Wednesday, February 25, 2026
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रंगीन रिव्यू: नए अवतार में विनीत कुमार सिंह ने पेश किया दिलचस्प विचार, फिर भी भटकती है जिगोलो की कहानी

जया द्विवेदी Published : Jul 25, 2025 02:51 pm IST, Updated : Jul 25, 2025 10:52 pm IST

'रंगीन' वेब सीरीज आज रिलीज हो गई है। कहानी कई गहरी बातों को कहने की कोशिश करती है, लेकिन अपने मकसद को पूरा करने से चूक रही है। विनीत कुमार सिंह का काम अच्छा है। जानें पूरा रिव्यू।

Rangeen- India TV Hindi
Photo: @VINEET_KSOFFICIAL फिल्म का पोस्टर।
  • फिल्म रिव्यू: रंगीन
  • स्टार रेटिंग: 3 / 5
  • पर्दे पर: 25/07/2025
  • डायरेक्टर: कोपल नैथानी और प्रांजल दुआ
  • शैली: ड्रामा

प्राइम वीडियो की नई वेब सीरीज ‘रंगीन’ एक ऐसे विचार से शुरू होती है जो भारतीय ओटीटी पर बहुत कम देखने को मिलता है। साहसिक, नया और सामाजिक सीमाओं को चुनौती देने वाले मुद्दे को ये कहानी उठा रही है। सीरीज की शुरुआत ही इस अंदाज में होती है कि दर्शक चौंकते हैं, मुस्कराते हैं और सोचने लगते हैं कि अब आगे क्या होगा। कहानी घूमती है आदर्श के इर्द-गिर्द। इसी में एक अधेड़ उम्र के अखाबार संपादक की भूमिका में विनीत कुमार सिंह हैं, जिसकी जिंदगी एक उबाऊ और असफल शादी तथा ठहरी हुई नौकरी के बीच उलझी हुई है। वह एक छोटे शहर में रहता है, जहां जीवन की रफ्तार धीमी है लेकिन सामाजिक दबाव उस पर बना हुआ है।

कहां से शुरू होती है कहानी

सीरीज की मुख्य घटनाओं की शुरुआत तब होती है जब आदर्श को पता चलता है कि उसकी पत्नी नैना (राजश्री देशपांडे) का अफेयर एक जिगोलो सनी (तारुक रैना) के साथ चल रहा है। यह रहस्य न केवल आदर्श की दुनिया को झकझोर देता है, बल्कि उसे एक ऐसा कदम उठाने के लिए भी प्रेरित करता है जिसकी उम्मीद किसी को नहीं होती। वह खुद जिगोलो बनने का निर्णय करता है। इस विचित्र मोड़ के पीछे कोई सामान्य बदले की भावना नहीं, बल्कि एक गहरी व्यक्तिगत यात्रा छिपी हुई है। यह यात्रा है आत्म-सम्मान, पहचान और पुरुष अहं की। ‘रंगीन’ की यही बात इसे पारंपरिक कहानियों से अलग बनाती है, कम से कम कागज पर।

विचार में दम, लेकिन अमल में कमी

सीरीज का ट्रेलर रिलीज होते ही दर्शकों में उत्साह भर गया था। यह लगा कि यह शो एक मजेदार, संवेदनशील और सामाजिक रूप से प्रासंगिक सफर पर ले जाएगा। और हां, शुरूआती एपिसोड्स में यह वादा निभता भी है। हम आदर्श को देखते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने टूटते रिश्ते और खुद की असफलता के बीच संघर्ष कर रहा है। वह दुनिया से लड़ते-लड़ते एक दिन खुद से ही भिड़ जाता है, लेकिन यह टकराव, जो दर्शकों को भावनात्मक तौर पर जोड़ सकता था, उतनी गहराई से नहीं उभर पाता। ‘रंगीन’ का सबसे बड़ा संकट यही है। यह तय नहीं कर पाती कि इसे कॉमेडी रहना है, ड्रामा बनना है या आत्मनिरीक्षण से भरा एक गंभीर शो।

