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Rajat Sharma's Blog | आपातकाल में ज़ुल्म और जेल: मेरा दर्दभरा एहसास

Written By: Rajat Sharma @RajatSharmaLive Published : Jun 26, 2025 06:56 pm IST, Updated : Jun 26, 2025 06:56 pm IST

किसी को अंदाज़ा नहीं था कि इमरजेंसी का मतलब क्या होता है। 25 जून की रात मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस के हॉस्टल में था, अखबारों पर सेंसरशिप थी, कोई अखबार नहीं निकला, अखबारों के दफ्तरों की बिजली काटी जा चुकी थी, पुलिस अखबारों के दफ्तरों पर तैनात थी।

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Image Source : INDIA TV इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा।

मैं आपको बताना चाहता हूं, इमरजेंसी की काली रात के बारे में। आपातकाल के ज़ुल्मोसितम के बारे में। 50 साल पहले मैंने अपनी आंखों से क्या देखा। मैंने पुलिस थानों में कैसा दर्द सहा, जेल में कैसी घुटन महसूस की। और कोई शायद ये बात आप को न बता पाए। मैंने ये दर्द सहा है, घुटन को महसूस किया है। इसलिए अपना अनुभव मैं आपको बताऊंगा।

बात 1975 की है, पचास साल पहले की है, जब 25 जून की रात को 11 बजकर पैंतालीस मिनट पर आपातकाल की घोषणा पर राष्ट्रपति के दस्तखत हुए और सुबह छह बजे कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर उस पर मुहर लगाई गई। उसी वक्त प्रधानमंत्री दफ्तर के संयुक्त सचिव पी. एन. बहल आकाशवाणी के न्यूज़रूम में पहुंच गए। उन्होंने आदेश दिया कि आकाशवाणी पर सुबह 8 बजे के न्यूज़ बुलेटिन की जगह प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन प्रसारित किया जाएगा। इसके बाद सुबह-सुबह रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज सुनाई पड़ी। भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है।

लेकिन हमें तो रात को ही खबर मिल गई थी, सुबह तो संविधान के साथ मजाक हुआ, इमरजेंसी का आदेश सुबह छह बजे हुआ, लेकिन पुलिस आधी रात को ही देश के बड़े नेताओं के घर  पहुंच गई, दरवाजे पर दस्तक दी, midnight  knock। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश सिंह बादल, चौधरी चरण सिंह, राज नारायण, पीलू मोदी, बीजू पटनायक जैसे विरोधी दलों के सभी बड़े नेता रात में ही गिरफ्तार लिए गए। सबको रात में ही हिरासत में ले लिया गया। इंदिरा गांधी ने औपचारिकता पूरी होने का भी इंतजार नहीं किया। उसी रात अखबारों की बिजली काट दी गई। उसी रात कई संपादकों, पत्रकारों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। इमरजेंसी की घोषणा से पहले ही तानाशाही का आतंक पूरे देश में फैल गया था। इमरजेंसी लगने पर लोगों को जेल में भेजना तो छोटी बात थी। असल मे पूरे देश को जेल में तब्दील कर दिया गया था।

लेकिन आपातकाल क्यों लगाया गया? इंदिरा गांधी ने ऐसा क्यों किया? अब पचास साल हो गए, लोग भूल गए होंगे। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक फैसला सुनाया। रायबरेली में इंदिरा गांधी ने जो लोकसभा चुनाव जीता था, उसे राजनारायण ने अदालत में चुनौती दी थी। आरोप था कि प्रधानमंत्री ने अपने निजी सचिव और सरकारी अफसर यशपाल कपूर को चुनाव एजेंट बनाया, स्वामी अद्वैतानंद को पचास हजार रुपये की रिश्वत देकर निर्दलीय उम्मीदवार  बनाया, वोटर्स को शराब और कंबल बांटे। ये सारे आरोप कोर्ट में साबित हुए। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया, छह साल के लिए उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। इस फैसले का मतलब ये था कि इंदिरा गांधी इस्तीफा दें।

कोर्ट के आदेश के बाद विरोधी दलों के नेताओं ने इंदिरा गांधी पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया। दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली हुई। इस रैली में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सरकार को गैरकानूनी बताया, उनके इस्तीफे की मांग की। उसी रात संजय गांधी, बंसी लाल और सिद्धार्थ शंकर राय, इनकी सलाह पर इमरजेंसी लगाने का फैसला हुआ। कोर्ट का आदेश न मानने के लिए, प्रधानमंत्री बने रहने के लिए, सरकार बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई।

हम पुलिस से कैसे बचते रहे?

