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Kantara Chapter 1 Review: धार्मिक आस्था, जनजातीय संस्कृति और लालच की टक्कर, गहराई में डुबोती है 'कंतारा: चैप्टर 1' की कहानी

Jaya Dwivedie
Published : Oct 02, 2025 04:00 pm IST, Updated : Oct 02, 2025 04:00 pm IST

ऋषभ शेट्टी के निर्देशन में बनी 'कांतारा चैप्टर 1' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी और कलाकारों का अभिनय कितना प्रभावी है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

kantara chapter 1- India TV Hindi
Photo: INS/@RISHABSHETTYOFFICIAL कंतारा: चैप्टर 1 फिल्म रिव्यू
  • फिल्म रिव्यू: कंतारा: चैप्टर 1 फिल्म रिव्यू
  • स्टार रेटिंग: 3.5 / 5
  • पर्दे पर: October 2, 2025
  • डायरेक्टर: Rishab Shetty
  • शैली: Folklore-Thriller

कभी-कभी कोई फिल्म केवल कहानी नहीं कहती, वह समय के पार जाकर एक ऐसा अनुभव बन जाती है जिसे महसूस किया जाता है, ‘कंतारा: अ लीजेंड - चैप्टर 1’ वैसी ही एक फिल्म है। साल 2022 की ब्लॉकबस्टर कंतारा ने दर्शकों को जिस जादुई लोककथा में डुबोया था, यह नई कड़ी उसी दुनिया की जड़ों की ओर लौटती है, लेकिन यह कोई सीक्वल नहीं, बल्कि प्रीक्वल है, जो हमें बताता है कि सब कुछ शुरू कैसे हुआ।

कैसी है कहानी?

कहानी हमें ले जाती है प्राचीन कदंब वंश के दौर में, जहां सत्ता के नशे में चूर एक निर्दयी राजा अपने स्वार्थ में अंधा हो चुका है। उसका लालच उसे एक रहस्यमयी बूढ़े व्यक्ति तक ले जाता है, जिसके पास अनगिनत अनमोल चीजें हैं। इन चीजों का पीछा करते हुए राजा की नजर उस स्थान पर जाती है, जिसे हम 'कंतारा' के नाम से जानते हैं, एक पवित्र और शांतिपूर्ण भूमि, जहां जनजातियां प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य में जीती हैं।

लेकिन यह कोई साधारण भूमि नहीं, यह वो जगह है जिसे देवताओं का संरक्षण प्राप्त है। राजा की मंशा जैसे ही इस भूमि को हड़पने की ओर बढ़ती है, प्रकृति अपना रोद्र रूप दिखाना शुरू कर देती है। जैसे ही भांगड़ा राज्य के राजा विजयेंद्र (जयराम), उनके क्रूर बेटे कुलशेखर (गुलशन देवैया) और करुणामयी बेटी कनकवती (रुक्मिणी वसंत) कहानी में प्रवेश करते हैं, घटनाएं और जटिल होती चली जाती हैं। इस पूरे संघर्ष में एक नाम सबसे प्रमुख बनकर उभरता है, बर्मे (ऋषभ शेट्टी), कंतारा का संरक्षक, जो न सिर्फ एक नेता है, बल्कि अपनी भूमि और अपने लोगों के लिए अडिग आस्था का प्रतीक भी है। जब कंतारा के निवासी भांगड़ा की सीमा में प्रवेश करते हैं तो टकराव जरूरी हो जाता है। जो आगे होता है, वह सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का संघर्ष है।

कैसा है अभिनय?

जयराम अपने किरदार को इतनी गंभीरता और गरिमा से निभाते हैं कि वह कहानी का भार अपने कंधों पर सहजता से उठा लेते हैं। गुलशन देवैया ने कुलशेखर के रूप में इतनी नफरत योग्य प्रस्तुति दी है कि दर्शक उनकी भूमिका से नफरत करने लगेंगे और यही एक सच्चे कलाकार की जीत है। ऋषभ शेट्टी, न केवल मुख्य अभिनेता बल्कि लेखक और निर्देशक भी हैं, हर स्तर पर फिल्म के धड़कते दिल साबित होते हैं। उनका ट्रान्स में जाना, 'गुलिगा' सीक्वेंस और क्लाइमेक्स, ये सब सिनेमा के जादुई पल हैं जो आपको भीतर तक झकझोर देंगे।

तकनीक और भावनाओं का संतुलन

तकनीकी दृष्टि से फिल्म बहुत समृद्ध है। अरविंद एस. कश्यप की सिनेमैटोग्राफी दर्शकों को कंतारा की रहस्यमयी और आध्यात्मिक दुनिया में डुबो देती है। अजनीश लोकनाथ का बैकग्राउंड स्कोर वातावरण को जीवंत बना देता है, भले ही गानों में वो गहराई नहीं आ पाई जो पहली फिल्म में थी, खासकर 'वराह रूपम' जैसा प्रभाव यहां थोड़ी कमी छोड़ता है। संपादन में सुरेश का काम काबिल-ए-तारीफ है, हालांकि कुछ दृश्य जैसे जेल सीन और बाघों के टकराव से पहले के कुछ पल हटाए जाते तो फिल्म और भी कसी हुई बन सकती थी।

तो क्या यह फिल्म पिछली ‘कंतारा’ की बराबरी कर पाई?

इस सवाल का जवाब पूरी तरह आपके देखने के अनुभव पर निर्भर करता है। ‘कंतारा: अ लीजेंड - चैप्टर 1’ एक धीमी शुरुआत के बाद जब उड़ान भरती है तो यह न केवल आंखों को सुकून देती है बल्कि पूरी तरह गहराई में ले जाती है। फिल्म की धीमी गति और कुछ हास्य दृश्य भले कुछ दर्शकों को खटकें, लेकिन अंत में इसका क्लाइमेक्स, इसकी भावनाएं और इसकी तकनीकी सादगी इसे एक यादगार अनुभव बनाते हैं।

क्यों देखें ये फिल्म

‘कंतारा: अ लीजेंड - चैप्टर 1’ एक ऐसी पेशकश है जो लोककथाओं, मिथकों और मानवीय मूल्यों की गहराई में उतरने की कोशिश करती है। ये फिल्म एक अच्छा और गहरा अनुभव है जिसे बड़े पर्दे पर महसूस किया जा सकता है। इंडिया टीवी इसे 3.5 स्टार दे रहा है।

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