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ब्रीद इनटू द शैडोज: सूखे वॉटर पूल में फन राइड जैसी है अभिषेक बच्चन की सीरीज

मयंक शर्मा की ब्रीद इन टू द शेडोज उस राइड की तरह है जो बिना पानी के पूल में की गई है। किरदारों को गढ़ने में उलझ गई कहानी।

vineeta vashisth vineeta vashisth
Updated on: July 11, 2020 11:37 IST
Breathe: Into the Shadows review

अभिषेक बच्चन की वेब सीरीज 'ब्रीद 2' का मूवी रिव्यू

Photo:TWITTER: @JUNIORBACHCHAN
  • फिल्म रिव्यू: ब्रीद इनटू द शैडोज
  • स्टार रेटिंग: 2 / 5
  • पर्दे पर: July 10, 2020
  • डायरेक्टर: मयंक शर्मा
  • शैली: थ्रिलर/ड्रामा

अभिषेक बच्चन के डिजिटल डेब्यू वाली ब्रीद-इनटू द शैडोज रिलीज हो चुकी है। मयंक शर्मा के निर्देशन में बनी ये क्राइम बनाम साइकोलॉजिकल थ्रिलर सीरीज है वही चूहे बिल्ली की भागमभाग कहानी लेकर सामने आई है, जिसे आप कई फिल्मों में देख चुके हैं। फिल्म की कहानी एक बच्ची के खोने और उसके बाद के घटनाक्रमों पर लिखी गई है लेकिन चूंकि कई विदेशी सीरीज में ऐसी कहानी लोग देख चुके हैं इसलिए इसे नया तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन नए तरीके से परोसा गया जरूर कह सकते हैं। सच कहूं तो मुझे सीरीज से ज्यादा अच्छा सीरीज का ट्रेलर लगा जिसमें सीरीज की अपेक्षा ज्यादा कसावट और सस्पेंस था।

ब्रीद सीजन 1 में काम कर चुके अमित साध ने पिछली बार के मुकाबले बॉडी ज्यादा अच्छी बनाई है, इस बार वो हंसे भी हैं लेकिन पिछले सीजन से तुलना की जाए तो वो ज्यादा बेहतरी नहीं ला पाए हैं। हालांकि फिर भी उनका किरदार आपको रोकता है, कुछ देर और स्क्रीन को घूरने के लिए। अमित साध के अलावा जिस एक्टर के लिए फिल्म की चर्चा लगातार हो रही थी वो हैं अभिषेक बच्चन, हालांकि उन्होंने अपने किरदार में जान फूंकने की पूरी कोशिश की है लेकिन अभिषेक अपनी पहली सीरीज में कुछ जादू चलाने में कामयाब रहे हों, ऐसा लग नहीं रहा। आपने रिफ्यूजी देखी होगी तो समझ जाएंगे कि सारा खेल चेहरे की भाषा पर टिका है।  

अदाकारी की दुनिया में आपकी कदकाठी या नाम नहीं बल्कि चेहरे की अदायगी ज्यादा मौजूं होती है। आप कुछ भी बन जाइए, पुलिसवाला, चोर या साइकाट्रिस्ट, लेकिन वो किरदार जब तक चेहरे पर नहीं आएगा आप अदाकारी का एक्जाम पास नहीं कर पाएंगे। अभिषेक पूरी फिल्म में सुलझे और उलझे दोनों लगते हैं, उनका बोलने का अजीब रूआबदार अंदाज भी कुछ अजीब सा फ्रेम बनाता है सीरीज में। 

अगर पहले और दूसरे सीजन के मुख्य किरदारों की बात करें तो अभिषेक पिछले सीजन में कमाल दिखा चुके आर माघवन के आगे पासंग भी नहीं ठहर पाएंगे। हालांकि अमित साध ने उम्मीद नहीं तोड़ी है लेकिन बहुत शानदार कर डाला है ऐसा कुछ लिखना बेमानी हो जाएगा।

