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EXCLUSIVE: अभी और कितनी भीषण होगी मध्य-पूर्व की जंग, कब और कैसे होगा अंत? पढ़िए एक्सपर्ट का पूरा एनालिसिस

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Apr 01, 2026 04:13 pm IST,  Updated : Apr 01, 2026 04:13 pm IST

West Asia में जारी जंग का अंत कब और कैसे होगा। अगर ये नहीं रुकी तो दुनिया को क्या परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। INDIA TV के साथ इस इंटरव्यू में जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने हर एक पहलू को विस्तार से बताया है।

Middle East war analysis- India TV Hindi
मध्य-पूर्व का युद्ध किस मोड़ पर आकर खत्म होगा? Image Source : AP

Middle East में भड़की जंग की आग अब महज ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसकी लपटें पूरे विश्व के आर्थिक और कूटनीतिक ढांचे को झुलसा रही हैं। एक ओर जहां अजेय माने जाने वाले अमेरिका की सेना की ताकत की सीमाएं उजागर हो रही हैं, तो वहीं खाड़ी देश अपने अस्तित्व को लेकर डरे हुए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस युद्ध का अंत कब और कैसे होगा? Strait of Hormuz में ईरान के 'चक्रव्यूह' का तोड़ सुपरपावर अमेरिका क्यों नहीं निकाल पा रहा है? और इन सबके बीच, भारत ने अपनी Multi-Align कूटनीति से वैश्विक स्तर पर कैसे खुद को सुरक्षित और मजबूत रख रहा है? इन सुलगते सवालों के जवाब जानने के लिए INDIA TV ने जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत सरीन से बात की है। इस Exclusive इंटरव्यू में उन्होंने जंग के अंजाम, विश्व में रेडिकलाइजेशन के नए खतरे और ग्लोबल पावर शिफ्ट पर बेबाक और जमीनी विश्लेषण दिया, जो वर्तमान जियोपॉलिटिक्स को समझने के लिए अहम है। पढ़िए, इस जंग के हर पहलू को डिकोड करता यह इंटरव्यू।

सवाल- आखिर मध्य-पूर्व की जंग कब और कैसे खत्म होगी। इजरायल, अमेरिका और ईरान में से कोई मानने को तैयार नहीं है, ऐसे में इस युद्ध के और कितने भीषण होने की आशंका है?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि यह जंग कितनी भीषण होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन किस पर कितने हमले करता है। फिलहाल जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक कुवैत में पानी के प्लांट्स और कुछ फैक्ट्रियों पर हमले किए गए हैं, जिससे जहरीले पदार्थ निकलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। ईरान ने धमकी भी दी है कि वह इन पानी के प्लांट्स पर हमला करेगा। इससे साफ है कि युद्ध लगातार फैल रहा है और भीषण रूप ले चुका है। 'इंफॉर्मेशन ब्लैकआउट' के कारण हमें अभी तक हुई पूरी तबाही का ठीक से अंदाजा भी नहीं है। 

उन्होंने कहा, 'जहां तक इस लड़ाई के खत्म होने की बात है, तो इसके तीन ही रास्ते हैं: या तो सभी पक्षों को समझ आ जाए, या वे लड़ते-लड़ते इतने थक जाएं कि युद्ध की गुंजाइश न बचे, अथवा कोई एक पक्ष इतनी बुरी तरह हार जाए कि लड़ने के काबिल ही न रहे। फिलहाल समझदारी से बीच का रास्ता निकलता हुआ नजर नहीं आ रहा। यदि ईरान के साथ कोई समझौता होता भी है, तो ईरान अपनी क्षमताएं बनाए रखना चाहेगा, जो अरब देशों और इजरायल के लिए हमेशा खतरा रहेंगी। दूसरी ओर, ईरान अगर पीछे हटता है, तो उसकी संप्रभुता और वहां की वर्तमान सत्ता पर संकट आ जाएगा। इसलिए वे भी कुछ छोड़ने को तैयार नहीं हैं।'

