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STORY BLOG: सरस्‍वती, सुंदर और पानी की छोटी सी कहानी

 Written By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Apr 11, 2016 10:14 pm IST,  Updated : Apr 11, 2016 10:22 pm IST

मीनाक्षी जोशी सुन्दर की कल्पना करना बहुत आसान है लेकिन बदसूरत की कल्पना करना मुश्किल। कई लोग बदसूरत हो जातें हैं जिस से कुछ क्षण सुन्दर हो जाये। सरस्वती भी विलुप्त होने से बचने के

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मीनाक्षी जोशी

सुन्दर की कल्पना करना बहुत आसान है लेकिन बदसूरत की कल्पना करना मुश्किल। कई लोग बदसूरत हो जातें हैं जिससे कुछ क्षण सुन्दर हो जाये। सरस्वती भी विलुप्त होने से बचने के लिए थोड़ी बदसूरत हो गई और सुन्दर का चेहरा भी बदल गया। आप भी जानिए एक छोटी सी कहानी। 'पानी-पानी रे..!' क्‍योंकि आजकल घर घर की यही कहानी….

‪#WaterCrises ‪#story

पानी-पानी रे पानी-पानी !!......गाड़ी में बज रहे गाने की आवाज़ आ रही थी और सरस्वती चली जा रही थी। पानी की चाह में ही तो उसने पानी वाले गाँव में शादी की थी, लेकिन सरस्वती अब भी बूँद-बूँद की तलाश में भटक रही थी। कैसी मजबूरी थी.......बिन पानी न रसोई में खाना ठीक से बन रहा था, खाना बन भी जाए तो बर्तन धोने को पानी कितना बचाएं ! कहाँ से बचाएं ! हर दिन की यही उधेड़ बुन थी। सरस्वती के ससुर चौधरी जी का गाँव में बहुत सम्मान था। गाँव के हर छोटे-बड़े फैसले में अधिकतर चौधरी जी की राय ली जाती थी और ऐसे में घर पर आने-जाने वाले लोगों की संख्या गाँव के आम घरों से कुछ ज्यादा ही थी, सो दिन भर घर में चाय-शरबत का दौर चलता रहता था। हँसी-ठहाकों की महफ़िल की बात ही कुछ और थी और रसूख़ के क्या कहने!

लेकिन वक़्त बदलते देर कहाँ लगती है, आज वही चौधरी जी के घर का आँगन बंजर लगता था। गमले का गुलाब सूख गया है, तुलसी.....जिसके चौधराइन फेरी ले लेकर बड़ा ख्याल रखती थी उसमें कुछ पत्ते से ही बाक़ी हैं और चौधराइन भी बस उस पौधे की तरह ही कुम्हलाई असहाय आँगन में आकाश को देख-देख पानी को रो रही है।

चौधराइन का बस चलता तो आँसू से ही बुझा देती क्यारियों की प्यास, लेकिन शरीर में भी इतना पानी नहीं बचा था की आँसू बनें, सूख गईं थी आँखें भी। सरस्वती कितनी सुखी थी जब उसने अपनी गृहस्थी बसाई थी प्यार करने वाला पति सुन्दर, माँ समान सास, पिता समान ससुर, दो छोटे बच्चे संजू-मंजू .....हरा-भरा आँगन था सरस्वती का। लेकिन खुशियाँ चिड़ियों के साथ ही आँगन से उड़ चुकी थी। न चुग्गा न पानी अब कुछ न मिलता था सरस्वती के आँगन में।

पानी-पानी रे.......पानी-पानी रे..... गाने की आवाज़ फिर सरस्वती को सुनाई दी और फिर अचानक अपनी स्मृतियों से बाहर आई, तो उसने देखा पड़ोस का गाँव आ चुका था। सुंदर ने जीप रोकी और दुकान पर पानी का पता पूछा, लाला अनजान चेहरा देख अनमने ढंग से रास्ता बताने लगा। सरस्वती-सुंदर पानी की आस में फिर आगे बढ़ चले। अभी तीन साढ़े तीन किलोमीटर का सफ़र तय किया ही था कि चीख-पुकार की आवाज़ आने लगी थी।

