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कानपुर और प्रयागराज के लिए खतरे की घंटी, IIT कानपुर की रिसर्च ने किया अलर्ट; गंगा किनारे भूकंप मचा सकता है तबाही

Edited By: Amar Deep @amardeepmau Published : Feb 24, 2026 04:08 pm IST, Updated : Feb 24, 2026 04:08 pm IST

भूकंप ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिसके बारे में किसी को कोई खबर नहीं होती। यह एक झटके में सब कुछ तबाह कर देता है। वहीं आईआईटी कानपुर की रिसर्च ने यूपी में गंगा किनारे बसे प्रयागराज और कानपुर में भूकंप को लेकर अलर्ट दिया है।

IIT कानपुर की रिसर्च ने भूकंप को लेकर किया अलर्ट। - India TV Hindi
Image Source : PTI/REPORTER INPUT IIT कानपुर की रिसर्च ने भूकंप को लेकर किया अलर्ट।

कानपुर: साल 2015 में भारत के पड़ोसी देश नेपाल में विनाशकारी भूकंप आया था, जिसका असर उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिला था। उस समय एक के बाद एक लगे झटकों से लोग सहम गए थे। भूकंप तो तबाही मचाकर चला गया, लेकिन सिस्टम और आम लोगों ने कोई सीख नहीं ली। आईआईटी कानपुर ने एक लंबी रिसर्च के बाद बताया कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों खासकर कानपुर और प्रयागराज में 6.5 तीव्रता से ऊपर का भूकंप बड़े पैमाने पर नुकसान कर सकता है। आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा के अनुसार इन दोनों शहरों में जमीन के नीचे मिट्टी में बालू के कण बेहद महीन हैं। भूकंप के तीव्र झटकों से मिट्टी की ताकत खत्म होती जाती है और पानी मिट्टी के साथ बाहर आकर पक्के ढांचों को गिरा देता है।

लिक्विफेक्शन से हुआ था नुकसान

सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा ने बताया कि 1803 और 1934 में गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बड़े भूकंप के बाद लिक्विफेक्शन हुआ था। ये क्षेत्र भूकंपीय फॉल्ट पर भी बैठा है। लिक्विफेक्शन की प्रक्रिया में जमीन के नीचे मौजूद मिट्टी और सिल्ट वाली बालू की ताकत खत्म हो जाती है। भूकंप के झटकों से पानी और मिट्टी मिश्रण के तौर पर बाहर आकर पक्के ढांचों को गिरा देते हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए जर्मनी में हर शहर में लिक्विफेक्शन मैप सार्वजनिक स्थानों पर देखे जा सकते हैं।

ग्राउंड इंप्रूवमेंट तकनीकी का करें इस्तेमाल

दरअसल, कानपुर और प्रयागराज भूकंप के सिस्मिक जोन 3/4 में आते हैं। ये दोनों शहर हिमालय से 300 किलोमीटर की परिधि में भी हैं। यहां गंगा की मिट्टी में बालू की सिल्ट ज्यादा है, जबकि मिट्टी की मजबूती कम है। यहां बड़े निर्माण करते समय ग्राउंड इंप्रूवमेंट तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे भूकंप से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। भूकंप के बारे में सटीक जानकारी पाना तो मुश्किल है और प्राकृतिक आपदा कभी भी आ सकती है, हालांकि हम इससे बचाव के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं। 

20 जगहों से नमूने लेकर की रिसर्च

प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा के अनुसार एक प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में लिक्विफेक्शन मैप बनाने के लिए रिसर्च सर्वे किया था। लंबी मेहनत के बाद परिणाम आया कि गंगा किनारे बसे कानपुर और प्रयागराज बड़े भूकंप में लिक्विफेक्शन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। आमतौर पर भूकंप आने पर 8-10 मीटर की गहराई में लिक्विफेक्शन का असर होता है, लेकिन कानपुर और प्रयागराज में ये असर 30-40 मीटर गहराई तक महसूस किया जा सकता है। कानपुर और प्रयागराज में 20-20 जगहों के नमूने इकट्ठे किए थे। कानपुर में गंगा बैराज के पास से बोरहोल से 70-80 मीटर गहराई से मिट्टी ली गई थी। लखनऊ और वाराणसी के कुछ हिस्सों में भी लिक्विफेक्शन की प्रक्रिया का अध्ययन किया गया था। (इनपुट- ज्ञानेंद्र शुक्ल)

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