सुशांत सरीन बोले कि अमेरिका के संदर्भ में देखें तो उसकी शक्ति की सीमाएं अब दुनिया के सामने आ रही हैं। पहले यह धारणा थी कि अमेरिका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता, लेकिन इस बार अमेरिका के सैन्य ठिकानों और युद्धपोतों पर हमले हुए हैं और उन्हें भारी नुकसान हुआ है। अमेरिका का जो दबदबा था, उसे गहरी चोट पहुंची है। दुनिया के कई देशों को अब लगने लगा है कि उन्हें अमेरिका की धौंस सहने की जरूरत नहीं है। ऐसे अस्थिर माहौल में किसी सर्वमान्य और स्थायी समझौते की उम्मीद बहुत कम है।

सवाल- गल्फ देश कब तक सहेंगे। वह ईरान पर पलटवार क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्हें जवाब देने से किस डर ने रोका हुआ है?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि खाड़ी देशों की रणनीति फिलहाल अपना बचाव करने की है। यह कहना गलत होगा कि अमेरिका ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है, क्योंकि वे ईरानी हमलों को विफल करने के लिए अमेरिकी सैन्य उपकरणों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर वे सीधे युद्ध में शामिल हुए, तो युद्ध बहुत व्यापक हो जाएगा। 

उन्होंने कहा, 'खाड़ी देशों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि कल को अगर ईरान ने उनके ऑयल फील्ड्स या समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने वाले प्लांट्स को तबाह कर दिया, तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। बिना पानी के वहां जीवन संभव नहीं है। इसी तबाही की आशंका के चलते उन्होंने खुद को पलटवार से रोका हुआ है। वे नहीं चाहते कि यह युद्ध बेकाबू हो जाए, क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो न केवल उनका क्षेत्र बल्कि पूरी दुनिया कई सालों के लिए प्रभावित होगी। हालांकि, इस स्थिति को देखते हुए दुनिया अब तेल के विकल्प भी तेजी से तलाश रही है, जिससे भविष्य में इन खाड़ी देशों का अर्थव्यवस्था और रेवेन्यू मॉडल खतरे में पड़ सकता है।'

सवाल- इस लंबे खिंचते युद्ध से अमेरिका की दादागिरी कम होती नजर आ रही है, आगे चलकर इसका सबसे बड़ा फायदा किसको होगा?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि जहां तक भारत की बात है, तो हम अपनी जगह ठीक हैं। हमें बेवजह किसी और की लड़ाई में अवसर तलाशने की जरूरत नहीं है। बिना बुलाए किसी मामले में हस्तक्षेप करना समझदारी नहीं है; हमारी नीतियां स्पष्ट होनी चाहिए कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं।

उन्होंने कहा, 'रूस को इससे सीधा फायदा हो रहा है। रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध काफी हद तक बेअसर हो गए हैं, जिससे राष्ट्रपति पुतिन के लिए आर्थिक मुश्किलें कम हुई हैं। यूरोपीय देशों को भी ऊर्जा की सख्त जरूरत है, इसलिए वे अमेरिकी टैरिफ या प्रतिबंधों की परवाह किए बिना अपनी जरूरतें पूरी करेंगे।'

सुशांत सरीन बोले कि चीन के लिए यह स्थिति फायदे और नुकसान, दोनों वाली है। नुकसान यह है कि उसकी सैन्य और रणनीतिक सीमाएं उजागर हो रही हैं; चीन के पास अमेरिका की तरह वैश्विक स्तर पर सैन्य हस्तक्षेप करने की क्षमता नहीं है। साथ ही, ईरानी तेल की सप्लाई रुकने से चीन को आर्थिक नुकसान होगा। लेकिन चीन का सबसे बड़ा फायदा इसमें ये है कि अमेरिका की ताकत कमजोर हो रही है। दुनिया देख रही है कि अगर अमेरिका ईरान को नहीं संभाल पा रहा है, तो वह अन्य छोटे देशों के खिलाफ क्या कर पाएगा। चीन खुद को युद्ध से दूर रखकर बिना लड़े अपनी ताकत को सुरक्षित कर रहा है। 

