
इस क़स्बो में रमज़ान में न सिर्फ़ हिंदू मुसलमानों के साथ रोज़े रखते हैं बल्कि मुहर्रम में हिंदू लड़कों की अगुवाई में ताज़ियों के जुलूस निकलते हैं।
मिथी की अस्सी फ़ीसद आबादी हिंदुओं की है। इनकी धार्मिक भावना का सम्मान करते हुए यहां के मुसलमानों ने कभी भी गो-वध नहीं किया। ठीक इसी तरह हिंदू भी मुहर्रम में कभी शादी-ब्याह नहीं करते।

यही नहीं मिथी के हिंदू रमज़ान के दौरान मुसलमानों के लिए खाने-पीने का बंदोबस्त करते हैं और ईद-दिवाली पर दोनों गले मिलकर एक दूसरे को सेवईंया और मिठाी भी खिलाते हैं।
इस क़स्बे में आज तक कभी भी दंगे फ़साद नहीं हुए हैं। यहां मंदिरों में पूजा के समय मुसलमान नमाज़ के वक़्त लाउड स्पीकर का प्रयोग नहीं करते। इसी तरह नमाज़ के वक़्त मंदिरों के घंटे ख़ामोश रहते हैं। रमज़ान में कोई भी सरेआम काता-पीता नहीं है। होली पर क्या हिंदू क्या मुसलमान दोनों रंगों में सराबोर हो जाते हैं।
सही मायने में मिथी आपसी सद्भाव को एक नया ही अर्थ देता है। ये शायद उसे यहां की सूफ़ी विरासत से मिला है। पाकिस्तान में भले ही कहीं दंगे फ़साद हो रहे हों लेकिन उनकी आंच मिथी तक कभी नहीं पहुंची।