइन लगा कर रोजमर्रा की जरूरतों का सामान ख़रीद रहे हैं।
उपराष्ट्रपति डेल्सी रॉडरिगेज़ ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति के तौर पर कमान संभाल ली है। शपथ लेने के बाद नई राष्ट्रपति ने अमेरिका के साथ सहयोग करने का प्रस्ताव रखा है। डेल्सी पिछले 7 साल से वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति थीं और निकोलस मादुरो की क़रीबी समझी जाती हैं लेकिन जैसे ही डेल्सी ने वेनेज़ुएला की कमान संभाली, वैसे ही ट्रंप ने उनको भी धमकी दे डाली। ट्रंप ने कहा कि उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के सारे देश अमेरिका के दबदबे को स्वीकार करें, वेनेज़ुएला की नई राष्ट्रपति अमेरिका की सभी शर्तें मान लें, अमेरिका के निर्देश के हिसाब से अपनी सरकार चलाएं, वरना उनका अंजाम निकोलस मादुरो से भी बुरा होगा।
वेनेज़ुएला के बाद अब ट्रंप की नजर उसके पड़ोसी देश कोलंबिया पर है। ट्रंप ने कोलंबिया को भी सैन्य कार्रवाई की धमकी दी। ट्रंप ने कहा है कि कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो एक ड्रग डीलर हैं, वो कोलंबिया से अमेरिका में ड्रग्स की सप्लाई करते हैं, लेकिन अब गुस्ताव पेट्रो के दिन भी पूरे हो गए हैं। असल में ट्रंप अमेरिका के पांचवें राष्ट्रपति जेम्स मनरो की क़रीब 200 साल पुरानी एक नीति को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। जेम्स मनरो ने कहा था कि उत्तरी और दक्षिण अमेरिका, यूनाइटेड स्टेट्स के इलाक़े हैं और इसमें किसी और देश का दख़ल अमेरिका बर्दाश्त नहीं करेगा। अब 200 साल बाद ट्रंप कह रहे हैं कि उनका देश उत्तरी और दक्षिण अमेरिका में कुछ भी करने के लिए आज़ाद है, वो जिस देश में चाहेंगे, दख़ल देंगे, वहां की सरकार गिराएंगे, नई सरकार बनाएंगे, सेना भेजेंगे और किसी ग़ैर-अमेरिकी देश का दख़ल बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसी नीति के तहत ट्रंप लैटिन अमेरिका के उन सभी देशों को टारगेट कर रहे हैं जहां ट्रंप की नीतियों का विरोध करने वाली सरकारें हैं।
ट्रंप ने कोलंबिया के अलावा, क्यूबा, मेक्सिको और पनामा को भी धमकाया है। ट्रंप पनामा नहर का नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहते हैं जबकि प्रशांत और अटलांटिक महासागरों को जोड़ने वाली ये नहर पनामा की है। क्यूबा के साथ तो अमेरिका की दुश्मनी 65 साल से भी ज़्यादा पुरानी है, जब कम्युनिस्ट क्रांति के बाद क्यूबा में फिदेल कास्त्रो ने सत्ता संभाली थी और अमेरिकी कंपनियों को क्यूबा से निकाल बाहर किया था। इसलिए, वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को अगवा करने के बाद ट्रंप ने कहा कि अब क्यूबा का भी नंबर आने वाला है क्योंकि, क्यूबा पूरी तरह से वेनेज़ुएला के भरोसे था। लेकिन अब क्यूबा की सप्लाई लाइन बंद हो गई है। इसलिए क्यूबा की सरकार ख़ुद ब ख़ुद गिर जाएगी, अमेरिका को वहां सेना भेजने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
वेनेज़ुएला में अमेरिकी कार्रवाई का सबसे ज़्यादा विरोध अमेरिका के पड़ोसी देश मेक्सिको में हो रहा है। मेक्सिको में हज़ारों लोग अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबॉम भी अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट मार्च में शामिल हो चुकी हैं। इसलिए ट्रंप के निशाने पर मैक्सिको भी है। ट्रंप ने कहा है कि मेक्सिको की सत्ता पर ड्रग माफ़िया का कब्जा है, वहां की राष्ट्रपति क्लाउडिया ड्रग माफ़िया से डरती हैं, इसलिए मैक्सिको में सैन्य कार्रवाई ज़रूरी है।
सबसे हैरानी की बात तो ये है कि ट्रंप अब अमेरिका के सबसे पुराने मित्र देशों को धमकाने लगे हैं। ट्रंप ने कहा है कि वो अगले दो महीनों के भीतर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को अपने क़ब्ज़े में ले लेंगे। उत्तरी ध्रुव के पास ग्रीनलैंड इस वक़्त डेनमार्क का हिस्सा है। डेनमार्क NATO का सदस्य है। डेनमार्क को किसी भी हमले से बचाने की जिम्मेदारी अमेरिका की भी है लेकिन अब ट्रंप ख़ुद ग्रीनलैंड पर हमला करके उस पर क़ब्ज़ा करने की धमकी दे रहे हैं।
असल में ट्रंप की धमकी के पीछे दो वजहें हैं। एक, अमेरिका की नज़र ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन पर हैं, दूसरा, ट्रंप को लगता है कि उत्तरी ध्रुव पर रूस और चीन का दबदबा है, यूरोपीय देश इन दोनों का मुक़ाबला नहीं कर सकते, ऐसे में अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के नियंत्रण में रहेगा तो रूस-चीन का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। वैसे ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना का बेस पहले से मौजूद है। फिर भी ट्रंप ने धमकी दी है कि वो ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़ा करके रहेंगे।
ट्रंप के इस बयान पर डेनमार्क ने कड़ा ऐतराज़ जताया है। डेनमार्क ने कहा कि अमेरिका की ये धमकी किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पूरी दुनिया अचरज में है कि अमेरिका ने रातों रात एक दूसरे देश के राष्ट्रपति को उठा लिया। क्या अन्तरराष्ट्रीय कानून इस बात की इजाज़त देता है?
अब अमेरिका वेनेजुएला को चलाना चाहता है। अमेरिकी मीडिया में दो तरह की बातें कही जा रही हैं। एक, अमेरिका की दिलचस्पी वेनेजुएला के तंल भंडारों में है। अमेरिका नहीं चाहता कि वेनेजुएला अपना तेल डॉलर के अलावा किसी और मुद्रा में बेचे। चीन को युआन में तेल बेचना तो अमेरिका को बिलकुल पसंद नहीं आया और वेनेजुएला कोई पहला देश नहीं है जिसे पेट्रोडॉलर में तेल न बेचने का खामियाजा भुगतना पड़ा। इराक़ और लीबिया ने भी यही करने की कोशिश की थी। दुनिया ने सद्दाम हुसैन और गद्दाफी का हश्र देखा। आज हथकड़ियां लगाए मादुरो को जब कोर्ट में पेश किया गया तो साफ हो गया कि मादुरो का अंत क्या होगा लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या वेनेजुएला के लोग इस बात को स्वीकार करेंगे कि कोई विदेशी ताकत उनके मुल्क को नियंत्रित करे? क्या वहां के लोग चाहेंगे कि वेनेजुएला के संसाधनों का इस्तेमाल उनके कल्याण की बजाय अमेरिका को मजबूत करने के लिए किया जाए? (रजत शर्मा)
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