- फिल्म रिव्यू: कोहरा 2
- स्टार रेटिंग: 3 / 5
- पर्दे पर: 11 फरवरी 2026
- डायरेक्टर: सुदीप शर्मा और फैसल रहमान
- शैली: क्राइम थ्रिलर
जब कोहरा ने 2023 में नेटफ्लिक्स पर दस्तक दी थी, तब पहली नजर में वह भीड़ में शामिल एक और क्राइम थ्रिलर जैसा ही लगा था। रिलीज के समय इसके इर्द-गिर्द बहुत बड़ा प्रचार नहीं था और न ही यह तुरंत सोशल मीडिया पर सनसनी बना। लेकिन जैसे-जैसे दर्शकों ने इसे समय दिया, शो की असली ताकत सामने आती गई। यह उस दौर में आया था जब दर्शक तेज कट, बड़े ट्विस्ट और हाई-ऑक्टेन ड्रामा के आदी हो चुके थे। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की तरह ही मनोरंजन भी तेज रफ्तार हो चुका है, हर चीज तुरंत असर डालने वाली। ऐसे में कोहरा ने एक अलग रास्ता चुना, यह भागता नहीं, ठहरता है, चौंकाता नहीं, धीरे-धीरे भीतर उतरता है। यही वजह है कि पहले सीजन की लोकप्रियता समय के साथ बढ़ी। लोगों ने महसूस किया कि यह शो अपने सन्नाटे, अपने विराम और अपने वातावरण से असर पैदा करता है। अब कोहरा सीजन 2 उसी विरासत के साथ लौटता है। इसे किसी परिचय की जरूरत नहीं, क्योंकि पहले भाग ने इसके लिए जमीन तैयार कर दी है, लेकिन बड़ा सवाल यही है, क्या दूसरा सीजन उसी गहराई और प्रभाव को बनाए रख पाता है?
कहानी: निजी उलझनों के बीच एक और हत्या
दूसरे सीजन में बरुण सोबती एक बार फिर इंस्पेक्टर अमरपाल गरुंडी के किरदार में हैं। अब उनकी जिंदगी में बदलाव आ चुका है, वे शादीशुदा हैं और अपने अतीत की जटिलताओं से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी निजी परेशानियों, खासकर पारिवारिक रिश्तों में आई दरारों से बचने के लिए, उन्होंने दलेरपुरा में तबादला ले लिया है। पत्नी सिल्की के साथ एक शांत जीवन जीने की उनकी कोशिश साफ दिखती है, लेकिन पुलिस की नौकरी में शांति ज्यादा देर टिकती नहीं। दलेरपुरा में उनकी मुलाकात अपनी नई सीनियर अधिकारी धनवंत कौर से होती है, जिसे मोना सिंह ने निभाया है। धनवंत कौर सख्त, स्पष्ट और पेशेवर हैं, उनकी प्राथमिकता सिर्फ सच है। दोनों को एक नए केस पर साथ काम करना पड़ता है, जो शुरुआत से ही जटिल और भावनात्मक रूप से भारी है।
प्रीत नाम की एक महिला की हत्या उसके ही घर के अस्तबल में कर दी जाती है। हत्या क्रूर है और सवालों से भरी हुई। जांच की दिशा उसके अलग रह रहे पति की ओर जाती है, जो अमेरिका में अपने दो बच्चों के साथ रहता है। पति-पत्नी के बीच तनावपूर्ण संबंध, कथित अफेयर और परिवार के भीतर छिपे हुए राज, हर परत खुलने के साथ कहानी और उलझती जाती है। इस जांच के दौरान गरुंडी और धनवंत कौर सिर्फ केस ही नहीं, बल्कि अपनी-अपनी निजी जिंदगी की उथल-पुथल से भी जूझ रहे हैं। यही दोहरी लड़ाई कहानी को भावनात्मक गहराई देती है।
अभिनय: संयम और सूक्ष्मता की जीत
बरुण सोबती ने इंस्पेक्टर गरुंडी के किरदार को फिर से उसी संतुलन के साथ निभाया है, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। उनके प्रदर्शन में गंभीरता है, लेकिन वह पूरी तरह बोझिल नहीं होता। किरदार में हल्का-सा व्यंग्य और सूखा हास्य भी मौजूद है, जो तनावपूर्ण दृश्यों में सांस लेने की जगह देता है। उदाहरण के तौर पर सिचुएशनशिप जैसे आधुनिक शब्द पर उनकी प्रतिक्रिया न केवल मनोरंजक है, बल्कि यह पीढ़ियों के सोच के फर्क को भी उजागर करती है। गरुंडी और धनवंत कौर के बीच संवाद शो की खासियत हैं। दोनों के बीच फेमिनिज्म, मर्दानगी और पेशेवर सीमाओं पर होने वाली बातचीत कहानी में बौद्धिक परत जोड़ती है। यह सिर्फ केस की जांच नहीं, बल्कि विचारों की टकराहट भी है।
