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EXCLUSIVE: ट्रंप के साथ 'फादर ऑफ ऑल डील' की इनसाइड स्टोरी! जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ने समझाईं टैरिफ और व्यापार समझौते की पेचीदा बातें

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Feb 03, 2026 07:57 pm IST,  Updated : Feb 03, 2026 07:57 pm IST

Father of All Deals: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटकी ट्रेड डील कैसे मुमकिन हुई, डोनाल्ड ट्रंप का 18 फीसदी तक टैरिफ घटाना कितना सही और इस व्यापार समझौते से किन सेक्टर्स को फायदा होगा, ये बातें इस आर्टिकल में जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत सरीन से समझें।

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अमेरिका के साथ 'फादर ऑफ ऑल डील' मुमकिन होने की कहानी। Image Source : AP

India US Trade Deal: अमेरिका फर्स्ट' की पॉलिसी पर चलने वाले डोनाल्ड ट्रंप और 'हार्ड नेगोशिएटर' PM मोदी के बीच आखिरकार ट्रेड डील कैसे अंजाम तक पहुंची? अमेरिका के साथ ट्रेड डील ने भारत के टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वैलरी और लेदर सेक्टर के लिए उम्मीद के नए दरवाजे खोले हैं, लेकिन भारत ने इस समझौते को फाइनल करने के लिए क्या खोया और क्या पाया? क्या भारत अब विश्व का नया मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के रास्ते पर आगे बढ़ेगा? क्या सच में अब 'मेड इन इंडिया' प्रोडक्ट्स का डंका अमेरिका में बजने वाला है? INDIA TV ने अमेरिका और भारत की इस ट्रेड डील के नफे-नुकसान का गणित समझने के लिए जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत सरीन से एक्सक्लूसिव बातचीत की।

सवाल- EU के साथ 'मदर ऑफ ऑल डील' के बाद भारत-अमेरिका ट्रेड डील को 'फादर ऑफ ऑल डील' कहा जा रहा है। भारत की आर्थिक यात्रा के लिए यह कितना अहम पड़ाव है?

जवाब- जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत सरीन ने कहा कि यह बहुत अहम पड़ाव है क्योंकि अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी मंडी है। भारत और अमेरिका का व्यापार दोनों देशों के फायदे के लिए है, न कि पुराने औपनिवेशिक तरीके से जहां सिर्फ एक पक्ष का फायदा होता था।

उन्होंने कहा, 'पिछले कुछ समय में टैरिफ के मुद्दे के कारण हालात मुश्किल हो गए थे। भारत के कई निर्यात आधारित उद्योग जैसे टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स एंड ज्वैलरी और मशीन टूल्स को भारी नुकसान हो रहा था। लाखों नौकरियां और कंपनियों का भविष्य दांव पर था। एक्सपोर्ट के आंकड़े गिरने लगे थे। इस डील से अब एक 'लेवल प्लेइंग फील्ड' मिल जाएगा।'

जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ने आगे कहा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि यूरोप को अमेरिका ने 10-15% टैरिफ की छूट दी है, जबकि हम पर 18% लग रहा था। लेकिन हमें यह देखना है कि हमारा मुकाबला यूरोप या ब्रिटेन से नहीं है, क्योंकि हम उन चीजों का व्यापार नहीं करते जो यूरोप, अमेरिका से करता है। हमारा मुकाबला बांग्लादेश, श्रीलंका, वियतनाम, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों से है। इस डील के बाद हमारा टैरिफ उन देशों से कम हो जाएगा, जिससे हमें फायदा मिलेगा। इसके अलावा, पाकिस्तान और बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा के मुद्दों के कारण वहां से व्यापार भारत की ओर शिफ्ट हो सकता है, जिससे हमारे उद्योग चमकेंगे।

सवाल- अमेरिका से इम्पोर्ट पर जीरो ड्यूटी होने से भारत को क्या लाभ होगा? क्या इसकी वजह से हमारा नुकसान नहीं है?

जवाब- सुशांत सरीन ने कहा कि जो चीजें हम अमेरिका से आयात करेंगे, उनमें से कई हमारी जरूरत हैं, विशेषकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में। यह हमारे उद्योग को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगा। अगर मशीनरी और प्लांट 'जीरो ड्यूटी' पर भारत आते हैं, तो इससे हमारे उद्योगों का Modernization होगा।

उन्होंने कहा, 'अगर लोग भारत में निवेश करना चाहते हैं, तो वे अपनी मशीनरी ला सकते हैं जिससे यहां मैन्युफैक्चरिंग शुरू होगी। उदाहरण के लिए, जब से एप्पल ने भारत में फोन बनाना शुरू किया है, उसने अरबों डॉलर का निर्यात किया है और एक ही फैक्ट्री में एक लाख से ज्यादा नौकरियां दी हैं।'

जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ने आगे कहा कि कृषि क्षेत्र में हमने उन चीजों को खोला है जो हमारे किसानों को नुकसान नहीं पहुंचातीं। जैसे हेजलनट और ब्लूबेरी, जो पंजाब या हरियाणा में नहीं उगते। मक्का और सोयाबीन पर कुछ रियायत दी गई हैं, लेकिन उसका उपयोग खाने के बजाय औद्योगिक क्षेत्र जैसे- इथेनॉल ब्लेंडिंग या पशु चारे के लिए हो सकता है। समझौता हमेशा 'बीच का रास्ता' होता है, जिसमें दोनों पक्षों के हित सुरक्षित रहें।

सवाल- डोनाल्ड ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट' पॉलिसी वाले हैं और PM मोदी 'हार्ड नेगोशिएटर' माने जाते हैं। ऐसे में यह समझौता कैसे संभव हो पाया, जियोपॉलिटिक्स में ऐसे क्या हालात बन गए थे?