सवाल- पाकिस्तान इस जंग में कितनी बुरी तरह फंस गया है। एक तरफ, अमेरिका के ऑर्डर को मानना उसकी मजबूरी है और दूसरी तरफ खुलकर सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट के बावजूद ईरान के खिलाफ कुछ बोल भी नहीं पा रहा है।

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि पाकिस्तान इस समय भारी असमंजस और गलतफहमी का शिकार है। एक तरफ वे खुद को दुनिया के मंच पर मध्यस्थ के रूप में पेश करके यह जताना चाहते हैं कि वे बहुत अहम भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन उनकी असलियत यह है कि वे IMF के कर्ज पर निर्भर हैं, वे देश भर में भीख मांगते नजर आ रहे हैं और उनकी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है। देश के भीतर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में लगातार हमले और विद्रोह चल रहे हैं। वहां भारी राजनीतिक अस्थिरता है और वर्तमान सरकार जनता के बीच अलोकप्रिय है।

सवाल- दुनिया में ईंधन का संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में ईरान के पास ऐसी क्या ताकत है कि अमेरिका की नेवी Strait Of Hormuz में घुसकर उसे ईरान की नेवी से तुरंत आजाद नहीं करवा पा रही?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि यह सिर्फ ताकत की बात नहीं है, बल्कि वहां की भौगोलिक स्थिति की भी है। उस पूरे इलाके का भूगोल ऐसा है कि ईरान को एक Natural Advantage मिलता है। उदाहरण के लिए, अगर अफगानिस्तान का भूगोल मैदानी होता, तो क्या तालिबान वह सब कर पाता जो उसने किया? इसलिए भूगोल एक बहुत बड़ा फैक्टर है।

उन्होंने कहा, 'ईरान यह अच्छी तरह जानता है कि उसके पास अमेरिका जैसे युद्धपोत नहीं हैं। इसलिए वह कम लागत में अमेरिका का ज्यादा नुकसान करने वाला Asymmetric Warfare अपना रहा है। ईरान को बड़े विमानवाहक पोतों की जरूरत नहीं है। उनके पास छोटी पनडुब्बियां और 'फास्ट अटैक बोट्स' हैं, जिनमें मिसाइल और आत्मघाती दस्ते तैनात हो सकते हैं। हॉर्मुज का इलाका केवल 20-25 किलोमीटर चौड़ा है। वहां कई ऐसी जगहें हैं जहां से बड़े युद्धपोतों पर घात लगाकर हमला किया जा सकता है। इसके अलावा, ईरान वहां समुद्री Mines भी बिछा सकता है, जिससे वह इलाका अमेरिका के लिए 'किल जोन' बन सकता है।'

सुशांत सरीन बोले कि करीब 20-25 साल पहले अमेरिका ने एक 'वॉर गेम' किया था, जिसमें यह निष्कर्ष निकला था कि अगर ईरान पारंपरिक सैन्य रणनीति के बजाय Asymmetric Warfare का इस्तेमाल करे, तो अमेरिकी फौज हार सकती है। अमेरिका की प्रोफेशनल फौज यह जानती है कि हॉर्मुज में घुसना एक 'चक्रव्यूह' में फंसने जैसा है। वहां कब्जा करना और उसे सुरक्षित बनाए रखना बेहद खर्चीला और जोखिम भरा है। इसलिए अमेरिका सोच-समझकर कदम रख रहा है।

सवाल- क्या दुनिया को रेडिकलाइजेशन की नई लहर के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर ईरान हारा और IRGC टूटा तो क्या वह सद्दाम हुसैन के हारे हुए सैनिकों की तरह इस्लामिक स्टेट जैसा कुछ बनाने में अहम रोल निभा सकता है। अगर यह हुआ तो कितना खतरनाक होगा?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि ऐसा हो सकता है, लेकिन अभी इस पर कुछ भी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है। अमेरिका ने इराक में सबसे बड़ी गलती यही की थी कि सद्दाम को हटाने के बाद वहां की सेना को पूरी तरह भंग कर दिया, जिससे वहां भारी अस्थिरता फैली। अक्सर ताकत के नशे में विजयी देश ऐसी गलतियां करते हैं।

