हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव: बीजेपी को भारी पड़ी अपनों की बगावत, कांग्रेस को भी हुआ नुकसान

हिमाचल प्रदेश में जमकर जोर लगाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। नतीजों का विश्लेषण देखकर लगता है कि पार्टी को बागियों की बगावत का काफी खामियाजा भुगतना पड़ा है।

Vineet Kumar Singh Edited By: Vineet Kumar Singh @JournoVineet
Published on: December 09, 2022 15:57 IST
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Image Source : PTI हिमाचल प्रदेश में बागियों ने बीजेपी का खेल काफी हद तक बिगाड़ा है।

शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को करारी मात दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तूफानी दौरों और ‘राज नहीं, रिवाज बदलो’ के आवाह्न के बावजूद बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मोदी के आवाह्न को हिमाचल के लोगों ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, क्योंकि अगर ऐसा होता तो बीजेपी सिर्फ 0.9 फीसदी वोटों से ही कांग्रेस से पीछे नहीं होती, भले ही सीटों का अंतर 15 रहा। दरअसल, बीजेपी को सबसे ज्यादा चोट उसके बागियों ने पहुंचाई है, और कुछ सीटों पर कांग्रेस को भी इससे जूझना पड़ा है।

बीजेपी और कांग्रेस दोनों को हुआ नुकसान

आंकड़ों पर गौर किया जाए तो विधानसभा चुनाव में बागियों ने 68 में से 12 सीटों पर BJP और कांग्रेस दोनों का खेल बिगाड़ा। निर्दलीयों के रूप में मैदान में उतरे इन बागियों ने 8 सीटों पर बीजेपी और 4 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की जीत की संभावनाओं पर पानी फेरने का काम किया। हिमाचल के चुनावी रण में कुल 99 निर्दलीय उम्मीदवार उतरे थे, जिनमें से 28 इन दोनों पार्टियों के बागी थे। चुनाव जीतने वाले तीनों निर्दलीय उम्मीदवारों, नालागढ़ से के. एल. ठाकुर, देहरा से होशियार सिंह और हमीरपुर से आशीष शर्मा ने टिकट न मिलने के बाद BJP से बगावत कर दी थी।

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अपने लोगों की बगावत का कांग्रेस को भी नुकसान हुआ है।

नालागढ़ और देहरा में भारी पड़ी बगावत
नालागढ़ से चुनाव जीते ठाकुर ने 2012 का विधानसभा चुनाव जीता था, लेकिन 2017 में वह हार गए थे। बीजेपी ने उनकी जगह 2 बार के कांग्रेस विधायक लखविंदर सिंह राणा पर दांव लगाने का फैसला किया, जिन्होंने चुनाव से पहले ही बीजेपी का दामन थामा था। वहीं, देहरा से निर्दलीय विधायक सिंह ने चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम लिया था, लेकिन पार्टी ने रमेश धवाला को टिकट दे दिया। इसी तरह, हमीरपुर से उम्मीदवार न बनाए जाने से नाराज आशीष शर्मा ने भी पार्टी से बगावत कर दी थी।
 

निर्दलीय, छोटे दलें ने जुटाए 10.39 फीसदी वोट
बागियों ने किन्नौर, कुल्लू, बंजर, इंदौरा और धर्मशाला में बीजेपी के प्रत्याशियों की जीत की संभावनाएं धूमिल कर दीं, जबकि पच्छाद, चौपाल, आनी और सुलह में कांग्रेस उम्मीदवारों को उनके चलते हार का मुंह देखना पड़ा। निर्दलीय और अन्य छोटे दलों का कुल वोट प्रतिशत 10.39 फीसदी रहा। किन्नौर में निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले बीजेपी के पूर्व विधायक तेजवंत नेगी को 19.25 फीसदी यानी 8,574 वोट मिले। यह आंकड़ा कांग्रेस प्रत्याशी जगत सिंह नेगी के जीत के अंतर (6,964 वोट) से ज्यादा है और इसने बीजेपी उम्मीदवार सूरत नेगी की हार में अहम भूमिका निभाई।

कुल्लू और बंजर में बागियों ने बिगाड़ा खेल
वहीं, कुल्लू की बात करें तो बीजेपी के बागी राम सिंह को 16.77 फीसदी यानी 11,937 वोट हासिल हुए, जबकि पार्टी प्रत्याशी नरोत्तम ठाकुर को 4,103 मतों से कांग्रेस उम्मीदवार सुरेंदर ठाकुर के हाथों हार झेलनी पड़ी। बंजर में भी परिदृश्य अलग नहीं था। निर्दलीय के रूप में ताल ठोकने वाले हितेश्वर सिंह को 24.12 फीसदी यानी 14,568 वोट मिले, जबकि बीजेपी के प्रत्याशी खिमी राम को 4,334 मतों से हार का सामना करना पड़ा। हितेश्वर सिंह भारतीय जनता पार्टी के नेता महेश्वर सिंह के बेटे हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिमाचल में कई तूफानी दौरे किए थे।

धर्मशाला में भी बागी के चलते हारी बीजेपी?
धर्मशाला में बीजेपी के बागी विपिन नहेरिया के खाते में 12.36 फीसदी यानी 7,416 वोट गए, जो कांग्रेस उम्मीदवार सुधीर शर्मा के जीत के अंतर (3,285 वोट) से काफी अधिक हैं। सुल्ला और अन्नी में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिला, जहां मुकाबला बीजेपी उम्मीदवारों और कांग्रेस के बागियों के बीच था और कांग्रेस का आधिकारिक प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा। पच्छाद और चौपाल में कांग्रेस के बागियों गंगू राम मुसाफिर और सुभाष मैंग्लेट ने क्रमश: 21.46 प्रतिशत और 22.03 फीसदी वोट हासिल किए, जो उक्त सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशियों के जीत के आंकड़े से 2 से 3 गुना ज्यादा हैं।

रिवाज नहीं, इस बार भी राज ही बदला
हिमाचल में हुए ताजा चुनावों में निर्दलीयों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने 68 में से 40 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट जनादेश हासिल किया है। भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद थी कि वह इस बार पिछले कुछ दशकों से हर चुनाव के बाद सरकार बदल जाने के रिवाज को बदल देगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। कई सीटें ऐसी रही जहां काफी करीबी मुकाबला भी हुआ और ज्यादातर ऐसे मुकाबलों में बाजी कांग्रेस नेताओं के हाथ लगी, और हार-जीत का सारा अंतर वहीं तय हो गया।

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