नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में 19 दिसंबर को I.N.D.I.A. यानी कि ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस’ के घटक दलों की बैठक काफी जोरशोर से शुरू हुई थी। उम्मीद की जा रही थी कि इस बार की बैठक में न सिर्फ संयोजक का नाम सामने आ जाएगा, बल्कि सीटों के बंटवारे पर भी मोटा-मोटी बात हो जाएगी। हालांकि बैठक खत्म होने के बाद माहौल बिल्कुल बदला हुआ नजर आ रहा था। जो लालू यादव सुबह बड़े-बडे़ दावे कर रहे थे, वह बगैर कुछ कहे गठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेस से पहले ही चले गए। लेकिन बैठक में असली बम फोड़ा था पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने।
दरअसल, ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नाम का प्रस्ताव दिया। ममता के इस प्रस्ताव का किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि एक दलित चेहरे को पीएम कैंडिडेट के तौर पर प्रोजेक्ट करने के प्रस्ताव का विरोध करना सियासी तौर पर खतरनाक साबित हो सकता था। गांधी परिवार के लिए भी इस प्रस्ताव के बाद स्थिति असहज हो गई। ऐसे में मामला खुद खरगे ने संभाला और कहा कि सबसे पहले जीतना अहम है और बाकी चीजों पर बाद में फैसला किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मैं कुछ भी नहीं चाहता हूं।
अभी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के ममता दांव से कांग्रेस और दूसरे दल उबरे भी नहीं थे कि उन्होंने दूसरा धमाका कर दिया। बैठक में गठबंधन के घटक दलों के प्रमुख नेताओं ने जहां अगले लोकसभा चुनाव के लिए जनवरी 2024 के दूसरे सप्ताह तक सीट बंटवारे को अंतिम रूप देने का फैसला किया, वहीं ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ने 31 दिसंबर तक ही सीट बंटवारे का काम पूरा करने की पैरवी की। बताया जा रहा है कि ममता जल्द से जल्द स्थिति साफ कर लेना चाहती हैं ताकि लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए पर्याप्त वक्त मिल सके। हालांकि लगता नहीं कि 31 दिसंबर तक ऐसा कुछ हो पाएगा।

सियासी पंडितों का कहना है कि ममता बनर्जी ने पूरा प्लान पहले से ही तैयार कर लिया था। दरअसल, I.N.D.I.A. गठबंधन की बैठक में जाने से पहले ममता बनर्जी ने अरविंद केजरीवाल, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन से मुलाकात की थी। माना जा रहा है इन्हीं मुलाकातों के दौरान ही बैठक में पीएम पद के चेहरे की घोषणा वाली मांग पर सहमति बनी होगी और इसीलिए अरविंद केजरीवाल ने इस मांग का समर्थन किया। वहीं, उद्धव ठाकरे ने ममता की इस मांग से रजामंदी दिखाई कि टिकटों के बंटवारे पर फैसला 31 दिसंबर से पहले हो जाना चाहिए।
कहां तो JDU को उम्मीद थी कि पार्टी के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को I.N.D.I.A. का संयोजक बनाया जाएगा, और कहां बैठक में किसी ने इस बारे में चर्चा तक नहीं की। इसके बाद जाहिर सी बात है कि JDU के नेताओं में कहीं न कहीं निराशा का भाव आ गया। शायद यही वजह है कि गोपालपुर से पार्टी के विधायक गोपाल मंडल ने बयान दे दिया कि ‘खरगे को कोई नहीं जानता, प्रधानमंत्री तो नीतीश कुमार ही बनेंगे।’ बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नीतीश कुमार को फोन करके उनकी कथित नाराजगी को दूर करने की कोशिश की थी, लेकिन बयानों को देखकर नहीं लगता कि नाराजगी दूर हुई है।
अब सभी के मन में यह सवाल है कि आखिर ममता बनर्जी और JDU क्यों एक अलग राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं। दरअसल, कई मौकों पर ममता जता चुकी हैं कि उन्हें राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर नहीं है, और उनके इस प्रस्ताव को राहुल की संभावनाओं पर ग्रहण लगाने के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, नीतीश कुमार ने गठबंधन को बनवाने में काफी मेहनत की है, लेकिन अपने मनमाफिक चीजें होतीं न देखकर कहीं न कहीं उनके और उनकी पार्टी के अंदर मायूसी दिखने लगी है। यही वजह है कि दोनों अलग राह पर जाते नजर आ रहे हैं और पार्टी के नेताओं की तरफ से तरह-तरह के बयान आ रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या गठबंधन टूट की कगार पर है। अभी भले ही यह थोड़ी दूर की कौड़ी लग रही हो लेकिन इसके हकीकत बनने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। सिर्फ ममता और JDU ही नहीं, सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर केजरीवाल की भी कांग्रेस से नहीं बन रही है। ऐसे में कम से कम 3 असंतुष्ट घटक दलों के होने के बावजूद यदि गठबंधन के सभी दल लोकसभा चुनावों तक एक साथ कायम रहते हैं तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। अब देखना यह है कि I.N.D.I.A. के नेता एकमत हो पाते हैं या फिर गठबंधन लोकसभा चुनावों से पहले ही अंजाम तक पहुंच जाता है।
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