किसी को अंदाज़ा नहीं था कि इमरजेंसी का मतलब क्या होता है। 25 जून  की रात मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस के हॉस्टल में था, अखबारों पर सेंसरशिप थी, कोई अखबार नहीं निकला, अखबारों के दफ्तरों की बिजली काटी जा चुकी थी, पुलिस अखबारों के दफ्तरों  पर तैनात थी। मुझे याद है सुबह अरुण जेटली कैंपस में आए। हॉस्टल में मुझे खबर मिली। हम सब लोग कैंपस लॉ सेंटर के कॉफी हाउस में मिले। वहां पता चला कि रात दो बजे अरुण जेटली के घर पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई थी।  उनके पिता वकील थे। उन्होंने पुलिस को उलझाए रखा और अरुण जेटली पिछले दरवाजे से निकलकर गायब हो गए।

गायब तो क्या होते, वह यूनिवर्सिटी कैंपस में आ गए थे। उस मीटिंग में हम लोगों ने तय किया हम इस तानाशाही के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे। कैंपस में जुलूस निकालेंगे। उसमें समाजवादी पार्टी के कई लोग थे, SFI के लोग थे। सब लोगों के साथ एक जुलूस यूनिवर्सिटी के ऊपर वाले कॉफी हाउस तक पहुंचा। वहां सेंटर में एक टेबल पर खड़े होकर अरुण जेटली ने भाषण देना शुरू किया। मैं उनके बिल्कुल बगल में खड़ा था। तभी मैंने देखा कि पुलिस ने चारों तरफ से घेराबंदी कर ली है और सादे कपड़े में चार-पांच पुलिस वाले अरुण जेटली की तरफ बढ़ रहे हैं। मैंने विजय गोयल को इशारों इशारों में बताया। वह भी वहीं खडे थे। उन्होंने अरुण को इशारा दिया और हम सब लोग अलग-अलग दिशाओं में भागे। मुझे विजय गोयल के स्कूटर के पीछे बैठकर भागना था। अरुण जेटली को जिन साहब के स्कूटर पर बैठकर भागना था, वो डर के मारे गायब हो गए। अरुण जेटली को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पुलिस मॉरिस नगर थाने ले आई।

हमने प्लान बनाया कि हम लड़कों का जुलूस लेकर थाने जाएंगे और अरुण जेटली को छुड़ा लेंगे। वो दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र यूनियन के अध्यक्ष थे। उस समय हमें उस पुलिस स्टेशन के SHO ने अलग ले जाकर समझाया। ये बताया कि इमरजेंसी में पुलिस को कैसे कैसे अधिकार दिए गए हैं, किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के अरेस्ट किया जा सकता है और अगर कोई दंगा करने की कोशिश करे तो उसे देखते ही गोली मार देने के आदेश हैं। उन्हीं SHO साहब से पता चला कि इमरजेंसी की वजह से देश के नागरिकों के पास न अभिव्यक्ति की आजादी थी, न प्रोटेस्ट करने की। तब पहली बार ये पता चला कि इमरजेंसी क्या होती है, कितनी गंभीर है।

अरुण जेटली को मीसा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था और सीधे जेल भेज दिया गया था। क्योंकि मैं और विजय गोयल स्कूटर पर साथ-साथ थे, तो बस हम दोनों ही बचे थे। बाकी सबसे संपर्क टूट गया।  हम विजय के घर पर गए, वहां से कुछ कपड़े उठाए और फिर हर रोज अलग-अलग जान-पहचान वाले लोगों के घर सोने लगे। फिर एक दिन विचार आया कि लोगों को कैसे बताया जाय कि इमरजेंसी में क्या हो रहा है।  हमने आजादी के आंदोलन की जो कहानियां पढ़ी थी, उसके हिसाब से एक अखबार निकालने का फैसला किया। अखबार क्या था, एक साइक्लोस्टाइल पर्चा था, जिसका नाम रखा ‘मशाल’। मेरी हैंड राइइटिंग अच्छी थी तो मैं साइक्लोस्टाइल पेपर पर हाथ से सारी खबरें लिखता था।