जवाब- सुशांत सरीन ने कहा कि इस समझौते पर कई महीनों से बातचीत चल रही थी। नवंबर-दिसंबर के आसपास सब कुछ तय हो गया था। यह डील पहले भी नेगोशिएट हुई थी जिसे ट्रंप ने रिजेक्ट कर दिया था, फिर दोबारा मेज पर आई। ट्रंप की 'हां' का इंतजार था, जो अब मिल गई है।

उन्होंने कहा, 'नेगोशिएशन बहुत पेचीदा और सख्त थी। भारत ने भी माना कि अगर हम बहुत बड़ी मार्केट हैं, तो उसे बंद रखकर हम बड़े नहीं रह सकते, इसलिए हमने भी थोड़ी नरमी दिखाई। दूसरा बड़ा कारण Geopolitical भी था। भारत धीरे-धीरे अन्य देशों जैसे- ऑस्ट्रेलिया और EU के साथ ट्रेड डील कर रहा था। अमेरिका को लगा कि अगर भारत उनकी सप्लाई चेन से अलग हो गया, तो वे कहां जाएंगे? चीन से अलग होने के बाद उन्हें भारत जैसे विकल्प की जरूरत है।'

जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ने आगे कहा, 'साथ ही, भारत सरकार ने घुटने नहीं टेके। अगर टेकने होते तो 6 महीने पहले यूरोप की तरह टेक दिए होते। भारत ने सम्मानजनक शर्तों पर, थोड़ी लचक दिखाते हुए यह सौदा किया है। यह 'परफेक्ट डील' भले न हो, लेकिन एक 'अच्छी डील' जरूर है।'

सवाल- इस समझौते से टेक्सटाइल और लेदर के अलावा किन सेक्टर्स में बूम आ सकता है?

जवाब- सुशांत सरीन ने कहा कि इस डील से कई नए रास्ते खुलेंगे। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स बन रहे हैं। इसमें आउटसोर्सिंग के जरिए पढ़े-लिखे तबके को नौकरियां मिलेंगी। भारतीय ऑटो पार्ट्स उद्योग को अमेरिकी बाजार का एक्सेस मिलेगा। टेक्नोलॉजी और डिफेंस के क्षेत्रों में अमेरिकी निवेश और साझेदारी बढ़ सकती है। इंजीनियरिंग में भी अच्छे अवसर हैं।

उन्होंने आगे कहा, 'लेबर इंटेंसिव उद्योग जैसे- वियतनाम में नाइकी और एडिडास के जूते बनते हैं, अब वे भारत में बन सकते हैं क्योंकि हमारे पास लेबर उपलब्ध है। ट्रंप के रहते अनिश्चितता बनी रहेगी, लेकिन इस डील से उस अनिश्चितता में कुछ चीजें निश्चित हो गई हैं, जिसका स्वागत होना चाहिए।'

सवाल- हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर अभी अमेरिका में हैं और यूएस क्रिटिकल मिनिरल मिनिस्टिरियल मीटिंग भाग ले रहे हैं। क्या सेमीकंडक्टर के लिए अब हमें दूसरे देशों की तरफ देखने की जरूरत नही पड़ेगी और क्रिटिकल मिनरल किन अन्य सेक्टर्स के लिए जरूरी है?

जवाब- सुशांत सरीन ने कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स सभी के लिए जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग में भारत का क्या हिस्सा होगा। यह अभी बातचीत के चरण में है। जहां तक सेमीकंडक्टर्स की बात है, भारत सरकार मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रही है। चिप बनाना आसान नहीं है, इसमें समय लगेगा। लेकिन शुरुआत में अगर हम आईफोन जैसे उत्पादों के 'कंपोनेंट पार्ट्स', जो अभी चीन से आते हैं, भारत में बनाना शुरू कर दें, तो यह भी बड़ी जीत होगी। इससे निवेश आएगा और निर्यात बढ़ेगा।

सवाल- पिछले 10 साल में भारत-अमेरिका संबंध कितने गहरे हुए हैं और आगे क्या उम्मीद है?

जवाब- सुशांत सरीन ने कहा कि पिछले साल तक लग रहा था कि संबंध बहुत गहरे हो गए हैं, लेकिन पिछले एक साल में विश्वास को थोड़ा झटका लगा है। अब कोशिश यह होगी कि धीरे-धीरे उस विश्वास को फिर से बनाया जाए। हमें अब थोड़ा संभलकर, स्ट्रैटेजिक और अन्य क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करना होगा।

उन्होंने कहा कि पिछले एक साल की घटनाओं से भारत में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' की बात फिर से शुरू होगी। लेकिन यह सिर्फ नारा नहीं होना चाहिए। असली ऑटोनॉमी तब आएगी जब हम रक्षा और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर होंगे और बिना किसी दबाव के अपने फैसले ले सकेंगे। इसके लिए हमें अपनी कमजोरियों को दूर करना होगा, बातें कम और काम ज्यादा करना होगा।

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