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मालेगांव ब्लास्ट केस का गवाह 17 साल से लापता, कोर्ट ने घोषित की ‘सिविल मृत्यु’

Edited By: Khushbu Rawal @khushburawal2 Published : Aug 01, 2025 09:02 pm IST, Updated : Aug 01, 2025 09:02 pm IST

महाराष्ट्र पुलिस के ATS के कर्मी दिलीप पाटीदार को मालेगांव विस्फोट मामले में पूछताछ के लिए 10 और 11 नवंबर 2008 की दरमियानी रात इंदौर से अपने साथ ले गए थे और अब तक पाटीदार का कोई अता-पता नहीं है।

प्रतीकात्मक तस्वीर- India TV Hindi
Image Source : SORA AI प्रतीकात्मक तस्वीर

इंदौर: वर्ष 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस के गवाह दिलीप पाटीदार का उनकी रहस्यमय गुमशुदगी के 17 साल बीतने के बाद भी कोई सुराग नहीं मिल सका है और इंदौर की एक अदालत उनके परिवार की गुहार पर उनकी ‘‘सिविल मृत्यु’’ घोषित कर चुकी है। पाटीदार के परिवार के एक वकील ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

क्या होती है सिविल मृत्यु?

‘सिविल मृत्यु’ का मतलब है कि जब कोई व्यक्ति 7 साल या इससे ज्यादा समय से लापता हो और उसका कोई भी सुराग न मिल सके, तो कानूनी तौर पर उसे मृत घोषित कर दिया जाता है। उस व्यक्ति के समस्त अधिकार समाप्त होने से होता है। यह अपराध, व्यक्ति के गुम होने सहित विभिन्न परिस्थितियों में हो सकता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सात और उससे ज्यादा समय से गुम होता है तो उसके परिवारजन की ओर से याचिका लगाकर उसे सिविल मृ्त्यु घोषित करवाया जा सकता है। माना कि यह याचिका उस गुम हुए व्यक्ति की पत्नी ने लगाई है, तो उसकी सिविल मृत्यु घोषित होने पर उस व्यक्ति के सभी अधिकार समाप्त हो जाते है। पत्नी को सम्पत्ति, दूसरी शादी सहित विभिन्न अधिकार मिल जाते हैं।

क्या है दिलीप पाटीदार का पूरा मामला?

पाटीदार के परिजनों का कहना है कि महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) के कर्मी उन्हें मालेगांव विस्फोट मामले में पूछताछ के लिए 10 और 11 नवंबर 2008 की दरमियानी रात इंदौर से अपने साथ ले गए थे और अब तक पाटीदार का कोई अता-पता नहीं है। पाटीदार के परिवार के वकील दीपक रावल ने बताया,‘‘तमाम कोशिशों के बावजूद पाटीदार के बारे में कोई सुराग नहीं मिल सका। आखिरकार हमें उनके परिवार की ओर से स्थानीय अदालत में मुकदमा दायर करके उनकी सिविल मृत्यु घोषित करानी पड़ी ताकि इसके आधार पर उनके आश्रितों को जायज लाभ और अधिकार मिल सके।’’

'गवाही के लिए गए, दोबारा घर नहीं लौटे'

इंदौर की एक दीवानी अदालत ने पाटीदार की पत्नी पद्मा और उनके बेटे हिमांशु के दायर मुकदमे पर 19 दिसंबर 2018 को उनकी सिविल मृत्यु घोषित की थी। 21 वर्षीय हिमांशु ने कहा कि महाराष्ट्र एटीएस के पुलिसकर्मी उनके पिता को यह कहकर अपने साथ ले गए थे कि उन्हें गवाही के लिए ले जाया जा रहा है और बयान दर्ज करने के बाद छोड़ दिया जाएगा, लेकिन इसके बाद वह दोबारा घर नहीं लौटे। बाद में एटीएस अधिकारी यही दावा करते रहे कि उन्होंने मेरे पिता को छोड़ दिया था, लेकिन इस बारे में उन्होंने हमें कभी कोई पक्की सूचना नहीं दी।" 

दिलीप के इकलौते बेटे ने क्या कहा?

हिमांशु, दिलीप पाटीदार की इकलौती संतान हैं और पाटीदार की पत्नी गृहिणी हैं। पाटीदार के बेटे ने कहा, ‘‘मेरे पिता का पता लगाने के लिए मेरे परिवार ने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन नतीजा सिफर रहा। पिता के लापता होने के बाद से मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए।’’ पेशे से बिजली मिस्त्री पाटीदार, मालेगांव विस्फोट मामले के वांछित आरोपी रामचंद्र कलसांगरा उर्फ रामजी के रिश्तेदार थे। वह इंदौर में कलसांगरा के मकान में किरायेदार भी थे। कलसांगरा के बेटे देवव्रत ने कहा कि पाटीदार की तरह उनके पिता का भी पिछले 17 साल से कोई अता-पता नहीं है।

संदीप डांगे भी 2008 से लापता

इसी तरह, मालेगांव विस्फोट मामले का एक अन्य वांछित आरोपी संदीप डांगे भी 2008 से लापता है। डांगे के 88 वर्षीय पिता वीके डांगे इंदौर के लोकमान्य नगर में रहते हैं। वह भी लगातार कहते रहे हैं कि उन्हें इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं है कि उनका बेटा कहां है। मालेगांव विस्फोट मामले में महाराष्ट्र एटीएस ने कुल 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जबकि कलसांगरा और डांगे को भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल में बंधे विस्फोटक में धमाकों से छह लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 101 अन्य व्यक्ति घायल हो गए थे। (भाषा इनपुट्स के साथ)

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