"भैय्या हमें लेने दो!" "बाल्टी आगे बढ़ाओ!" "भैय्या जगह दो!"
"हिम्मत कैसे हुई लाइन तोड़ने की" "अरे! शानू तू पाइप खींच ले।"

नन्हें बच्चे प्लास्टिक की मटकी लिये खड़े हुए धक्के खा रहे थे। उनमें से एक गिर पड़ा। रोने को ही था की माँ ने झटके से खड़ा किया, सहलाने के लिए नहीं बल्कि फिर कतार में आगे लगाने के लिए। रोता बच्चा फिर मटका उठाए खड़ा हो गया। सरस्वती के लिए आश्चर्य की बात नहीं थी ये सब। उसने देखा था, उसके पिता के गाँव में, लेकिन बीते 10-12 सालों में भूल गयी थी वो पानी के लिए मारा-मारी, और आज ये सब फिर देख कर डर के मारे उसका गला सूखने लगा। इतने में सुन्दर ने उसे झकझोरा, कहा "जल्दी से जीप में से एक मटका और एक कैन निकाल लाओ!" सरस्वती दौड़ते हुए गयी, झटपट लेकर आ गयी। सुन्दर कतार में लग गया और सरस्वती जीप में जा बैठी।

छीना-झपटी, खींच-तान गाली-गलौच हो रही थी। इतने में सुन्दर को किसी ने धक्का दिया। सुन्दर समझदार आदमी था लेकिन पानी की लड़ाई ने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया था। गाड़ी में पेट्रोल डालना तो आसान हो गया था लेकिन 'पानी' मुश्किल था। जितनी तेज़ी से उसे धक्का लगा था उससे दोगुनी तेज़ी के साथ उसने धक्का दिया। पानी की तड़प में दूसरा आदमी कुछ और बिलबिला गया। बात हाथापाई तक आ पहुँची थी। सुन्दर धीरज खो बैठा और वो आदमी आस्तीन चढ़ा कर सुन्दर का कुर्ता खींचने लगा।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई हमारे इलाके का पानी लेने आ गया,कौन है बे तू!" सुन्दर रुबाबदार आदमी था ऊपर से ठाकुर जात। सहन नहीं हुआ। आपा खोते हुए वो चिल्लाया "तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे कुर्ते को हाथ तक लगाने की, तेरी बोटी-बोटी नोंच लूँगा।" "पानी तेरे तिजोरी का है, या तेरा बाप ब्याहा है पानी से जो किसी को हाथ नहीं लगाने देगा।"

अगला बोला "मैं तेरा खून पी जाऊंगा!"

सुन्दर बोला "मैं तेरा खून पी जाऊंगा!"

दरोगा भी वहीँ था, दौड़ के आया। इससे पहले लड़ाई और होती उसने फ़ौरन मामला शांत कराया और जैसे-तैसे सुन्दर एक कैन पानी भर कर जीप में लौटा। सरस्वती पहले से जीप में बैठी सुन्दर का इंतज़ार कर रही थी। सुन्दर ने जीप स्टार्ट की और मोड़ ली अपने गाँव की ओर। सरस्वती ने देखा हाथापाई में सुन्दर का कुर्ता फट गया था और चेहरे पर भी खरोंचें थी। सरस्वती ने कभी सुन्दर को ऐसा नहीं देखा था। इतना पाशविक, इतना अमर्यादित।

वो सोच ही रही थी क्या सुन्दर शर्म-लिहाज़ सब पानी के लिए भूल गया। ऐसा सुन्दर तो उसने कभी नहीं देखा था कि इतने में सुन्दर बोल उठा "सरस्वती, मैनें तुम्हें उस बच्चे की भरी मटकी उठाते देख लिया था जो अब हमारी गाड़ी में है।" सरस्वती शर्म से पानी-पानी हो गई। सरस्वती और सुन्दर दोनों पानी के लिए पानी से सौदा कर आए थे। गाना बज रहा था। पानी-पानी रे.....पानी-पानी रे !

(ब्लॉग लेखिका मीनाक्षी जोशी युवा पत्रकार हैं और देश के नंबर वन चैनल इंडिया टीवी में कार्यरत हैं)

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