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लाहौर एक ऐसा शहर है जिसके पाकिस्तान में जाने का गम तमाम हिंदुस्तानियों को अक्सर होता है। किसी जमाने में अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर लाहौर में आज भी तमाम भव्य इमारतें मौजूद हैं। लाहौर की गलियों में कभी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी और जैन जैसे विविध धर्मों के लोग आपसी भाईचारे के साथ रहा करते थे।
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लेकिन 1947 के बंटवारे ने इस शहर की जनसंख्या और संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया। बंटवारे के समय सांप्रदायिक हिंसा की आग ने लाहौर के इस खूबसूरत ताने-बाने को तहस-नहस कर दिया, और कई समुदाय इस शहर से लगभग गायब हो गए। आइए, 1941 और 2017 के आंकड़ों के आधार पर लाहौर की बदलती जनसंख्या पर नजर डालें और समझें कि समय के साथ यह शहर कैसे बदल गया।
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1941 में लाहौर की कुल जनसंख्या लगभग 6.71 लाख थी, जिसमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल थे। उस समय इस शहर में 4.33 लाख मुसलमान रहते थे, जो कुल जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा थे। इसके अलावा, लाहौर में हिंदुओं की आबादी भी काफी थी। 1941 की जनगणना के अनुसार, शहर में करीब 1.80 लाख हिंदू थे, जो कुल जनसंख्या का 26.8% हिस्सा थे।
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हिंदुओं के अलावा सिख समुदाय भी लाहौर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, और उस समय यहां 34,000 से अधिक सिख रहा करते थे। ईसाई समुदाय की संख्या 21,495 थी, जबकि 1,094 जैन, कुछ पारसी, बौद्ध और यहूदी भी इस शहर की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध करते थे। उस दौर में लाहौर एक ऐसा शहर था जहां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का संगम देखने को मिलता था।
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1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान लाहौर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं ने शहर की सामाजिक संरचना को गहरी चोट पहुंचाई। हिंदू और सिख समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए, जबकि मुस्लिम आबादी पाकिस्तान की ओर आई। इस पलायन और हिंसा ने लाहौर के धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया।
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2017 की जनगणना के अनुसार, लाहौर की कुल जनसंख्या बढ़कर 1.11 करोड़ हो गई थी। इसमें मुस्लिम आबादी 1.05 करोड़ तक पहुंच गई, जो कुल जनसंख्या का 94.7% थी। ईसाई समुदाय की संख्या भी बढ़कर 5.71 लाख हो गई, जो कुल जनसंख्या का 5.14% था।
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हालांकि, हिंदू और सिख समुदायों की स्थिति दयनीय हो गई। 2017 में लाहौर में हिंदुओं की संख्या घटकर मात्र 2,670 रह गई, जो कुल जनसंख्या का केवल 0.02% थी। सिखों की संख्या भी न के बराबर रह गई, और जैन, पारसी, बौद्ध और यहूदी समुदायों का तो लगभग अस्तित्व ही मिट गया।
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1941 में लाहौर की गलियां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के रंगों से भरी थीं। हिंदू मंदिर, सिख गुरुद्वारे, ईसाई चर्च और अन्य धार्मिक स्थल इस शहर की सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक थे। लेकिन बंटवारे की त्रासदी ने इन समुदायों को उजाड़ दिया। 2017 के आंकड़े बताते हैं कि हिंदू, सिख, जैन, पारसी और अन्य समुदाय, जो कभी इस शहर की शान हुआ करते थे, अब आधिकारिक आंकड़ों में मुश्किल से दिखाई देते हैं।