4 Years of Taliban Rule in Afghanistan: आज से ठीक 4 साल पहले 15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार ढह गई थी। अमेरिकी और NATO सैनिकों के देश छोड़ने के साथ ही तालिबान ने तेजी से सत्ता पर कब्जा कर लिया। उस वक्त अफगानों को एक अनिश्चित भविष्य का डर सताने लगा था। तालिबान ने भले ही नरमी और सबको साथ लेकर चलने का वादा किया था, लेकिन 4 साल बाद उनकी हकीकत सामने है। तालिबान ने एक सख्त और दमनकारी शासन स्थापित किया है, जिसने कानून, न्याय और नागरिक अधिकारों को पूरी तरह कुचल दिया है।
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औरतों और अल्पसंख्यकों पर जमकर सितम
तालिबान ने 2004 का संविधान रद्द कर दिया और मुल्ला हिबतुल्लाह अखुंदजादा कंधार से अपनी मर्जी के फरमान चलाते हैं। औरतों और लड़कियों के खिलाफ उनकी नीतियां इतनी सख्त हैं कि मानवाधिकार संगठनों ने इसे लैंगिक भेदभाव का सबसे खराब रूप बताया है। औरतों को प्राइमरी स्कूल से आगे पढ़ने, नौकरी करने और सार्वजनिक जगहों पर जाने की मनाही है। बिना किसी पुरुष रिश्तेदार यानी कि महरम के बाहर निकलना भी उनके लिए मुश्किल है।
तालिबान ने महिला मामलों के मंत्रालय को खत्म कर इसे 'नैतिकता के प्रचार और बुराई की रोकथाम' मंत्रालय में बदल दिया। यह मंत्रालय औरतों के खिलाफ छापेमारी, गिरफ्तारियां और निगरानी जैसे काम करता है। इसके अलावा, हजारा, शिया, सिख और ईसाई जैसे अल्पसंख्यक समुदायों पर भी जुल्म हो रहा है। पंजशीर प्रांत, जहां तालिबान के खिलाफ सबसे ज्यादा प्रतिरोध है, वहां बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, यातनाएं और बिना मुकदमे की हत्याएं हो रही हैं।
डर के जरिए छिपाए जा रहे हैं तालिबान के जुर्म
पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की आवाज को डर, हिंसा और मनमानी गिरफ्तारियों से दबाया जा रहा है। इससे लोग डर के मारे चुप हो गए हैं, और सूचनाओं पर पर्दा डालकर तालिबान के जुल्म छिपाए जा रहे हैं। फिर भी, कई औरतें और आम नागरिक खामोशी से विरोध की आवाज को बुलंद कर रहे हैं। औरतें सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही हैं, तो कुछ लोग चोरी-छिपे लड़कियों के लिए स्कूल चला रहे हैं और जुल्मों का रिकॉर्ड रख रहे हैं, ताकि भविष्य में इसका हिसाब मांगा जा सके।
भले ही ज्यादातर देश तालिबान को अफगानिस्तान की वैध सरकार नहीं मानते, कुछ देश अब उनके साथ नजदीकी बढ़ा रहे हैं। पिछले महीने रूस ने तालिबान को मान्यता दी, और चीन भी उनके साथ आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत कर रहा है। भारत ने भी हाल ही में अपने विदेश मंत्री के जरिए तालिबान के साथ मुलाकात की, जिसके बाद तालिबान ने भारत को 'महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार' बताया।

अंतरराष्ट्रीय मदद को जबरदस्ती हड़प रहा तालिबान
अफगानिस्तान में इंसानी मदद अब भी पहुंच रही है, लेकिन एक अमेरिकी निगरानी संस्था की ताजा रिपोर्ट बताती है कि तालिबान इस मदद को जबरदस्ती हड़प रहा है। पहले अमेरिका अफगानिस्तान की 40 फीसदी से ज्यादा इंसानी मदद देता था, लेकिन अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से USAID का फंड खत्म हो गया है। इससे अस्पताल बंद हो रहे हैं, कुपोषण बढ़ रहा है, और हालात बदतर हो रहे हैं। ईरान और पाकिस्तान से लाखों अफगानों की जबरन वापसी ने इस संकट को और गहरा दिया है।
संयुक्त राष्ट्र ने कतर में तालिबान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच बातचीत कराने की कोशिश की, लेकिन इसमें कोई खास कामयाबी नहीं मिली। तालिबान ने 2024 में पहली बार इन बातचीत में हिस्सा लिया, लेकिन शर्त रखी कि औरतों और नागरिक संगठनों को शामिल न किया जाए। नतीजा? कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।
तालिबान पर दबाव डालने की तैयारी में दुनिया!
तालिबान के जुल्म न सिर्फ अफगानिस्तान में, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी असर डाल रहे हैं। यमन में हूती विद्रोहियों ने तालिबान की तरह ही औरतों पर पाबंदियां लगानी शुरू कर दी हैं। इसे 'तालिबानीकरण' का नाम दिया जा रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ कदम उठाए गए हैं। जुलाई में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने मुल्ला अखुंदजादा और तालिबान के चीफ जस्टिस के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया।
इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, नीदरलैंड और कनाडा ने तालिबान के खिलाफ लैंगिक भेदभाव का मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में लाने की प्रक्रिया शुरू की है। यह पहली बार होगा कि ICJ में ऐसा मामला आएगा। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र को एक स्वतंत्र जांच तंत्र बनाना चाहिए, जो तालिबान के जुल्मों का रिकॉर्ड रखे और भविष्य में मुकदमों की नींव तैयार करे। अगर दुनिया ने अब दबाव नहीं डाला, तो अफगान लोगों की तकलीफें और बढ़ेंगी, और तालिबान का जुल्म न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया में औरतों के हक के लिए खतरा बन जाएगा। (एपी: द कन्वर्सेशन)