कैंपस के पास शक्तिनगर में एक कोचिंग सेंटर था, शर्मा न्यू आर्ट्स कॉलेज।  उनका कॉलेज बंद हो जाने के बाद रात को मैं और विजय गोयल मोमबत्ती की लाइट में उनके यहां की साइक्लोस्टाइलिंग मशीन पर पांच-छह सौ कॉपियां निकाल लेते। वहीं बैठकर उनको लिफाफों में भरकर बंद करते और रात में यूनीवर्सिटी कैंपस के घरों में प्रोफेसर्स,  वाइस चांसलर के यहां, हॉस्टल में फेंक कर आ जाते थे। ये अखबार की दुनिया में मेरा पहला इंट्रोडक्शन था। भूमिगत आंदोलन की दुनिया में पहला इंट्रोडक्शन था। ये सिलसिला कई दिनों तक चला। एक दिन रात को हम साइक्लोस्टाइल पेपर निकाल रहे थे। विजय गोयल का घर पास में ही था। विजय ने कहा कि पुलिस को पता है कि मैं घर पर नहीं रहता, इसलिए वो मुझे घर पर नहीं ढूंढेंगे, इसलिए मैं घर पर जाता हूं, कुछ कपड़े और खाना ले आता हूं।

विजय गोयल वहां से निकले, उसके पांच मिनट बाद ही पुलिस पहुंच गई और मुझे साइक्लोस्टाइल पेपर के साथ पकड़ लिया। मुझे हथकड़ी लगा कर घसीटते हुए थाने ले गए। रात का वक्त था। सबसे पहले उन्होंने मुझे कहा कि तुम्हारा साथी विजय गोयल कहां है। मैं किसी भी तरह से विजय को सूचित करना चाहता था इसलिए मैंने कह दिया कि वो घर पर है, तो पुलिस वालों ने कहा कि उसको फोन करके कहीं पर मिलने बुलाओ। उन्होंने नंबर डायल किया और मेरे हाथ में फोन दे दिया। विजय की माताजी ने फोन उठाया। मैंने कहा कि विजय से बात कराएं। वह मेरी आवाज़ पहचानती थीं। उन्होंने फोन दे दिया। विजय ने कहा कि फोन क्यों कर रहा है, तो मैंने कहा –“दाल में काला है, निकल जाओ”।

जैसे ही मैंने ये कहा, पुलिस वाले ने मेरे ऊपर थप्पडों की बरसात कर दी और उसके बाद पूरी रात मुझे टॉर्चर किया। एक कुर्सी पर बैठाकर हाथ पीछे बांध दिए और पैरों पर डंडे मारे। खून भी निकलने लगा। फिर वो मुझे सुबह तीस हजारी कोर्ट में पेश करने ले गए। थाने से तीस हजारी कोर्ट तक हाथों में हथकड़ी लगाकर तीन चार पुलिस वाले मुझे लेकर गए। लोग दोनों तरफ खड़े देख रहे थे।  जब कोर्ट में पहुंचे तो मैंने देखा कि उस भीड़ में मेरे पिताजी खड़े हैं। वो करीब आने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस वाले उन्हें धक्का दे रहे थे। उस चीज़ ने मुझे अंदर तक दुख दिया और लगा कि हिम्मत टूट जाएगी। मुझसे ये कहा गया कि मजिस्ट्रैट के सामने जाकर कहना है कि मैं अपनी गलतियों के लिए माफी मांगता हूं और इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम  का समर्थन करता हूं, फिर मुझे छोड़ दिया जाएगा। लेकिन मैं अपने दिलो-दिमाग में बिल्कुल साफ था कि न जेल से डरना है, न पिटाई से घबराना है।

