Wednesday, February 25, 2026
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रिलेटेबल मगर प्रिडिक्टेबल है जुनैद खान और खुशी कपूर की 'लवयापा', लीड से ज्यादा साइड एक्टर्स करेंगे इंप्रेस

Jaya Dwivedie Published : Feb 07, 2025 01:59 am IST, Updated : Feb 07, 2025 02:01 am IST

निर्देशक अद्वैत चंदन की 'लवयापा' नई पीढ़ी की समस्याओं को उठाती है, जिससे युवा रिलेट भी कर पाएंगे, लेकिन कहानी प्रिडिक्टेबल है। तकनीकी पार्ट फिल्म को कई हिस्सों में मजेदार बना रहा है, लेकिन लीड एक्टर्स इंप्रेस नहीं कर रहे। हल्की-फुल्की कहानी कितनी प्रभावी है जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू।

loveyapa- India TV Hindi
Photo: X जुनैद खान और खुशी कपूर
  • फिल्म रिव्यू: लवयापा
  • स्टार रेटिंग: 2.5 / 5
  • पर्दे पर: 7/02/2015
  • डायरेक्टर: अद्वैत चंदन
  • शैली: रॉम कॉम

एक साधारण बॉलीवुड फिल्म को औसत दर्जे से ऊपर उठाने के लिए चार चीजें जरूरी हैं, दमदार कहानी, शानदार एक्टिंग, जोरदार निर्देशन और प्रभावी टेक्नीक। अगर फिल्म में एक भी चीज हल्की पड़ती है तो वो बात नहीं बन पाती। आज आमिर खान के बेटे जुनैद खान और खुशी कपूर की फिल्म 'लवयापा' रिलीज हो रही है। फिल्म की कहानी कई प्रासंगिक समस्याओं को संबोधित करती है - बॉडी शेमिंग, सोशल मीडिया हेरफेर, गैस-लाइटिंग और डीप-फेक, लेकिन किसी भी मुद्दे को परत दर परत नहीं खोलती। ऊपर से इन मुद्दों को छूती इस फिल्म में जुनैद खान की एक्टिंग भी मात खा रही है। कई साइड एक्टर्स काफी प्रभावी हैं। फिल्म में कुछ तकनीकी एसपेक्ट बेजोड़ हैं, लेकिन कहानी का दूसरा भाग निराश करता है। पूरी फिल्म कैसी है, चलिए आपको बताते हैं।   

स्टोरी लाइन

कहानी शुरू होती है बानी के अपने पिता द्वारा पकड़े जाने से जिसके बाद घर में गुच्ची की हाजरी लगवाई जाती है। गौरव सचदेवा उर्फ ​​गुच्ची (जुनैद) और बानी (ख़ुशी) एक दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन जब वे अपने रिश्ते को अगले स्तर पर ले जाने की कोशिश करते हैं तो उनके प्यार और भरोसे के विचार को अतुल कुमार शर्मा यानी  बानी के पापा (आशुतोष राणा) द्वारा चुनौती दी जाती है। बानी के पापा शुद्ध हिंदी बोलने वाले, क्लासिकल म्यूजिक में रुचि रखने वाले आदर्शवादी पिता हैं। वो दोनों को चैलेंज के तौर पर सेल फोन बदलने के लिए कहते हैं और परखते  हैं कि दोनों एक-दूजे पर कितना भरोसा करते हैं। इसके बाद दोनों के कई राज सामने आते हैं और झगड़े पर झगड़ा होता है। दोनों के राज खुलने वाला एपिसोड बांधे रखता है और बोर नहीं होने देता। 

कहानी को बेबाक ढंग से पेश करने की पूरी कोशिश की गई है। रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म कई हिस्सों में खूब हंसाती है, लेकिन कुछ सीन फिजूल के भी लगते हैं। शक और लव टेस्ट की ये कहानी एक ऐसे मोड़ पर आकर खत्म होती है, जो थोड़ा इमोशनल है, लेकिन अंत तक पहुंचते-पहुंचते कहानी बिखरती है और लगता है कि इसका एंड और बेहतर किया जा सकता था। पहले भाग में कहानी बांधे रखती है और खूब एंटरटेन करती है लेकिन दूसरे भाग अबरप्ट (आधा-अधूरा) लगता है। बहुत हद तक चीजों का आप पहले से ही अनुमान लगा सकेंगे। तमाम लड़ाइयों-शक के बाद भी गुच्ची और बानी का मिलन और पापा का आशीर्वाद मिलना प्रिडिक्टेबल है। हैप्प एंडिंग देखकर मेरी तरह आप भी यही कहेंगे कि ये तो हर बॉलीवुड फिल्म में होता ही है।

कहानी में कुछ चीजें खटकती हैं जैसे वही पिता जो बॉयफ्रेंड के सवाल उठाने पर बेटी का साथ देता है और उसे सही साबित करता है, वही बेटी का डीपफेक वीडियो वायरल होने पर उसका भरोसा नहीं करता। बहन की शादी पर चल रहा ट्रैक बीच में ही छूट जाता है। इसके अलावा एक सीन काफी बेवकूफी भरा लगता है, जहां जुनैद खान बानी के दिए हुए बैंड को आग से निकालने में ऐसे जूझते हैं जैसे आग की लपटे चारों ओर फैली हों। वहीं फिल्म में दिखाया गया जिगरी याराना आपके दिल को छुएगा। 

