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Viral: 'किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान' झूठी है ये कहावत, यहां जानिए असली कहावत

 Edited By: India TV Lifestyle Desk
 Published : Feb 09, 2021 10:40 am IST,  Updated : Feb 09, 2021 10:42 am IST

आप भी इस कहावत को सालों से बोलते या सुनते आए होंगे। लेकिन आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे कि इस कहावत का गधे से कोई संबंध ही नहीं है।

कहावतें- India TV Hindi
कहावतें Image Source : INDIA TV

हम और आप बचपन से ही कई तरह की कहावतें सुनते आए हैं। बुरे काम का बुरा नतीजा, बातों के भूत हाथों से नहीं मानते, सौ सुनार की एक लुहार की...और भी कई तरह की। इसी तरह की एक कहावत आपने सुनी होगी..किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान। कई जगह इसे अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान भी कहा जाता है। किस्मत की कारीगरी को दर्शाने वाली इस कहावत को आपने पढ़ा और सुना होगा और कई जगह आपने शायद कहा भी हो।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये कहावत गलत है, असली कहावत कुछ और है, लेकिन समयकाल के चलते ये अपभ्रंश यानी बिगड़ते बिगड़ते कुछ और हो गई है।

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चलिए जानते हैं कि चक्कर क्या है। दरअसल इस कहावत 'किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान' के बारे में कहा गया है कि ये फारसी कहावत है। यानी फारस में इसका जन्म हुआ। लेकिन इस कहावत में 'गधा' शब्द गलत है। यानी जो लोग अब तक इस कहावत के जरिए गधे को पहलवान कह रहे थे वो गलत थे।

क्या है असली कहावत, चलिए जानते हैं कि असली कहावत क्या है। असली कहावत है 'किस्मत मेहरबान तो गदा पहलवान'। अब आप कहेंगे कि गदा कैसे हो गया। आपको बताते हैं फारसी में गदा का मतलब है फकीर, भिखारी। यानी अगर किस्मत मेहरबान तो हो फकीर भी पहलवान हो सकता है। 

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अब अगर फारसी में इस कहावत में गधा ही लिखना होता तो खर लिखा जाता, क्योंकि फारसी में गधे को खर कहते हैं, जिस से निकला है ख़रगोश यानी गधे के कान, या गधे जैसे कान रखने वाला जानवर।

यानी कहावत में गधा कहीं नहीं है, भारत और एशियाई देशों में इस कहावत में गधे का नाम ऐसे ही शामिल हो गया जैसे दूध में पानी। आप अपभ्रंश तो जानते ही होंगे सालों तक बोले जाने के बाद बोलियां और भाषाएं तक कुछ का कुछ हो जाती हैं। उनका रूप बिगड़ जाता है औऱ इसी वजह से उनका अर्थ भी बिगड़ जाता है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत-इंगलिश व्याकरण के प्रख्यात प्रोफेसर रह चुके मोनियर विलियम्स का कहना था कि संस्कृत में भी गधे को गधा नहीं कहा जाता, उसे खरह कहा जाता है। उनका कहना था कि फारसी और संस्कृत में कई शब्दों के अर्थ एक जैसे अर्थ बताते हैं। उनका उच्चारण भी कमोबेश कुछ कुछ एक जैसा होता आया है। इससे साबित होता है कि जब ये कहावत बनी होगी तो गधे को ध्यान में रखकर नहीं बनी होगी, अगर गधे को ध्यान या फोकस में रखा गया होता तोकहावत में खर या खरह शामिल होता।

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तो आप समझ गए होंगे, जिस कहावत को आप सालों से सुनते कहते आए हैं, वो दरअसल कुछ और है और आम जनता इस कहावत के जरिए गधों की खिंचाई करती आई है।

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