सबसे बड़ी हिम्मत तब मिली जब भीड़ से निकल कर बाबू जी मेरे करीब आए और उन्होंने कहा, “घबराना नहीं, अगर तुम्हें लगता कि जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो, वो सच्चा है, तो फिर पीछे मत हटना”। उसके बाद मजिस्ट्रेट ने मुझे तिहाड़ जेल ले जाने का आदेश किया। पुलिस की नीले रंग की वैन थी। उसमें मुझे बंद कर दिया गया। उस वैन में सारे अपराधी थे जो कोर्ट में अपनी पेशी पर आए थे। सबके साथ मुझे भी हाथ में दो रोटी पकड़ा दी और वो वैन तीस हजारी से लेकर मुझे तिहाड़ जेल पहुंची।

जेल के अंदर

चूंकि मेरी उम्र कम थी, मैं 18 साल से कम उम्र का था, नाबालिग था, इसलिए जेल सुपरिर्टेंडेंट ने मुझे पॉलिटिकल वार्ड में भेजने के बजाए टीनएजर्स के वार्ड में भेज दिया, जिसे जेल में मुंडाखाना कहा जाता है। वहां जिस सेल में मुझे बंद किया गया, वो चार लोगों के लिए थी, लेकिन उसमें बारह लड़के थे। बातचीत से पता चला कि कोई जेबकतरा था, कोई पानी के मीटर चुराता था, कोई चेन खींचने में एक्सपर्ट था। पूरी रात उन लोगों के साथ गुजरी। चूंकि पैर से खून बह रहा था, दर्द भी था। लेकिन वहां तो ठीक से बैठने की जगह भी नहीं थी। सुबह उस वार्ड के इंचार्ज  जिसे लंबरदार कहते हैं, उसने मुझे बुलाया। हत्या के एक मामले में उसे उम्र कैद हुई थी। वो वार्ड का बॉस था, पढ़ा-लिखा था। उसने मुझसे बात की। मैने उसे इमरजेंसी के बारे में, पुलिस ने कैसे मुझे पकड़ा, ये सब बताया, तो उसकी सहानुभूति मेरे साथ हो गई। उसने कहा कि आप गलत वार्ड में आए हैं, आपको तो पॉलिटिकल कैदियों के साथ होना चाहिए।

चूंकि मुंडा खाने से लड़के राजनेताओं के वार्ड में काम करने जाते थे तो लंबरदार ने पॉलिटिकल वार्ड में संदेश भिजवाया। अगले दिन वार्ड नंबर 11 से तीन लोग आए। उनमें एक महावीर सिंह थे, दूसरे नरेश गौड़ थे जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता था। वे लोग मुझे पॉलिटिकल वार्ड में ले गए जहां RSS के लोगों ने पूरा इंतजाम संभाला हुआ था। सबसे पहले मुझे वो डिस्पेंसरी में ले गए, घावों को साफ किया, दवा लगाई। एक दूसरे कमरे में गर्म पानी से नहाने का इंतजाम किया, साफ कपड़े दिए, सफेद कुर्ता पायजामा और खाना खिलाकर दवाई देकर मुझे सुला दिया। बहुत दिन के बाद आराम से सोने को मिला था। जब सुबह उठा तो वह पॉलिटिकल वार्ड एक कैंप जैसे लगा, जहां RSS के लोग भी थे, जमाते इस्लामी के भी, जनसंघ के भी लोग थे और समाजवादी भी। जेल में बार बार खबरें आती थी कि हमें एक दिन जहाज में बैठाकर समुद्र में डुबा दिया जाएगा। कभी खबर आती थी कि जेल में बंद लाखों लोगों को साइबेरिया ले जाकर छोड़ दिया जाएगा। बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है, ये पता ही नहीं था।