शैली में अस्थिरता

एपिसोड्स के साथ-साथ यह स्पष्ट हो जाता है कि कहानी की दिशा भटकी हुई है। कभी यह शो ड्रामेटिक मोड़ पर जाता है तो कभी अचानक बहुत ही हल्के और हंसी-ठिठोली वाले दृश्य पर आ जाता है। कई बार यह इमोशनल जोन में पहुंचता है, लेकिन अगले ही पल उसका प्रभाव खत्म हो जाता है। शो वैवाहिक समस्याओं, आत्म-सम्मान की भावना, छोटे शहरों में सेक्सुअल एजेंसी जैसे विषयों को छूता है, लेकिन किसी पर गहराई से ठहर नहीं पाता। इसका नतीजा ये होता है कि न कहानी भावनात्मक असर छोड़ती है, न कोई खास सामाजिक संदेश दे पाती है।

अभिनय की बात करें तो...

विनीत कुमार सिंह जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता से दर्शकों को हमेशा कुछ अलग और प्रभावशाली देखने की उम्मीद होती है और इस बर भी उन्होंने शानदार काम किया है। सपाट हिस्सों में भी उनका काम अच्छा है। आदर्श का किरदार एक ऐसे व्यक्ति का है जो अपनी पहचान और आत्म-सम्मान के संकट से जूझ रहा है, लेकिन ये संघर्ष अक्सर स्क्रीन पर सतही लगता है। उनकी परफॉर्मेंस या तो जरूरत से ज्यादा शांत है या जरूरत से ज्यादा नाटकीय रखी गई है और इसमें पूरी तरह से कहानी जिम्मेदार है।

राजश्री देशपांडे का किरदार नैना काफी दिलचस्प हो सकता था, लेकिन उन्हें बहुत सीमित स्क्रीन टाइम मिला है। नैना की जटिलता, उसकी भावनाएं और उसके निर्णयों के पीछे की सोच, सबकुछ अधूरा छोड़ दिया गया है। राजश्री जैसी अदाकारा को बेहतर स्क्रिप्ट मिलती तो वह इस किरदार में जान फूंक सकती थीं। तारुक रैना जिगोलो सनी के रूप में एक हल्की-फुल्की ऊर्जा लाते हैं। उनके दृश्यों में एक आत्मविश्वास है और उनका चार्म कहानी में थोड़ा रंग जरूर भरता है। उन्होंने अपने सीमित रोल में अच्छी छाप छोड़ी है।

शीबा चड्ढा, जो सितारा नामक किरदार निभा रही हैं, इस सीरीज की सबसे सशक्त कड़ी हैं। सितारा वह महिला है जो एक बुटीक की आड़ में जिगोलो सर्विस चलाती है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस शांत और असरदार है। वह इस उलझी हुई कहानी में स्थिरता और गंभीरता लाती हैं।

एक अनूठा विचार... जो अधूरा रह गया

‘रंगीन’ का सबसे बड़ा आकर्षण उसका कांसेप्ट है। एक अधेड़ उम्र का पुरुष, जो खुद को फिर से खोजने की यात्रा पर निकलता है, लेकिन उस यात्रा का जरिया है समाज द्वारा टैबू समझा जाने वाला पेशा। यह विचार भारतीय समाज में मर्दानगी, शादी और सेक्सुअलिटी को लेकर चली आ रही रूढ़ियों को चुनौती देता है, लेकिन दुर्भाग्य से सीरीज इस विचार को पूरी तरह से निभा नहीं पाती। न तो यह एक बोल्ड व्यंग्य बनती है, न ही एक गहरी भावनात्मक कहानी। बीच में उलझकर, यह कई विषयों को छूती है लेकिन किसी पर ठहरती नहीं।

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