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Nobel Peace Prize 2021: मारिया रेसा और दिमित्री मुराटोव को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

Edited by: IndiaTV Hindi Desk Published : Oct 08, 2021 02:26 pm IST, Updated : Oct 08, 2021 03:30 pm IST

यह पुरस्कार किसी उस संगठन या व्यक्ति को दिया जाता है, जिसने राष्ट्रों के बीच भाइचारे और बंधुत्व को बढ़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ काम किया हो।

Nobel Peace Prize 2021: मारिया रेसा और दिमित्री मुराटोव को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार- India TV Hindi
Image Source : TWITTER/@NOBELPRIZE Nobel Peace Prize 2021: मारिया रेसा और दिमित्री मुराटोव को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

ओस्लो: शांति के क्षेत्र में काम करने के लिए दिए जाने वाले नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार को हो गई है। मारिया रेसा और दिमित्री मुराटोव को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए' उनके प्रयासों के लिए 2021 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार किसी उस संगठन या व्यक्ति को दिया जाता है, जिसने राष्ट्रों के बीच भाइचारे और बंधुत्व को बढ़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ काम किया हो। पिछले साल यह पुरस्कार विश्व खाद्य कार्यक्रम को दिया गया था, जिसकी स्थापना 1961 में विश्व भर में भूख से निपटने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर के निर्देश पर किया गया था। रोम से काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी को वैश्विक स्तर पर भूख से लड़ने और खाद्य सुरक्षा के प्रयासों के लिए यह पुरस्कार दिया गया। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के तहत एक स्वर्ण पदक और एक करोड़ स्वीडिश क्रोनर (11.4 लाख डॉलर से अधिक राशि) दिये जाते हैं। 

तंजानियाई नागरिक अब्दुलरजाक गुरनाह को साहित्य का नोबेल पुरस्कार 

ब्रिटेन में रहने वाले तंजानियाई लेखक अब्दुलरजाक गुरनाह का नाम  इस वर्ष के साहित्य के नोबेल पुरस्कार के विजेता के रूप में घोषित किया गया। स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि ‘‘उपनिवेशवाद के प्रभावों को बिना समझौता किये और करुणा के साथ समझने’’ में उनके योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ केंट में उत्तर-उपनिवेशकाल के साहित्य के प्रोफेसर के रूप में सेवाएं देते हुए वह हाल ही में सेवानिवृत्त हुए। 

जांजीबार में 1948 में जन्मे गुरनाह 1968 में हिंद महासागरीय द्वीप में विद्रोह के बाद किशोर शरणार्थी के रूप में ब्रिटेन आ गये थे। उन्हें स्वीडिश एकेडमी ने जिस समय पुरस्कार के लिए चुने जाने की सूचना के लिए फोन किया, वह दक्षिण पूर्व ब्रिटेन में अपने घर में रसोई में थे। शुरू में उन्होंने इस फोन कॉल को मजाकिया समझा। उन्होंने कहा कि वह पुरस्कार के लिए चुने जाने पर सम्मानित महसूस कर रहे हैं। गुरनाह ने कहा कि उन्होंने अपने लेखन में विस्थापन तथा प्रवासन के जिन विषयों को खंगाला, वे हर रोज सामने आते हैं। 

उन्होंने कहा कि वह 1960 के दशक में विस्थापित होकर ब्रिटेन आये थे और आज यह चीज पहले से ज्यादा दिखाई देती है। उन्होंने कहा, ‘‘दुनियाभर में लोग मर रहे हैं, घायल हो रहे हैं। हमें इन मुद्दों से अत्यंत करुणा के साथ निपटना चाहिए।’’ गुरनाह के उपन्यास ‘पैराडाइज’ को 1994 में बुकर पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था। उन्होंने कुल 10 उपन्यास लिखे हैं। (भाषा)

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