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आज है फाल्गुन माह की पहली संकष्टी चतुर्थी, पूजा के समय जरूर पढ़ें श्राप मुक्ति की चमत्कारिक कथा, वरना अधूरा माना जाएगा व्रत!

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Feb 04, 2026 05:21 pm IST,  Updated : Feb 05, 2026 08:48 am IST

Sankashti Chaturthi Vrat 2026: फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन गणपति भगवान के द्विजप्रिय गणेश स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दौरान संकष्टी चतुर्थी व्रत का पाछ करने से गणेश जी की खास कृपा प्राप्त होती है।

Sankashti Chaturthi Vrat Katha- India TV Hindi
संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 कथा Image Source : INDIA TV

Sankashti Chaturthi Vrat Katha In Hindi: सनातन धर्म में सभी गणेश चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इन्हीं में से एक है संकष्टी चतुर्थी, जिसका नाम में ही अर्थ छिपा होता है "संकटों से मुक्ति मिलना"। हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्षों की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत क नाम से जाना जाता है। जबकि, शुक्ल पक्ष में आने वाले चतुर्थी तिथि को वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है।

चतुर्थी को दिन भर व्रत करके चंद्रोदय के बाद व्रत का पारण किया जाता है। फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जिसमें बप्पा के द्विजप्रिय स्वरूप की आराधना होती है। ऐसा मान्यता है कि इस व्रत की पूजा के दौरान कथा का पाठ करने से गणेश जी की खास कृपा प्राप्त होती है। यहां पढ़िए संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा। 

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी तिथि और व्रत का दिन

पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन माह की चतुर्थी तिथि 4 और 5 फरवरी 2026 की मध्यरात्रि 12 बजकर 9 मिनट पर आरंभ होगी। जबकि,  चतुर्थी तिथि का समापन 5 और 6 फरवरी की मध्यरात्रि 12 बजकर 22 मिनट पर होगा। चूंकि चतुर्थी तिथि का चंद्रोदय 5 फरवरी की रात को होगा, इसलिए सकट चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी 2026 को रखा जाएगा। संकष्टी चतुर्थी का चंद्रोदय रात 9 बजकर 35 मिनट पर होगा।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से एक कथा को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती चौपड़ का खेल खेल रहे थे। उस समय वहां कोई भी ऐसा नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभा सके। तब भगवान शिव और माता पार्वती ने मिट्टी से एक मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। इसके बाद उस बालक को खेल में हार जीत का निर्णय करने की जिम्मेदारी दी गई।

खेल के दौरान हर बार माता पार्वती भगवान शिव को पराजित कर रही थीं, लेकिन एक बार उस बालक ने भूलवश भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। यह देखकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने गुस्से में आकर बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया। अपनी गलती का अहसास होने पर बालक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी, लेकिन देवी ने कहा कि दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता।

संकष्टी चतुर्थी व्रत से मिला श्राप से मुक्ति

श्राप से मुक्ति पाने का उपाय पूछने पर माता पार्वती ने बालक को बताया कि फाल्गुन माह की संकष्टी चतुर्थी के दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से वह श्राप मुक्त हो सकता है। बालक ने देवी की आज्ञा का पालन किया और फाल्गुन महीने की संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर गणेश जी की विधि विधान से पूजा की। मान्यता है कि इसके प्रभाव से वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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