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हिंदू शादी को यूं खत्म नहीं किया जा सकता, बेहद अहम फैसले में बोला दिल्ली हाई कोर्ट

 Published : Aug 29, 2025 10:52 pm IST,  Updated : Aug 29, 2025 10:52 pm IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह को केवल कानूनी प्रक्रिया से ही खत्म किया जा सकता है, गांव वालों के सामने तलाकनामा साइन करना वैध रास्ता नहीं है। इसके साथ ही CISF कांस्टेबल की पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर बर्खास्तगी को सही ठहराया गया।

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दिल्ली हाई कोर्ट ने CISF कांस्टेबल की पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर बर्खास्तगी को सही ठहराया। Image Source : PTI FILE

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि हिंदू शादी को गांव वालों या 'समाज के लोगों और गवाहों' के सामने तलाकनामा (marriage dissolution deed) साइन करके खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था या सिद्धांत नहीं है, जिसके तहत विधिवत हिंदू विवाह को इस तरह खत्म किया जा सके। लाइवलॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह फैसला जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने सुनाया। बेंच ने कहा, 'हमें ऐसा कोई कानून या नियम नहीं पता, जिसके तहत विधिवत संपन्न हिंदू शादी को गांव के लोगों के सामने तलाकनामा साइन करके खत्म किया जा सके।'

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF) के कॉन्स्टेबल से जुड़ा है, जिसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी। आरोप था कि उसने अपनी पहली शादी के दौरान ही दूसरी शादी कर ली। कांस्टेबल ने दावा किया कि उसने अपनी पहली शादी को 15 अक्टूबर 2017 को गांव के लोगों के सामने तलाकनामा साइन करके खत्म कर दिया था। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य निर्विवाद है कि पहली शादी के दौरान ही उसने दूसरी शादी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया, 'विधिवत हिंदू शादी को इस तरह (तलाकनामा साइन करके) खत्म नहीं किया जा सकता।' कोर्ट ने यह भी कहा कि CISF नियमों के रूल 18 के तहत, अगर कोई कर्मचारी नौकरी जॉइन करने के बाद दूसरी शादी करता है, तो यह नियम का उल्लंघन माना जाएगा। इस मामले में कांस्टेबल को CISF नियम 182 के उल्लंघन के चलते नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। 

कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

कांस्टेबल ने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उसके पास कोई ठोस बचाव नहीं है। कोर्ट ने अपने फैसले में एक पुराने मामले, एक्स. हेड कांस्टेबल बाजिर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, का हवाला दिया। उस मामले में भी सजा के तौर पर अनिवार्य रिटायरमेंट दी गई थी। हालांकि, इस मामले में कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता ने अनिवार्य रिटायरमेंट के लिए जरूरी सेवा अवधि पूरी नहीं की थी, इसलिए सजा को कम करना भी संभव नहीं है। इस वजह से कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

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