उन्होंने कहा, 'अमेरिका की मांगें हैं कि ईरान अपनी मिसाइलों और परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाए और हिज्बुल्लाह या हमास जैसे अपने प्रॉक्सी गुटों को समर्थन देना बंद करे। लेकिन ईरान इन शर्तों को शायद ही मानेगा। जब ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम तहस-नहस हो चुका है, तो बचाव के लिए उसके पास सिर्फ मिसाइलें ही बची हैं। अगर अमेरिका हजारों किलोमीटर दूर से हमला करेगा, तो ईरान अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता 200 किलोमीटर तक सीमित क्यों रखेगा?'

सुशांत सरीन बोले कि साथ ही, ईरान ड्रोन हमलों में बहुत सक्षम हो चुका है। माना जाता है कि अमेरिका के अत्याधुनिक युद्धपोत भी ईरानी Drone Swarm से खौफ खाते हैं। ऐसे में आधुनिक युद्ध की पेचीदगियां बहुत बढ़ गई हैं। हालात इतने अस्थिर हैं कि यह अनुमान लगाना असंभव है कि युद्ध किस दिशा में जाएगा और इसका अंतिम परिणाम क्या होगा।

सवाल- हम अभी किसी के साइड में नहीं हैं, ना ईरान और ना ही इजरायल-अमेरिका। हम सबसे बातचीत कर रहे हैं। कभी Non-Align रहने वाले भारत की Multi-Align रणनीति ने हमें कैसे फायदा दिया है?

जवाब- एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि मेरी नजर में 'नॉन-अलाइन्ड' और 'मल्टी-अलाइन्ड' सिर्फ शब्द हैं। हम पहले भी सबके साथ बातचीत करते थे और आज भी करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब हम बेवजह की बयानबाजी करने से बचते हैं। पहले हम खूब आदर्शवादी बयान देते थे, लेकिन दुनिया में उसका कोई खास असर नहीं होता था। आज हमारी नीति अधिक यथार्थवादी और संजीदा है। हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं- अपने लोगों को बचाना, अपना व्यापार बचाना और देश की Energy Security सुनिश्चित करना।

उन्होंने कहा, 'देश के भीतर कुछ लोग बेवजह आलोचना करते हैं। जब हमने रूस से सस्ता तेल खरीदा, तो कहा गया कि हम रूस का पक्ष ले रहे हैं। जब हमने अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए आयात संतुलित किया, तो कहने लगे कि हम अमेरिका के सामने झुक गए। आलोचकों का काम सिर्फ कमियां निकालना है।'

सुशांत सरीन बोले कि असलियत यह है कि आज भारत ने ईरान, इजराइल और अरब देशों, सभी के साथ संतुलित रिश्ते बनाए हुए हैं। हम बिना सोचे-समझे किसी युद्ध में मध्यस्थता करने या किसी देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के लिए नहीं कूद सकते। इसके लिए भारी संसाधनों की आवश्यकता होती है। जो लोग यह कहते हैं कि भारत मध्यस्थता क्यों नहीं कर रहा, वे भूल जाते हैं कि हमें बिना बुलाए किसी के झगड़े में पड़ने की जरूरत नहीं है। 

उन्होंने कहा, 'हमारी कूटनीति हमारे राष्ट्रीय हितों से तय होती है, किसी और के दबाव से नहीं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि हाल ही में G7 जैसे दुनिया के सबसे विकसित देशों के सम्मेलन में भारत को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया। यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर भारत अपनी एक स्वतंत्र और मजबूत कूटनीतिक भूमिका निभा रहा है।'

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