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कांग्रेस नेता अजय माकन ने छोड़ा राजस्थान में पार्टी प्रभारी का पद, क्या हैं इस बात के सियासी मायने?

 Written By: Rituraj Tripathi
 Published : Nov 16, 2022 07:25 pm IST,  Updated : Nov 16, 2022 07:25 pm IST

अजय माकन ने राजस्थान में कांग्रेस के प्रभारी का पद छोड़कर शीर्ष नेतृत्व को बड़ा झटका दिया है। उन्होंने ये फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा 5 दिसंबर को राज्य में प्रवेश करने वाली है। पार्टी के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए ये बड़ी चुनौती है कि वो इस मामले को किस तरह से निपटाएंगे।

Ajay Maken- India TV Hindi
अजय माकन Image Source : FILE

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता अजय माकन ने राजस्थान में पार्टी के प्रभारी का पद छोड़ दिया है। उन्होंने 8 नवंबर को पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को चिट्ठी लिखकर कहा है कि वह राजस्थान के प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी पूरी करने में असमर्थ हैं और पार्टी यहां के लिए दूसरा प्रभारी ढूंढे। ऐसे में ये माना जा रहा है कि अब माकन दोबारा राजस्थान के प्रभारी के रूप में काम करने के लिए राजी नहीं होंगे। गौरतलब है कि राजस्थान में कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा 5 दिसंबर को प्रवेश करेगी, ऐसे समय में माकन का पद छोड़ना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

क्या है पद छोड़ने की वजह? 

अजय माकन ने पार्टी हाईकमान को जो चिट्ठी लिखी है, उसमें 25 सितंबर को गहलोत गुट के विधायकों की बगावत और उन पर एक्शन नहीं लेने का मामला उठाया है। उन्होंने ये भी कहा है कि 4 दिसंबर को उपचुनाव हैं, ऐसे में राजस्थान के लिए नया प्रभारी नियुक्त करना ज्यादा जरूरी है। 

क्या हैं माकन के पद छोड़ने के पीछे के सियासी मायने?

माकन का इस्तीफा राज्य में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच अनसुलझे पावरप्ले की गंभीरता को दर्शाता है। यहां एक साल में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए अभी शुरुआती दिन हैं, लेकिन माकन का फैसला उन्हें मुश्किल में डाल सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मुद्दा माकन का इस्तीफा देने का नहीं है, बल्कि मुद्दा वो है, जिस वजह से माकन ने इस्तीफा दिया है। 

इस बात से नाराज हैं माकन

माकन इस बात से नाराज हैं कि लगभग दो महीने के बाद भी, मुख्यमंत्री गहलोत के तीन करीबी सहयोगियों के खिलाफ पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की है, जिन्हें 25 सितंबर को जयपुर में समानांतर कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) की बैठक आयोजित करने के लिए कारण बताओ नोटिस दिया गया था। असली मुद्दा यह भी है कि क्या कांग्रेस आलाकमान राज्य में सत्ता परिवर्तन लागू करना चाहता है? लेकिन पार्टी का नेतृत्व क्या और कब करना चाहता है, इस पर स्पष्टता की कमी है।

29 सितंबर को जैसे ही गहलोत ने सोनिया गांधी से मुलाकात की और उनसे माफी मांगी, तब संगठन के प्रभारी एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने घोषणा की थी कि राजस्थान पर एक या दो दिन में फैसला लिया जाएगा। वह फैसला क्या होगा? गहलोत के प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट को उम्मीद है कि जल्द से जल्द सत्ता परिवर्तन होगा। उनके खेमे का दावा है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने चुनाव से एक साल पहले उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया है।

खड़गे के लिए बड़ी चुनौती

कांग्रेस नेतृत्व, विशेष रूप से नए अध्यक्ष खड़गे पर मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव होगा। ये दबाव इसलिए भी है क्योंकि गहलोत के बहुमत वाले विधायकों का समर्थन उन्हें सख्त कदम उठाने नहीं देगा। 

पार्टी ने अभी तक राजस्थान के संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल, पार्टी के चीफ व्हिप महेश जोशी और राजस्थान पर्यटन विकास निगम (आरटीडीसी) के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौर के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की है, जबकि अनुशासनात्मक समिति ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है, यह एक संकेत है। 

खड़गे के सामने यह पहली बड़ी चुनौती है।  ये समय काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राजस्थान में प्रवेश करने से ठीक एक पखवाड़े ये चुनौती सामने आई है। पार्टी नेतृत्व इस चरण में कोई व्यवधान नहीं डालना चाहेगा जिससे राज्य में यात्रा पटरी से उतर जाए। बड़ा सवाल यह है कि यात्रा के राजस्थान चरण के पूरा होने के बाद क्या होगा।

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