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गूगल ने डूडल बनाकर किया चिपको आंदोलन को याद, 21 महिलाओं के चलते बदल गई थी भारत की कटान नीति

पहाड़ के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ ये आंदोलन देखते ही देखते देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया था। इस आंदोलन के चलते भारत सरकार को कटान संबंधी अपनी नीतियों को बदलना पड़ा था।

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Published on: March 26, 2018 13:44 IST
चिपको आंदोलन का गूगल...- India TV Hindi
चिपको आंदोलन का गूगल डूडल।

नई दिल्ली: सर्च इंजन गूगल ने आज चिपको आंदोलन के 45 वर्ष पूरे होने पर डूडल बनाकर इस महान अंहिसक, पर्वावरण की रक्षा करने वाले आंदोलन को याद किया है। साल 1972 में उत्तरखंड (जो उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) के एक छोटे से गांव से शुरू हुए इस छोटे से आंदोलन ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई थी। चिपको नाम चिपकने से लिया गया है। इस आंदोलन में महिलाओं ने पेड़ से चिपककर पेड़ों के कटान का विरोध किया था। बाद में आंदोलन पहाड़ों से निकल कर बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैला गया था। इस आंदोलन के चलते ही पर्यावरण और खासकर पेड़ कटान को लेकर कई तरह की नीतियां भारत सरकार ने बनाई थी। 

कैसे शुरू हुआ आंदोलन

चमोली क्षेत्र में साल 1972 में वन विभाग ने 300 पेड़ों को काटने और उससे टेनिस रैकेट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट इलाहबाद स्थित साइमन कंपनी को दिया था। स्थानीय क्षेत्र में इसका काफी विरोध हुआ। बढ़ेत विरोध को देखते हुए सरकार ने इस कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया था। कुछ सालों के बाद 1974 में फिर 2,500 पेड़ों की कटाई का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया जिसके बाद फिर से स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू कर दिया।

एक समय जब गांव में सिर्फ महिलाएं थीं तभी मौके का फायदा उठाते हुए मजदूरों ने पेड़ काटना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में उन्हें रोकने के लिए गौरी देवी नाम की महिला के नेतृत्व में 21 महिलाओं ने उन्हें रोकने के लिए पेड़ों से चिपक गई। देखते ही देखते गांव की और महिलाएं भी जंगल में इक्ट्ठी होने लगी। भीड़ बढ़ती देख मजदूर वहां से खाली हाथ चले गए। इसके बाद ये आदोंलन पहाड़ के और फिर देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचा। गूगल ने भी अपने डूडल में पेड़ों से चिपकी खड़ी महिलाएं दिखाई हैं।

इस आंदोलन से जुड़े कई लोगों को बाद में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया। इस आंदोलन के बड़े नाम सुन्दरलाल बहुगुणा को साल 2009 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया. वहीं चंडी प्रसाद भट्ट को 'रामन मैग्सेसे पुरस्कार' से साल 1982 में सम्मानित किया गया था। इस आंदोलन का बड़ा व्यापक असर हुआ था। देश को अपनी जंगल कटान की नीति पर बदलनी पड़ी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 20 सालों के लिए जंगलों की निलामी और पेड़ों के कटान पर रोक लगा दी थी।

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