कहानी की बात करें तो अविाश और आभा अपनी छह साल की बेटी के साथ हंसी खुशी रहते हैं औऱ एक दिन बच्ची गायब हो जाती है। काफी दिन बाद पता चलता है कि बच्ची जिंदा है और उसे किडनैप किया गया है। किडनेपर चाहता है कि बच्ची का पिता यानी अविनाश उसके कहने पर कुछ मर्डर करे। पहले मर्डर के बाद एंट्री होती है इंसपेक्टर कबीर सावंत की, जिसे आपने पिछले सीजन में देखा होगा लेकिन ये कबीर सावंत का अपडेट वर्जन कह सकते हैं। फिर हत्याएं होती रहती हैं औऱ किरदार उलझते रहते हैं एक दूसरे के बीच। अंत तक कई सस्पेंस पता चलते हैं लेकिन ऐसा लगातार लगता है कि नयापन नहीं है, पहले देख चुके हैं।  

नित्या मेनन ने सीरीज में एक डरी हुई मां के किरदार को निभाया है। वो हर बात पर कंफ्यूज्ड दिखती है। उन्हें औसत कहा जा सकता है। 

डायरेक्शन की बात करें तो ये ठीक ठाक है। कहानी भले ही पुरानी हो लेकिन कहने का अंदाज कुछ अलग है। चूंकि कहानी भी मंयक शर्मा ने लिखी है और डायरेक्शन भी उन्हीं का है तो उनके ही पैंतरे की छाप सीरीज पर दिखी है। ऐसा कहना सही नहीं कि डायरेक्शन बिलकुल बेकार है लेकिन अतार्किक घटनाक्रम और बेवजह के दृश्यों की वजह से सीरीज को देखने की कंटीन्यूटी कमजोर होती है बीच में कई जगह पर। 

फिल्म में छह साल की सिया के किरदार को निभाया है इवाना कौर ने। इस बच्ची ने भी शानदार काम किया है। इसमें एक बच्ची की मासूमियत, डर और भावनाओं के जो जो एंगल उसके हिस्से में आए,सबको खूबसूरती से निभाया है। बेक ग्राउड म्यूजिक की बात करें तो आपने पिछला सीजन देखा होगा तो कुछ निराश हो सकते हैं। फिल्म के अन्य कलाकारों में सैयामी खेर ने काफी अच्छा काम किया है। हालांकि उनके हिस्से में सीन कम आए हैं लेकिन जहां भी जब भी वो दिखी हैं, उन्होंने इंप्रेस किया है। 

सपोर्टिंग एक्टरों ने फिल्म में आश्चर्यजनक तौर पर शानदार काम किया है। ऋषिकेश जोशी, श्रुति बापना, रेशम श्रीवर्धनकर को अगर ज्यादा स्क्रीन स्पेस दिया जाता तो फिल्म शानदार हो सकती थी। इन सभी कलाकारों ने फिल्म की नाव में छेद ढकने वाले पत्थरो का काम किया है। श्रद्धा कौल को पुलिस वाली के तौर पर ज्यादा स्पेस मिलता तो वो वाकई नित्या मेनन पर भी भारी पड़ जाती। 

ब्रीड का सैकेंड सीजन आपको सस्पेंस का थ्रिलर राइड तो करा रहा है लेकिन ये राइड बिना पानी वाले पूल की तरह है। आपको रोमांच के छींटे नहीं लगेंगे। आप डायरेक्शन में रोंगटे खड़े कर देने वाली असल रोमांच की तरावट से महरूम रह जाएंगे। मुख्य किरदारों की जिंदगी में डर, बेचैनी और जद्दोजहद जो कहानी के अनुरूप दिखना चाहिए, वो कहीं नहीं दिख रहा। ऐसी राइड किस काम की जहां आप झूले पर झूले लेकिन पूल में पानी न हो। 

सीरीज में लीड रोल अभिषेक बच्चन का है लिहाजा उनकी बात करनी ज्यादा जरूरी हो जाती है। अभिषेक को समझना होगा कि बेव सीरीज  फिल्म नहीं होती, इसका दर्शक अभी तक अलग है। जो रात को ठीक 12 बजे जागकर एक साइकोलॉजिकल फिल्म देख रहा है वो मसाला फिल्मों को कैसे ट्रीट करता होगा। इसी दर्शक को रात को बारह बजे अगर टेस्ट के मुताबिक डोज न मिले तो बेव सीरीज फेल हो जाती है। इसलिए बेव सीरीज को हॉल में लगी फिल्म की तरह समझना भूल होगी। अभिषेक बच्चन के लिए यहां कई रास्ते हैं, वो चाहें तो अच्छा कर सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अदायगी पर ज्यादा काम करना होगा। कोशिश करते रहेंगे तो सफल भी हो जाएंगे। 

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