मोना सिंह इस सीजन की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। धनवंत कौर के रूप में वे एक ऐसी महिला अधिकारी को सामने लाती हैं जो मजबूत है, लेकिन भीतर से टूटी हुई भी। उनका निजी जीवन, एक शराब की लत से जूझते पति के साथ तनावपूर्ण शादी, उन्हें और जटिल बनाता है। मोना सिंह अपने अभिनय में सूक्ष्म भावनाएं लेकर आती हैं; उनके चेहरे के भाव और ठहराव बहुत कुछ कह जाते हैं। रणविजय सिंह और अन्य सह-कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में विश्वसनीय हैं, जिससे कहानी का ताना-बाना मजबूत बना रहता है।
वातावरण, सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन
कोहरा शीर्षक महज प्रतीक नहीं, बल्कि पूरी श्रृंखला की आत्मा है। सुदीप शर्मा के निर्देशन में “कोहरा” सिर्फ दृश्यात्मक धुंध नहीं है, यह कहानी की गति, पात्रों की मानसिक स्थिति और संवादों की अस्पष्टता में भी मौजूद है। कई बार सच्चाई सामने होते हुए भी साफ दिखाई नहीं देती जैसे धुंध में खड़ा कोई आकार। पूरा सीजन पंजाबी बोली में है, जो इसे एक स्थानीय रंग देता है और यथार्थ के करीब ले जाता है। छह एपिसोड की यह कहानी संतुलित गति से आगे बढ़ती है। दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे नहीं हैं, और हर एपिसोड में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो दर्शक को आगे देखने के लिए प्रेरित करता है। शो का माहौल धीरे-धीरे बेचैनी पैदा करता है। यह बड़े चौंकाने वाले ट्विस्ट पर निर्भर नहीं करता, बल्कि वातावरण और भावनात्मक दबाव से असर बनाता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन इस मूड को और मजबूत करते हैं।
कमजोरियां
हालांकि शो अपने मूल स्वरूप के प्रति ईमानदार है, लेकिन कुछ जगहों पर यह भारीपन दोहराव जैसा महसूस होता है। कुछ निजी टकराव और पारिवारिक झगड़े नई दिशा देने के बजाय उसी भावनात्मक जमीन पर घूमते रहते हैं। कुछ साइड स्टोरीज को जिस उम्मीद के साथ पेश किया गया है, उन्हें पर्याप्त विस्तार नहीं मिल पाता। कुछ क्षणों में गति थोड़ी धीमी पड़ती है और खामोशी का प्रभाव उतना तीखा नहीं रह जाता जितना होना चाहिए था। यदि दर्शक बड़े और चौंकाने वाले ट्विस्ट की उम्मीद लेकर बैठें तो यह सीजन उन्हें थोड़ा संयमित लग सकता है। यहाँ आश्चर्य से ज्यादा महत्व माहौल और मनोस्थिति को दिया गया है, जो हर किसी के स्वाद के अनुकूल नहीं हो सकता।
क्या देखनी चाहिए ये सीरीज?
कोहरा सीजन 2 अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। यह तेज-तर्रार मनोरंजन नहीं, बल्कि धैर्य मांगने वाला अनुभव है। यह दुख, अपराधबोध, टूटे रिश्तों और नैतिक उलझनों के साथ आगे बढ़ता है। कुछ खिंचे हुए पलों और अधूरे-से लगने वाले धागों के बावजूद, मजबूत अभिनय और प्रभावी वातावरण इसे संभाल लेते हैं। यह सीजन दर्शक से जल्दबाजी नहीं, बल्कि सहभागिता चाहता है। अगर आप इसकी रफ्तार को स्वीकार कर सकते हैं, धुंध के बीच ठहर सकते हैं और सच्चाई के धीरे-धीरे सामने आने का इंतजार कर सकते हैं तो यह कहानी आपको सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं, बल्कि भावनात्मक गहराई का अनुभव भी देगी। आखिरी एपिसोड खत्म होने के बाद भी इसका असर कुछ समय तक बना रहता है, जैसे सुबह की धुंध, जो हट तो जाती है, लेकिन अपनी ठंडक पीछे छोड़ जाती है।