इमरजेंसी हटी, लोकशाही लौटी

जब मार्च 1977 में इमरजेंसी खत्म हुई, सब लोग जेल से बाहर आए। इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव का ऐलान कर दिया था। पहला सवाल ये था कि क्या जनता 19 महीने के सेंसरशिप के बाद सब कुछ भूल गई है? अगर पब्लिक मीटिंग करेंगे तो लोग आएंगे या नहीं? चौधरी चरण सिंह के पास इसकी जिम्मेदारी थी। पहले तय हुआ कि पहली मीटिंग कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के कमरे में की जाएगी, फिर उत्साह हुआ तो तय हुआ कि ये मीटिंग कॉन्सटीट्यूशन क्लब के लॉन में होनी चाहिए। फिर दिल्ली के जनसंघ नेता कंवर लाल गुप्ता और मदनलाल खुराना ने कहा कि हमने पब्लिक का जोश देखा है, सपोर्ट देखा है, हमें रामलीला मैदान में ये मीटिंग करनी चाहिए।

मुझे चूंकि उस पब्लिक मीटिंग में शुरुआती स्पीकर के तौर पर “टाइम पास स्पीकर” के तौर पर बोलने को कहा गया था, इसलिए मैं रामलीला मैदान जल्दी पहुंच गया। दो घंटे बाद न सिर्फ रामलीला मैदान भरा हुआ था, दूर-दूर तक सड़कों पर लोगों के सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। जो बड़े नेता चौधरी चरण सिंह, मोरारजी भाई, अटल बिहारी बाजपेयी गाड़ियों से आ रहे थे, भीड़ के कारण  उनका वहां पहुंचना मुश्किल हो रहा था। उसी दिन इस बात का अंदाज़ा लग गया था कि जनता इस बार के चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके परिवार को बाहर फेंक देगी। मुझे याद है आखिरी भाषण अटल बिहारी वाजपेयी का था। उन्होंने कहा, “मुद्दतों बाद मिले हैं दीवाने, कहने सुनने को हैं बहुत से फसाने, खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी, कौन जाने”। इसके बाद दो मिनट तक तालियां बजती रहीं। लोग नारा लगाते रहे, “अटल बिहारी बोल रहा है, इंदिरा शासन डोल रहा है”।

एक बात ये भी याद आती है कि इस रैली में लोग न पहुंचें, इसलिए दूरदर्शन ने उस मीटिंग के समय पर सुपरहिट “बॉबी” फिल्म दिखाने का फैसला किया था। लेकिन लोग जयप्रकाश नाराय़ण, मोरारजी भाई और अटल बिहारी बाजपेयी को सुनने आए। रामलीला मैदान में इतिहास रचा गया। कुछ ही महीने के बाद जब चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी रायबरेली और संजय गांधी अमेठी से हार गए। पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया। जिस दिन नतीजा आया, उसी दिन फिर रामलीला मैदान में रैली हुई और जनता का उत्साह देखने वाला था।

भवितव्य

50 साल बीत गए, पर एक-एक पल याद है। Emergency की काली रात के बाद लोकतंत्र की सुबह की किरण दिखाई दी।  1977 में जब चुनाव के नतीजे आ रहे थे तो पूरी रात लोग अखबारों के दफ्तरों के बाहर खड़े थे। वहां बड़े-बड़े ब्लैकबोर्ड लगाए गए थे जिसपर नतीजों का ऐलान किया जा रहा था। लाखों लोग सड़कों पर थे। खुशी से झूम रहे थे, नाच रहे थे। पर मन में कहीं ये डर था कि अगर इंदिरा गांधी फिर से इमरजेंसी न लगा दें, हार के कारण चुनाव के नतीजों को रद्द न कर दें। इस बात की भी बहुत अफवाह थी कि इंदिरा  गांधी सेना की मदद लेकर मार्शल लॉ लगा देंगी। लेकिन देश भर में माहौल ऐसा था कि किसी के कुछ करने की गुंजाइश नहीं थी। सब कुछ जनता के हाथ में था। उस रात पूरे देश में गजब का माहौल था।

जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसकी पहली जिम्मेदारी ये थी, संविधान में ऐसा बदलाव किया जाए कि कोई कभी देश में इमरजेंसी न लगा पाए। और ये बदलाव हुआ। लोकतंत्र पर लगा ताला खुला, सेंसरशिप हटी और ऐसा परिवर्तन हुआ कि अब कभी कोई अभिव्यव्ति की आजादी छीन नहीं पाएगा। (रजत शर्मा)

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 25 जून, 2025 का पूरा एपिसोड

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