एक्टिंग

फिल्म में जुनैद खान सबसे कमजोर कड़ी हैं। फिल्म प्रमोशन के दौरान आमिर ने कई बार इस बात पर जोर दिया कि उनके बेटे उनसे कोई सलाह नहीं लेते। शायद अगर वो अपने पिता से एक्टिंग की टिप्स ले लेते तो कहानी और प्रभावी हो जाती। लीड रोल में नजर आए जुनैद सही इमोशन्स को एक्स्प्रेस करने में कामयाब नहीं हैं। उनके फेशियल एक्सप्रेशन डायलॉग के साथ मेल नहीं खाते। वो कई जगहों पर बहुत लाउड नजर आते हैं। वहीँ वो अपनी जिन बातों को सहजता से धीमी आवाज में कह सकते हैं, उसमें भी वो चिल्लाते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि वो स्क्रीन से निकल कर अपनी आवाज आखिरी सीट तक पहुंचाना चाहते हैं। ये उनकी डायलॉग डिलीवरी को प्रभावित करता है और चोट करने वाले सीन्स की इंटेंसिटी को कम कर देता है। 'महाराज' में भी उनमें यही समस्या थी। हीरो जैसी पर्सनेलिटी होने के बाद भी वो मात खा रहे हैं।

बात करें खुशी कपूर की तो वो 'आर्चीज' की तुलना में काफी बेहतर हैं। उन्होंने सही जगह सही एक्सप्रेशन्स दिए, लेकिन वो हिंदी बोलने में थोड़ी असहज लगीं। कई शब्दों का उच्चारण उन्होंने सही से नहीं किया। ये कमी शुरुआती मोनोलॉग में ही पकड़ में आ रही है। इसके अलावा वो कई जगहों पर ब्लैंक भी लगती हैं। इमोशनल मोमेंट्स में खुशी का काम अच्छा है। गुस्सा भी उन्होंने सही तरीके से ही जाहिर किया है। वैसे खुशी और जुनैद के बीच केमिस्ट्री भी अच्छी है। 

आशुतोष राणा पिता के रोल में शानदार हैं। वो अपनी एक्टिंग और कमाल की हिंदी से सब पर भारी पड़ते हैं। जिस सीन में भी वो जुनैद के साथ नजर आए हैं वहां उन्हें पूरी तरह से ओवरशैडो कर रहे हैं। यही एक मंझे हुए एक्टर की पहचान है। साइड रोल में भी उनमें हीरो वाला स्वैग है और उन्होंने स्क्रीन स्पेस का पूरा सदुउपयोग किया है। कीकू शारदा गूची के जीजा के रूप में नजर आए हैं। उनकी एक्टिंग भी परफेक्ट कही जा सकती है। कपिल शर्मा शो वाली इमेज से वो बाहर आए हैं और उन्होंने कुछ नया और अलग ट्राई किया है। उन्होंने फिल्म में बॉडी शेमिंग के मुद्दे को सही से उठाया है। कुछ हिस्सों में वो फिल्म की जान बन गए हैं। गूची की मां के रोल में गुरुषा कपूर भी दमदार हैं। दोस्तों और बहन के किरदार में नजर आए बाकी एक्टर्स भी प्रभावित करते हैं।

निर्देशन और तकनीकी पार्ट

निर्देशक अद्वैत चंदन ने इस फिल्म से पहले भी अपने काम से प्रभावित किया है। वो बड़ी बारीकी से काम करते हैं जिसके चलते एक अच्छा कनेक्ट बन पता है। 'सीक्रेट सुपरस्टार' में उनका उम्दा काम देखने को मिला था, लेकिन इस बार उन्होंने फिल्म के पहले भाग में शानदार काम किया है, लेकिन दूसरे भाग को ढीला छोड़ दिया है। तकनीकी चीजों पर उनका जोर रहा है जो फिल्म के सीन को पूरी तरह से अपीलिंग बना रहे है। WhatsApp चैट और इंस्टाग्राम चैट का एनिमेटेड रिप्रेजेंटेशन ऐसा फील दे रहा है जैसे सारी बातें सामने ही कही जा रही हों। एक सीन बेहद ही शानदार है जहां जुनैद बाथरूम में बैठे होते हैं और कमोड की सीट उनके लिए टाइम मशीन का काम करती है, पास्ट में हुई शॉकिंग चैट्स की सैर करती है। वहीं एक सीन और भी हाई इंटेंसिटी वाला है जहां गुच्ची और बानी के बीच लड़ाई हो रही होती है और उसी दौरान घर बैठे बानी के पापा सितार बजाते हैं। सितार का म्यूजिक बिल्कुल सिचुएशन के साथ जाता है। फिल्म में कम ही गाने रखे गए हैं और वो परिस्थिति को सपोर्ट करते हैं। 

कैसी है फिल्म

जुनैद खान और खुशी कपूर की ये थिएट्रिकल डेब्यू एवरेज फिल्म है। कहानी नई पीढ़ी के मुद्दे उठती है, लेकिन फोन की अदला-बदली अक्षय कुमार की फिल्म 'खेल खेल में' की याद दिलाती है।  Deepfake के मुद्दे पर पहली बार किसी फिल्म में बात हुई, लेकिन ये कहानी के अंत में आता है और इस पर गहराई से बात नहीं होती। कुल मिलकर एक बार फिल्म को देखा जा सकता है। फिल्म बोझिल महसूस नहीं कराएगी, लेकिन कहानी के अंत और लीड कलाकारों से बहुत ज्यादा उम्मीदें न पालें। इस फिल्म को 2.5 स्टार दिए जा रहे हैं।

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